अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 25
ऋषिः - अथर्वा
देवता - शतौदना (गौः)
छन्दः - द्व्यनुष्टुब्गर्भानुष्टुप्
सूक्तम् - शतौदनागौ सूक्त
46
क्रो॒डौ ते॑ स्तां पुरो॒डाशा॒वाज्ये॑ना॒भिघा॑रितौ। तौ प॒क्षौ दे॑वि कृ॒त्वा सा प॒क्तारं॒ दिवं॑ वह ॥
स्वर सहित पद पाठक्रो॒डौ । ते॒ । स्ता॒म् । पु॒रो॒डाशौ॑ । आज्ये॑न । अ॒भिऽधा॑रितौ । तौ । प॒क्षौ । दे॒वि॒ । कृ॒त्वा । सा । प॒क्तार॑म् । दिव॑म् । व॒ह॒ ॥९.२५॥
स्वर रहित मन्त्र
क्रोडौ ते स्तां पुरोडाशावाज्येनाभिघारितौ। तौ पक्षौ देवि कृत्वा सा पक्तारं दिवं वह ॥
स्वर रहित पद पाठक्रोडौ । ते । स्ताम् । पुरोडाशौ । आज्येन । अभिऽधारितौ । तौ । पक्षौ । देवि । कृत्वा । सा । पक्तारम् । दिवम् । वह ॥९.२५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
वेदवाणी की महिमा का उपदेश।
पदार्थ
(ते) तेरी (क्रोडौ) दो गोदें (आज्येन) घी से (अभिघारितौ) चुपड़ी हुई (पुरोडाशौ) दो रोटियाँ [मुनि अन्न की पवित्र रोटियाँ] (स्ताम्) होवें। (देवि) हे देवी ! [विजयिनी वेदविद्या] (सा) सो तू (तौ) उन दोनों [गोदों] को (पक्षौ) दो पंख (कृत्वा) बनाकर (पक्तारम्) अपने पक्के [दृढ़] करनेवाले को (दिवम्) प्रकाश में (वह) पहुँचा दे ॥२५॥
भावार्थ
मनुष्य वेदवाणी के एक विद्यादायक और दूसरे पुरुषार्थवर्धक गुणों को शीघ्र प्राप्त करके आत्मा को प्रकाशयुक्त करे, जैसे बालक माता की दोनों गोदों में रहकर दुग्ध आदि से शीघ्र पुष्ट होता हुआ उत्तम मार्ग पर चलता है ॥२५॥
टिप्पणी
२५−(क्रोडौ) क्रुड बाल्ये, निमज्जने भक्षणे च-घञ्। अङ्कौ (ते) तव (स्ताम्) भवताम् (पुरोडाशौ) अ० ९।६।(१)।१२। मुन्यन्नरोटिकाविशेषौ (आज्येन) घृतेन (अभिघारितौ) घृ क्षरणे−णिच्-क्त। सर्वतः स्निग्धौ (तौ) क्रोडौ (पक्षौ) पक्षिणां पतत्रौ (देवि) हे विजयिनि (कृत्वा) (सा) सा त्वम् (पक्तारम्) पक्वकारकं दृढकारकम् (दिवम्) प्रकाशं प्रति (वह) नय ॥
विषय
यज्ञ व स्वर्गलोक
पदार्थ
१. हे शतौदने ! (ते क्रोडौ) = तेरे दोनों पार्श्वभाग [गोद] (पुरोडाशौ स्ताम्) = पुरोडाश हों-[The sacrificial oblation made of ground rice, leaving of an oblation] यज्ञिय आहुतियाँ बनें। जो यज्ञिय आहुतियाँ (आज्येन अभिघारितौ) = घृत से सिक्त है [Sprinkle over, moisten] हम तेरा अध्ययन करते हुए तेरे द्वारा उपदिष्ट यज्ञों को करनेवाले बनें। प्रात:-सायं अग्निहोत्र करते हुए हुतशेष को ही खानेवाले बनें। ('अग्निहोत्रसमो विधि:') = प्रात:-सायं यज्ञ करके यज्ञशेष को ही सदा भोजन के रूप में ग्रहण करें। २. हे (देवि) = प्रकाशमयी वेदवाणि! तू (तौ) = उन दोनों पुरोडाशों को (पक्षौ कृत्वा) = पक्ष [पंख] बनाकर (सा) = वह तू (पक्तारम्) = यज्ञिय हवि का परिपाक करनेवाले इस व्यक्ति को (दिवं वह) = प्रकाशमय स्वर्गलोक में प्राप्त करानेवाली बन । मुण्डकोपनिषत् १.२.४ ६ में यही भाव इस रूप में दिया गया है कि ("काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूभ्रवर्णा। स्फुलिंगिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सस जिह्वा॥ एतेषु यश्चरते भाजमानेषु यथाकालं चाहुतयो हाददायन्। तन्नयन्त्येता: सूर्यस्य रश्मयो यन्त्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ एहोहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिवदन्त्योउर्चयन्त्य एष व: पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ।।") = अर्थात् जो अग्नि जिह्वाओं में यथासमय आहुतियाँ प्राप्त कराता है, उसे ये आहुतियाँ सूर्यरश्मियों द्वारा ब्रह्मलोक में ले-जानेवाली होती हैं।
भावार्थ
प्रात:-सायं यज्ञ में दी जानेवाली आहुतियाँ ही वेदधेनु के दो पार्श्वभाग [गोद] हैं। ये आहुतियाँ ही ज्ञानपरिपक्व यजमान को स्वर्ग में प्राप्त कराती हैं।
भाषार्थ
(ते) तेरे (क्रोडौ) दो क्रोड़, (आज्येन) घृत द्वारा (अभिघारितौ) सींचे गए (पुरोडाशौ) दो पुरोडाश हों। (देवि) हे देवि! (तौ) उन दो [पुराडाशों] को (पक्षौ) यो पंख (कृत्वा) कर के (पक्तारम्) पकाने वाले को (दिवम्) दिव् में (वह) ले जा या पहुंचा।
टिप्पणी
