Loading...
अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 9 के मन्त्र
मन्त्र चुनें
  • अथर्ववेद का मुख्य पृष्ठ
  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 11
    ऋषिः - अथर्वा देवता - शतौदना (गौः) छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शतौदनागौ सूक्त
    52

    घृ॒तं प्रो॒क्षन्ती॑ सु॒भगा॑ दे॒वी दे॒वान्ग॑मिष्यति। प॒क्तार॑मघ्न्ये॒ मा हिं॑सी॒र्दिवं॒ प्रेहि॑ शतौदने ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    घृ॒तम् । प्र॒ऽउ॒क्षन्ती॑ । सु॒ऽभगा॑ । दे॒वी । दे॒वान् । ग॒मि॒ष्य॒ति॒ । प॒क्तार॑म् । अ॒घ्न्ये॒ । मा । हिं॒सी॒: । दिव॑म् । प्र । इ॒हि॒ । श॒त॒ऽओ॒द॒ने॒ ॥९.११॥


    स्वर रहित मन्त्र

    घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान्गमिष्यति। पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीर्दिवं प्रेहि शतौदने ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    घृतम् । प्रऽउक्षन्ती । सुऽभगा । देवी । देवान् । गमिष्यति । पक्तारम् । अघ्न्ये । मा । हिंसी: । दिवम् । प्र । इहि । शतऽओदने ॥९.११॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 9; मन्त्र » 11
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी की महिमा का उपदेश।

    पदार्थ

    (घृतम्) घृत [तत्त्व पदार्थ] (प्रोक्षन्ती) सींचती हुई, (सुभगा) बड़े ऐश्वर्यवाली (देवी) देवी [विजयिनी वेदवाणी] (देवान्) विद्वानों को (गमिष्यति) पहुँचेगी। (अघ्न्ये) हे न मारनेवाली ! [वेदवाणी] (पक्तारम्) [अपने] पक्के [दृढ़] करनेवाले को (मा हिंसीः) मत मार, (शतौदने) हे सैकड़ों प्रकार सींचनेवाली ! (दिवम्) प्रकाश को (प्र) अच्छे प्रकार (इहि) प्राप्त हो ॥११॥

    भावार्थ

    विद्वान् लोग वेदविद्या के तत्त्व को जानकर पुरुषार्थी होकर शुभ मनोरथ सिद्ध करें ॥११॥

    टिप्पणी

    ११−(घृतम्) सारपदार्थम् (प्रोक्षन्ती) प्रकर्षेण सिञ्चन्ती (सुभगा) परमैश्वर्यवती (देवी) विजयिनी वेदविद्या (देवान्) विदुषः पुरुषान् (गमिष्यति) प्राप्स्यति (पक्तारम्) दृढकारकम् (अघ्न्ये) म० ३। हे अहिंसिके (मा हिंसीः) मा नाशय। अन्यत् पूर्ववत्−म० ३ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    घृतं प्रोक्षन्ती

    पदार्थ

    १. (घृतं प्रोक्षन्ती) = शतवर्षपर्यन्त हमारे जीवनों को आनन्दसिक्त करनेवाली यह वेदवाणी हमारे जीवनों में [घ क्षरणदीप्त्योः ] दीप्ति का सेचन करती है, (सुभगा) = यह उत्तम ऐश्वयों को प्राप्त करानेवाली (देवी) = प्रकाशमयी-काम-क्रोध को जीतने की कामनावाली वेदवाणी (देवान् गमिष्यति) = देववृत्ति के पुरुषों को प्राप्त होगी। काम-क्रोध को परास्त करनेवाले पुरुष ही इसे प्राप्त करने के अधिकारी होते हैं। २. हे (शतौदने) = आजीवन आनन्दित करनेवाली (अघ्न्ये) = अहन्तव्ये वेदवाणि! (पक्तारं मा हिंसी:) = तेरा परिपाक करनेवाले व्यक्तियों को मत हिंसित कर-तेरा पाक करनेवाले व्यक्ति हिंसित न हों [वेद एव हतो हन्ति]। यह वाणी अन्न्या है-हम इसका हनन न करेंगे तो यह भी हमें हिंसित होने से बचाएगी। हे शतौदने ! तू (दिवं प्रेहि) = प्रकाश व आनन्द [द्युति-मोद] को प्राप्त कर-तू आनन्द को प्राप्त करानेवाली हो।

    भावार्थ

    वेदवाणी प्रकाशमयी है। यह हमारे जीवनों को ज्ञानसिक्त करती है, सौभाग्यसम्पन्न बनाती है। यह देववृत्ति के पुरुषों को प्राप्त होती है। जो भी अपने में इसका परिपाक करते हैं, उनका हिंसन न होने देती हुई यह उन्हें ज्योति व आनन्द प्राप्त कराती है-

