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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 9 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 27
    ऋषिः - अथर्वा देवता - शतौदना (गौः) छन्दः - पञ्चपदातिजागतानुष्टुब्गर्भा शक्वरी सूक्तम् - शतौदनागौ सूक्त
    73

    अ॒पो दे॒वीर्मधु॑मतीर्घृत॒श्चुतो॑ ब्र॒ह्मणां॒ हस्ते॑षु प्रपृ॒थक्सा॑दयामि। यत्का॑म इ॒दम॑भिषि॒ञ्चामि॑ वो॒ऽहं तन्मे॒ सर्वं॒ सं प॑द्यतां व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒प: । दे॒वी: । मधु॑ऽमती: । घृ॒त॒ऽश्चुत॑: । ब्र॒ह्माणा॑म् । हस्ते॑षु । प्र॒ऽपृ॒थक् । सा॒द॒या॒मि॒ । यत्ऽका॑म: । इ॒दम् । अ॒भि॒ऽसि॒ञ्चामि॑ । व॒: । अ॒हम् । तत् । मे॒ । सर्व॑म् । सम् । प॒द्य॒ता॒म् । व॒यम् । स्या॒म॒ । पत॑य: । र॒यी॒णाम् ॥९.२७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपो देवीर्मधुमतीर्घृतश्चुतो ब्रह्मणां हस्तेषु प्रपृथक्सादयामि। यत्काम इदमभिषिञ्चामि वोऽहं तन्मे सर्वं सं पद्यतां वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अप: । देवी: । मधुऽमती: । घृतऽश्चुत: । ब्रह्माणाम् । हस्तेषु । प्रऽपृथक् । सादयामि । यत्ऽकाम: । इदम् । अभिऽसिञ्चामि । व: । अहम् । तत् । मे । सर्वम् । सम् । पद्यताम् । वयम् । स्याम । पतय: । रयीणाम् ॥९.२७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 9; मन्त्र » 27
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी की महिमा का उपदेश।

    पदार्थ

    (देवीः) देवी [विजयिनी] (मधुमतीः) श्रेष्ठ मधुविद्या [ब्रह्मज्ञान] वाली, (घृतश्चुतः) घृत [सारतत्त्व] बरसानेवाली (अपः) व्यापनशील [वेदवाणियों] को (ब्रह्मणाम्) ब्रह्माओं [वेदवेत्ताओं] के (हस्तेषु) हाथों में (प्रपृथक्) नाना प्रकार से (सादयामि) मैं रखता हूँ। [हे विद्वानो !] (यत्कामः) जिस उत्तम कामनावाला (अहम्) मैं (इदम्) इस समय (वः) तुम्हारा (अभिषिञ्चामि) अभिषेक करता हूँ, (तत् सर्वम्) वह सब (मे) मेरे लिये (सम् पद्यताम्) सम्पन्न हो, (वयम्) हम (रयीणाम्) अनेक धनों के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवें ॥२७॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को उचित है कि सर्वगुणसम्पन्न वेदविद्या को विद्वानों के साथ विचार कर उत्तम शिक्षा प्राप्त करें, जिस से सब लोग विद्याधन और सुवर्ण आदि धन पाकर आनन्द भोगें ॥२७॥ इस मन्त्र के पाद दो और तीन अथर्व ६।१२२, ५। में आये हैं ॥

    टिप्पणी

    २७−(अपः) व्यापनशीला वेदविद्याः (देवीः) विजयिनीः (मधुमतीः) ब्रह्मज्ञानेन युक्ताः (घृतश्चुतः) अ० ३।३३।४। सारतत्त्वस्राविणीः (ब्रह्मणाम्) वेदज्ञानम् (हस्तेषु) (प्रपृथक्) अ० ६।१२२।५। नानाप्रकारेण (सादयामि) स्थापयामि (यत्कामः) यत्पदार्थं कामयमानः (इदम्) इदानीम् (अभिषिञ्चामि) अभिषिक्तान् करोमि (वः) युष्मान् (अहम्) (तत्) (मे) मह्यम् (सर्वम्) (सम् पद्यताम्) सम्पन्नं साधितं भवतु (वयम्) (स्याम) (पतयः) स्वामिनः (रयीणाम्) नानाधनानाम् ॥