[क्रोडौ= छाती के वाम-दक्षिणपार्श्व। पुरोडाशौ= जौ या तण्डुल को पीठी द्वारा, आग पर पकाए, दो भटूरे। पुरोडाशें की यज्ञाहुतियां दी जाती है। यज्ञ द्वारा यजमान स्वर्ग पहुंचने का अधिकार प्राप्त करता है। पुरोडाश चूंकि गौ [बैल] द्वारा कृषिजन्य जौ तण्डुलों द्वारा बनाया जाता है, अतः परम्परया पुरोडाश का सम्बन्ध गौ के साथ है। अतः कल्पनारूप में कहा है कि हे गौ! तु दो पंखों वाले पक्षीरूप हो कर तु, यजमान को स्वर्ग पहुंचा पारमेश्वरी माता के पक्ष में दो पुरोडाश है मस्तिष्क के दाएं-बाएं के खण्ड। इन्हें ही माता की छाती के बाम-दक्षिण के दो पार्श्व और इन में लगे दो पंख कहा है। माता पक्षीरूप होकर उपासक को उस के दिव- रूपी मस्तिष्क में स्थित सहस्रारचक्र में मानो शीघ्र उठाकर, पहुंचा देती है। उपासक हृदयचक्र में विराजमान था। किसी अध्यात्म गुरु की शक्ति न थी कि वह उपासक को हृदय-चक्र से उठाकर शीघ्र सहस्रारचक्र में पहुंचा दे। इसलिए अध्यात्मगुरु, माता से प्रार्थना करता है कि वह इस उपासक को शीघ्र सहस्रारचक्र में पहुंचा दे।]
विषय
‘शतौदना’ नाम प्रजापति की शक्ति का वर्णन।
भावार्थ
हे गौ ! पृथ्वि ! (आज्येन) घृत या तेज से (अभि-घारितौ) मिले हुए (पुरोडाशौ) दो पुरोडाश या आकाश और पृथिवी दोनों ही (ते क्रोड़ौ) तेरे दोनों पार्श्वों के समान (स्ताम्) हैं। हे (देवि) देवी दानशील गौ ! तू उन दोनों को (पक्षौ) पक्ष (कृत्वा) बना कर (पक्तारम्) अपने पकाने हारे राजा को (दिवं वह) द्योलोक स्वर्ग में ले जा। ‘पुरोडाशौ’—स कूर्मरूपेणाच्छन्नः पुरोडाशो वा एभ्यो मनुष्येभ्यस्तत्पुरोऽदशयत्। य एभ्यो यज्ञं प्रारोचयत्। य एभ्यो यज्ञं प्रारोचयत् तस्मात् पुरोदाशः पुरोदाशो वै नाम एतत् यत् पुरोडाश इति। श० १। ६। २। ५ ॥ पुरो वा एतान् देवा अक्रन। ऐ० २। २३॥ विड् उत्तरः पुरोडाशः। श० ४। २। १। २२॥ ‘द्यावापृथिव्यौ हि कूर्मः’ श०। आकाश और पृथिवी, राजा और प्रजा ये दोनों मिल कर कूर्माकार हो जाते हैं ये दोनों दो पुरोडाश हैं इनके नाना रम्य पदार्थों से यह संसार जीवों को भला मालूम हुआ इसलिये ये दोनों पुरोदाश या पुरोडाश कहे जाते हैं। वे दोनों आज्य=सूर्य से प्रकाशित हैं वे पृथ्वी रूप गौ के दो पार्श्व हैं। उनके ऊपर वह राजा को धारण करती और स्वर्ग का सा आनन्द प्रदान करती है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता शतोदना देवता। १ त्रिष्टुप्, २- ११, १३-२४ अनुष्टुभः, १२ पथ्यापंक्तिः, २५ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुप्, २६ पञ्चपदा बृहत्यनुष्टुप् उष्णिग्गर्भा जगती, २७ पञ्चपदा अतिजगत्यनुष्टुब् गर्भा शक्वरी। सप्तविंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Shataudana Cow
Meaning
Let the two purodasha cakes sprinkled with ghrta be like the wings of your loving bosom. O divine mother, take them as the wings to fly and thereon lead the cook to rise to the light of heaven.
Translation
May your breasts be the two sacrificial cakes smeared with purified butter. Making them your two wings, O blessed one, carry him, who has brought you to maturity, to heaven.
Translation
The two Purodashas of yajna sprinkled with molten ghee are like the two sides of this Shataudana. Let this beneficent cow making them wings carry to heaven to him who is the domesticator of this.
Translation
O victorious Vedic Speech, Heaven and Earth are two laps of thine, filled with luster. Make them thy wings, and take the man who has perfect faith in thy infallibility to the high pedestal of salvation.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२५−(क्रोडौ) क्रुड बाल्ये, निमज्जने भक्षणे च-घञ्। अङ्कौ (ते) तव (स्ताम्) भवताम् (पुरोडाशौ) अ० ९।६।(१)।१२। मुन्यन्नरोटिकाविशेषौ (आज्येन) घृतेन (अभिघारितौ) घृ क्षरणे−णिच्-क्त। सर्वतः स्निग्धौ (तौ) क्रोडौ (पक्षौ) पक्षिणां पतत्रौ (देवि) हे विजयिनि (कृत्वा) (सा) सा त्वम् (पक्तारम्) पक्वकारकं दृढकारकम् (दिवम्) प्रकाशं प्रति (वह) नय ॥
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