अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 21
ऋषिः - अथर्वा
देवता - शतौदना (गौः)
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - शतौदनागौ सूक्त
47
यौ त॑ उ॒रू अ॑ष्ठी॒वन्तौ॒ ये श्रोणी॒ या च॑ ते भ॒सत्। आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥
स्वर सहित पद पाठयौ । ते॒ । ऊ॒रू इति॑ । अ॒ष्ठी॒वन्तौ॑ । ये इति॑ । श्रोणी॒ इति॑ । या । च॒ । ते॒ । भ॒सत् । अ॒मिक्षा॑म् । दु॒ह्र॒ता॒म् । दा॒त्रे । क्षी॒रम् । स॒र्पि:। अथो॒ इति॑ । मधु॑ ॥९.२१॥
स्वर रहित मन्त्र
यौ त उरू अष्ठीवन्तौ ये श्रोणी या च ते भसत्। आमिक्षां दुह्रतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु ॥
स्वर रहित पद पाठयौ । ते । ऊरू इति । अष्ठीवन्तौ । ये इति । श्रोणी इति । या । च । ते । भसत् । अमिक्षाम् । दुह्रताम् । दात्रे । क्षीरम् । सर्पि:। अथो इति । मधु ॥९.२१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
वेदवाणी की महिमा का उपदेश।
पदार्थ
(यौ) जो (ते) तेरे (ऊरू) दो घुटने और (अष्ठीवन्तौ) घुटनों के दो जोड़, (ये) जो (श्रोणी) दो कूल्हे (च) और (या) जो (ते) तेरा (भसत्) पेडू है, वे सब (आमिक्षाम्) आमिक्षा..... म० १३ ॥२१॥
भावार्थ
मन्त्र १३ के समान है ॥२१॥
टिप्पणी
२१−(ऊरू) जानुनी (अष्ठीवन्तौ) अ० २।३३।५। जानुसंयोगास्थिनी (श्रोणी) कटिदेशौ (भसत्) नाभितलभागः। अन्यत् स्पष्टम् ॥
विषय
वेदज्ञान व सात्विक अन्न
पदार्थ
१. (यत् ते मज्जा) = जो तेरी मज्जा [अस्थि की मींग] है, (यत् अस्थि) = जो हडी है, (यत् मांसम्) = जो मांस है (यत् च लोहितम्) = और जो रुधिर है। (यौ ते बाहू) = जो तेरी भुजाएँ हैं, (ये दोषणी) = जो भुजा के उपरले भाग हैं, (यौ अंसौ) = जो कन्धे है, (या च ते ककुत्) = और जो तेरा कुहान है। (या: ते ग्रीवा:) = जो तेरी गर्दन की हड्डियाँ हैं, (ये स्कन्धा:) = जो तेरे कन्धों की हड्डियाँ हैं, (याः पृष्टी:) = जो पीठ की हड्डियाँ हैं, (याः च पशर्व:) = और जो पसलियाँ हैं। (यौ ते उरू) = जो तेरी जाँचे हैं, (अष्ठीवन्तौ) = जो घुटने हैं, (ये श्रोणी) = जो कूल्हे हैं, (या च ते भसत) = जो तेरा पेड़ है, (यत् ते पुच्छम्) = जो तेरी पूँछ है, (ये ते बाला:) = जो तेरे बाल हैं, (यत् ऊध:) = जो तेरा दुग्धाशय है, (ये च ते स्तना:) = और जो तेरे स्तन हैं। (याः ते जंघा:) = जो तेरी जाँचे है, (याः कुष्ठिका:) = जो कुष्टिकाएँ हैं-खुट्टियाँ हैं [The mouth or openings], छिद्र हैं, (ऋच्छरा:) = खुट्टों के ऊपर के भाग [कलाइयाँ] है, (ये च ते शफा:) = और जो तेरे खुर हैं। हे (शतौदने) = शतवर्षपर्यन्त हमारे जीवनों को आनन्दसिक्त करनेवाली वेदधेनो! (यत् ते चर्म) = जो तेरा चाम है और है (अघ्न्ये) = अहन्तव्ये वेदधेनो! (यानि लोमानि) = जो तेरे लोम हैं। २. ये सब, अर्थात् सब लोक-लोकान्तरों का ज्ञान (दात्रे) = तेरे प्रति अपने को दे डालनेवाले के लिए (आमिक्षाम्) = श्रीखण्ड को, (क्षीरम्) = दूध को, (सर्पिः) = घृत को (अथो मधु) = और मधु को दहताम्-प्रपूरित करें।
भावार्थ
वेदधेनु के ज्ञानदुग्ध का पान करते हुए हम 'आमिक्षा, क्षीर, सर्पि व मधु' जैसे उत्तम पदार्थों का ही प्रयोग करनेवाले बनते हैं।
भाषार्थ
(ते) तेरे (यौ ऊरु) जो दो पट्ट [Thighs] है, (अष्ठीवन्तौ) दो घुटने हैं, (ये श्रोणी) जो दो चूतड़ अर्थात् कुल्हे [Hips] है, (या च) और जो (ते) तेरा (भसत्) जघन अर्थात् जननेन्द्रिय है वे (दात्रे) दाता के लिये आमिक्षा, क्षीर, सर्पिः और मधु (दुह्रताम्) दोहे, प्रदान करें।
टिप्पणी
[ऊरू= बलम्; श्रोणी=व्रह्म च क्षत्रम् च; (अथर्व० ९।१२(७)।६)। भसत्= इन्द्राणी (अथर्व० ९।१२(७)।८)]।
विषय
‘शतौदना’ नाम प्रजापति की शक्ति का वर्णन।
भावार्थ
(यौ ते ऊरू) जो तेरी पीछे की दो जंघाएं हैं, (अष्ठीवन्तौ) जो दो घुटने हैं (ये श्रोणी) जो दो कूल्हे और (या च ते भसत्) जो तेरा गुह्यांग, मूत्र मार्ग है,
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता शतोदना देवता। १ त्रिष्टुप्, २- ११, १३-२४ अनुष्टुभः, १२ पथ्यापंक्तिः, २५ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुप्, २६ पञ्चपदा बृहत्यनुष्टुप् उष्णिग्गर्भा जगती, २७ पञ्चपदा अतिजगत्यनुष्टुब् गर्भा शक्वरी। सप्तविंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Shataudana Cow
Meaning
Let your thighs, your knees, your hinder quarters and your rump yield curd and cheese, milk, ghrta and the honey sweets of life’s nourishments for the generous giver.
Translation
May your these two thighs, the two knee-joints, these two hips and your this rump, yield to your donor mingled curd, milk, melted butter and honey as well.
Translation
Let the thighs and the knee-bones of it and let its hinder quarters and hips pour Amiksha and sweet milk for the giver.
Translation
Let thy thighs, and thy knee-bones, thy buttocks, and thy urinary organ, grant for a charitably disposed person, curd, milk, butter and the knowledge of God.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२१−(ऊरू) जानुनी (अष्ठीवन्तौ) अ० २।३३।५। जानुसंयोगास्थिनी (श्रोणी) कटिदेशौ (भसत्) नाभितलभागः। अन्यत् स्पष्टम् ॥
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