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    विषय

    'दिवा-मधुर-दीप्त' जीवन

    पदार्थ

    १. (ब्रह्मणां हस्तेषु) = ज्ञानियों के हाथों में (पृथक्) = अलग-अलग स्थित इन (देवी:) = प्रकाशमयी, (मधुमती:) = जीवन को अत्यन्त मधुर बनानेवाली (घृतश्चुत:) = ज्ञानदीप्ति को हममें सिक्त करनेवाली (अप:) = ज्ञानजल की धाराओं को (प्रसादयामि) = मैं अपने में प्रकर्षेण स्थापित करता हूँ। मैं ज्ञानियों से इन ज्ञानों को प्राप्त करता हूँ। २. (यत् काम:) = जिस कामनावाला (अहम्) = मैं, हे ज्ञानजलो! (व:) = आपको (इदम्) = [इदानीम्] अब (अभिषिञ्चामि) = सिक्त करता हूँ, (तत् मे सर्वं संपद्यताम्) = वह मेरी सब कामनाएँ सिद्ध हों। (वयम्) = हम सब (रयीणां पतयः स्याम) = धनों के स्वामी बनें, कभी धनों के दास न बन जाएँ। हमारे जीवन में धन साधनरूप से हो-न कि साध्यरूप से।

    भावार्थ

    हम ज्ञानियों से ज्ञानजलों को अपने में स्थापित करने का प्रयत्न करें। ये ज्ञानजल हमारे जीवनों को दिव्य, मधुर व दीप्त बनाते हैं। हमारी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं और हम धनों के स्वामी बनते हैं, न कि धनों के दास। वेदाध्ययन से योगविभूतियों के स्वामी बनें।

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    भाषार्थ

    (देवीः) दिव्यगुणों वाले (मधुमतीः) मधुर, (घृतश्चुतः) घृतस्रावी (अपः) जलों को (ब्रह्मणाम्) ब्रह्मवेत्ताओं के (हस्तेषु) हाथों में (प्रपृथक) प्रत्येक में पृथक्-पृथक (सादयामि) मैं स्थापित करता हूं। (यत्कामः) जिस कामना वाला, (इदम्) इस जल को, यह (अहम्) मैं (वः) तुम ब्रह्मज्ञों के लिए (अभिषिञ्चामि) अभिषिक्त करता हूं, सींचता हूं (तत् सर्वम्) वह सब काम्य वस्तु (में) मेरी (संपद्यताम्) सम्पन्न हो, पूर्ण हो जाय (वयम्) और हम (रयीणाम्) योग विभूतियों के (पतयः स्याम) स्वामी हो जाएं।

    टिप्पणी

    [मन्त्र के प्रथमार्ध में अन्न द्वारा सत्कार पाने के समय, जलपान तथा हस्त-प्रक्षालन के लिए जल, प्रत्येक को देने का निर्देश है। पेयजल स्वच्छ, मधुर होना चाहिए, जो कि मानो घृतस्रावी होता है, घृतवत् पौष्टिक तथा आयुवर्धक होता है। मन्त्र के द्वितीयार्ध में ब्रह्मज्ञों के मुख तथा हस्त प्रक्षालन के लिये जल सींचा जाता है। इस द्वारा अन्नसत्कार पूर्ण हो जाता है। यह अतिथियज्ञ जैसा सत्कर्म हैं। योगाभ्यासी निज कामना की सम्पन्नता इन योग-गुरुओं द्वारा चाहता है, और यह भी चाहता है कि आश्रम वासी सभी योगाभ्यासी योग की सम्पत्तियों अर्थात् विभूतियों के स्वामी बन जाएं। प्रकरणानुसार, कामना वाला व्यक्ति, सहस्रार-चक्र में निज स्थिति चाहता है। घृतश्चुतः = घृतं क्षरणशीलं दीप्यमानं वा अमृतं श्चोतन्ति क्षरन्तीति (सायण, अथर्व० १।३३।४)]