    इस भाष्य को एडिट करें

    भाषार्थ

    (घृतम्) घृत आदि पदार्थों का सिञ्चन अर्थात् प्रदान करती हुई (सुभगा) उत्तम भगों वाली (देवी) पारमेश्वरी मातारूपी देवता (देवान्) दिव्यगुणों वाले व्यक्तियों को (गमिष्यति) प्राप्त होगी। (अघ्न्ये) हे अहन्तव्ये अत्याज्ये मातः ! (पक्तारम्) ध्यानाभ्यास द्वारा तेरा परिपाक करने वाले को (मा हिंसीः) तू निज आश्रय से वञ्चित न कर। (शतौदने) हे नानाविध अन्नों को देने वाली ! (दिवम् प्रेहि) उपासक के मस्तिष्क में तू प्राप्त हो।

    टिप्पणी

    [पारमेश्वरी माता शतौदना है, सैकड़ों प्रकार के ओदन आादि भोज्य पदार्थ देती है, और घृतादि सात्विक पदार्थ भी देती है। वह सुभगा है, श्रेष्ठ भगों वाली है। भग ६ होते हैं, यथा "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा"॥ ये ६ भग पारमेश्वरी माता के हैं। वह देवों अर्थात् दिव्यगुणियों को ही प्राप्त होती है, अपात्रों और कुपात्रों को नहीं, अर्थात् उन्हें ही प्राप्त होती है जो कि ध्यानाभ्यास द्वारा उसका परिपाक१ करते हैं। परमेश्वर की छाया ही अमृत है "यस्य च्छायामृतम्", तथा उसकी छाया से वञ्चित रहना यह मृत्यु है "यस्य मृत्यु" (यजु० २५।१३)। यह मृत्यु है "हिंसा"। यथा "मा हिंसी" (मन्त्र ११)। दिवम् = मूर्धा या शिरः अर्थात् मस्तिष्क तथा मस्तिष्कस्थ सहस्रार चक्र]। [१. जैसे कि "परिपक्व बुद्धिः" पद में परिपाक का अर्थ "अग्नि-पर-पकाना" नहीं।]

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    ‘शतौदना’ नाम प्रजापति की शक्ति का वर्णन।

    भावार्थ

    हे पृथ्वि ! तू (घृतम्) घृत आदि पदार्थों को देने वाली गौ के समान अन्न और पुष्टिकारक जल को सर्वत्र अपने समस्त प्रदेशों में नदी और झरना द्वारा (प्रोक्षन्ती) सींचती हुई (सुभगा) उत्तम अन्न रत्नादि ऐश्वर्य से युक्त होकर (देवी) समस्त पदार्थों के देनेहारी होकर (देवान्) देव, विद्वान् दानियों को (गमिष्यति) प्राप्त होगी। हे (अघ्न्ये) अहिंसा करने योग्य देवि ! गो के समान पृथ्वि ! तू (पक्तारम्) अपने परिपाक करने वाले, तुझे बहु गुणसम्पन्न करने वाले सूर्य के समान राजा को (मा हिंसीः) तू मत मार। प्रत्युत, स्वयं हे (शतौदने) सैकड़ों वीर्य अन्नादि वीर्यों को धारण करनेहारी तू (दिवम्) सूर्य के प्रति या स्वर्ग के समान सुखकारी लोक बन जाने के प्रति (प्रेहि) गमन कर अर्थात् सूर्य के समान राजा को प्राप्त होकर धन धान्य सम्पन्न होकर स्वर्ग भूमि के समान हो जा।

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘सुभगा देवान् देवी’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता शतोदना देवता। १ त्रिष्टुप्, २- ११, १३-२४ अनुष्टुभः, १२ पथ्यापंक्तिः, २५ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुप्, २६ पञ्चपदा बृहत्यनुष्टुप् उष्णिग्गर्भा जगती, २७ पञ्चपदा अतिजगत्यनुष्टुब् गर्भा शक्वरी। सप्तविंशत्यृचं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (4)

    Subject

    Shataudana Cow

    Meaning

    O divine mother of prosperity, giver of ghrta for food and yajna in showers, your generosity will rise to the divinities. Mother inviolable, do not be unkind to the devotee. Let the aroma of delicacies and the fragrance of ghrta rise to the heavens in abundance.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Sprinkling purified butter, the blessed, divine one will go to the enlightened ones. O Sataudana, may you not harm him, who has brought you to maturity. May you go to heaven.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    Let this beneficent useful cow sprinkling ghee go to men of enlightenment, Let not this Shataudana hurt to its trainers and domesticators and let it always remain in light.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Translation

    The progressive, valorous Vedic speech, spreading knowledge will go to the learned. O Vedic Speech, harm not thy firm believer, and attain to glory and celebrity.

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ११−(घृतम्) सारपदार्थम् (प्रोक्षन्ती) प्रकर्षेण सिञ्चन्ती (सुभगा) परमैश्वर्यवती (देवी) विजयिनी वेदविद्या (देवान्) विदुषः पुरुषान् (गमिष्यति) प्राप्स्यति (पक्तारम्) दृढकारकम् (अघ्न्ये) म० ३। हे अहिंसिके (मा हिंसीः) मा नाशय। अन्यत् पूर्ववत्−म० ३ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top