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    विषय

    ‘शतौदना’ नाम प्रजापति की शक्ति का वर्णन।

    भावार्थ

    मैं यज्ञशील पुरुष (ब्रह्मणां हस्तेषु) ब्राह्मण, वेद के विद्वानों के हाथों में (देवीः) दिव्य गुण वाली (मधुमतीः) मधुर रसवाली (घृतश्चुतः) घृत आदि पुष्टिकारक पदार्थ और तेज को उत्पन्न करने वाली (अपः) जल रूप प्रजाओं को (प्र पृथक् सादयामि) पृथक् पृथक् सौंपता हूं (यत्कामः) जिस अभिलाषा से (इदम्) यह (अहम्) मैं (वः) आप लोगों का (अभिषिञ्चामि) अभिषेक करता हूं। अर्थात् प्रजाओं में आप लोगों को उच्च पद पर प्रतिष्ठित करता हूं (तत्) वह मेरी अभिलाषा (सर्वं सम्पद्यताम्) सब पूरी हो। और (वयम्) हम सब (रयीणां) धन सम्पत्तियों के स्वामी हों। जल हाथ में लेकर दान करने की शैली का यही मूल है। राजा विद्वान् ब्राह्मणों को पृथक् पृथक् प्रदेशों में मान आदरपूर्वक पवित्र जलों द्वारा अभिषिक्त कर उनको अधिकारी रूप से प्रतिष्ठित करें। और सब धन धान्य सम्पत्ति से युक्त हों। इस प्रकार विद्वानों के हाथ में राज्य के भागों को देना ही वेदसम्मत दान है। ऐसे विद्वानों के हाथ में भूमि के सौंपने से वह समस्त रत्नों, अन्नों, पशु और घी-दूध आदि पुष्टिकारक पदार्थों को प्रसव करती है। इस सूक्त से गौ मार कर होम करने आदि का जो अर्थ निकालते हैं वे भूल में हैं। समस्त सूक्त में कहीं मारने आदि का सम्बन्ध नहीं है। यदि मारने आदि का प्रसङ्ग होता तो उससे तो रुधिर, वसा, मांस आदि प्राप्त होता, घी, दूध, दही और मधु पदार्थ कभी प्राप्त न होते।

    टिप्पणी

    ‘इमा आपोमधु’ (तृ०) ‘यत्कामेदं’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता शतोदना देवता। १ त्रिष्टुप्, २- ११, १३-२४ अनुष्टुभः, १२ पथ्यापंक्तिः, २५ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुप्, २६ पञ्चपदा बृहत्यनुष्टुप् उष्णिग्गर्भा जगती, २७ पञ्चपदा अतिजगत्यनुष्टुब् गर्भा शक्वरी। सप्तविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Shataudana Cow

    Meaning

    I pour streams of divine waters and Vedic voices replete with the sweetness of love as honey and grace of reverence as flavour of ghrta into the hands of Vedic priests, to each one separately. Whatever desire I address to you in faith with prayer, may that be fulfilled. I pray may we all be masters of wealth, honour and excellences of life with total fulfilment.

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    Translation

    These divine waters, rich in sweetness and dripping melted butter, I place separately in the hands of the intellectual persons (brahmaņām). The desire, with which I sprinkle you may all that be fulfilled completely. May we become the masters of the riches,

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    Translation

    I, the performer of Yajna separately sprinkle celestial, sweet ghee-sprinkled waters and eatables in the hands of the per-sons who are the knowers of the Vedas, Let that of all my wish desiring which I sprinkle you, O learned Priests ! be perfectly fulfilled and may we be the master of plentiful wealth.

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    Translation

    In the hands of a scholar of the Vedas, I lay in separate order the Vedic verses, divine, full of the knowledge of God, and the showerers of truth. O learned persons, as here I initiate Ye in Vedic mysteries, may all my wishes be granted unto me in perfect fulness. May we have ample wealth of different sorts of knowledge.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २७−(अपः) व्यापनशीला वेदविद्याः (देवीः) विजयिनीः (मधुमतीः) ब्रह्मज्ञानेन युक्ताः (घृतश्चुतः) अ० ३।३३।४। सारतत्त्वस्राविणीः (ब्रह्मणाम्) वेदज्ञानम् (हस्तेषु) (प्रपृथक्) अ० ६।१२२।५। नानाप्रकारेण (सादयामि) स्थापयामि (यत्कामः) यत्पदार्थं कामयमानः (इदम्) इदानीम् (अभिषिञ्चामि) अभिषिक्तान् करोमि (वः) युष्मान् (अहम्) (तत्) (मे) मह्यम् (सर्वम्) (सम् पद्यताम्) सम्पन्नं साधितं भवतु (वयम्) (स्याम) (पतयः) स्वामिनः (रयीणाम्) नानाधनानाम् ॥

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