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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 9 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 1
    ऋषिः - अथर्वा देवता - शतौदना (गौः) छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - शतौदनागौ सूक्त
    173

    अघाय॒तामपि॑ नह्या॒ मुखा॑नि स॒पत्ने॑षु॒ वज्र॑मर्पयै॒तम्। इन्द्रे॑ण द॒त्ता प्र॑थ॒मा श॒तौद॑ना भ्रातृव्य॒घ्नी यज॑मानस्य गा॒तुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒घ॒ऽय॒ताम् । अपि॑ । न॒ह्य॒ । मुखा॑नि । स॒ऽपत्ने॑षु । वज्र॑म् । अ॒र्प॒य॒ । ए॒तम् । इन्द्रे॑ण । द॒त्ता । प्र॒थ॒मा । श॒तऽओ॑दना । भ्रा॒तृ॒व्य॒ऽघ्नी । यज॑मानस्य । गा॒तु: ॥९.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अघायतामपि नह्या मुखानि सपत्नेषु वज्रमर्पयैतम्। इन्द्रेण दत्ता प्रथमा शतौदना भ्रातृव्यघ्नी यजमानस्य गातुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अघऽयताम् । अपि । नह्य । मुखानि । सऽपत्नेषु । वज्रम् । अर्पय । एतम् । इन्द्रेण । दत्ता । प्रथमा । शतऽओदना । भ्रातृव्यऽघ्नी । यजमानस्य । गातु: ॥९.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 9; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (3)

    विषय

    वेदवाणी की महिमा का उपदेश।

    पदार्थ

    [हे वेदवाणी !] (अघायताम्) बुरा चीतनेवालों के (मुखानि) मुखों को (अपि नह्य) बाँध दे, (सपत्नेषु) वैरियों पर (एतम् वज्रम्) इस वज्र को (अर्पय) छोड़। [तू] (इन्द्रेण) परमेश्वर करके (दत्ता) दी हुई, (प्रथमा) पहिली (शतौदना) सैकड़ों प्रकार सींचनेवाली [वेदवाणी] (भ्रातृव्यघ्नी) शत्रु को नाश करनेवाली (यजमानस्य) यजमान [श्रेष्ठकर्म करनेवाले] का (गातुः) मार्ग [है] ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को योग्य है कि जिस सर्वहितकारिणी वेदवाणी को परमेश्वर ने सृष्टि की आदि में दिया है, उस के द्वारा सुशिक्षित होकर अपने व्यवहारों को सुधारें ॥१॥

    टिप्पणी

    १−(अघायताम्) अ० १०।४।१०। अघमिच्छताम् (अपि) सर्वथा (नह्य) सांहितिको दीर्घः। बधान (मुखानि) (सपत्नेषु) शत्रुषु (वज्रम्) (अर्पय) क्षिप (एतम्) (इन्द्रेण) परमेश्वरेण (दत्ता) आविष्कृता (प्रथमा) सृष्ट्यादौ जाता (शतौदना) उन्देर्नलोपश्च। उ० २।७६। शत+उन्दी क्लेदने युच्, टाप्। ओदनो मेघः-निघ० १।१०। ओदनमुदकदानं मेघम्-निरु० ६।३४। शतप्रकारेण ओदनः सेचनं यस्याः सा वेदवाणी (भ्रातृव्यघ्नी) शत्रुनाशनी (यजमानस्य) श्रेष्ठकर्मकर्तुः (गातुः) अ० २।३४।२। गाङ् गतौ-तु। मार्गः ॥

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    विषय

    शतौदना' वेदवाणी

    पदार्थ

    १. इस सूक्त में वेदवाणी को ही 'शतौदना' कहा है-यह शतवर्षपर्यन्त हमारे जीवनों को सुख से सिक्त करती है [उन्दी क्लेदने]। इस वेदवाणी को प्राप्त करनेवाला 'अथर्वा'-स्थिर वृत्तिवाला [न थर्व] पुरुष है । यह अथर्वा ही इस सूक्त का ऋषि है। वह वेदवाणी को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि (अघायताम्) = पाप की कामनावालों के-दूसरों का अशुभ चाहनेवालों के-(मुखानि अपिह्ना) = मुखों को बाँध दे तथा (सपत्नेषु)-शत्रुओं पर (एतं वज्रम् अर्पय) = इस वन को अर्पित कर, अर्थात् तेरे अध्ययन से न तो मनुष्य औरों का अशुभ चाहने की वृत्तिवाला होता है और न ही काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं का शिकार होता है। २. यह वेदवाणी (इन्द्रेण दत्ता) = उस शत्रुविद्रावक परमैश्वर्यशाली प्रभु से दी गई है। (प्रथमा) = तू [प्रथ विस्तारे] अधिक से-अधिक शक्तियों के विस्तारवाली है। (शतौदना) = शतवर्षपर्यन्त हमें शक्ति से सिक्त करनेवाली है। (भातृव्यघ्नी) = शत्रुओं को नष्ट करनेवाली है। यह वेदवाणी (यजमानस्य गातुः) = यज्ञशील पुरुष की मार्गदर्शिका है। यज्ञों का प्रतिपादन करती हुई यह वेदवाणी अपने अध्येता को यज्ञों में प्रवृत्त करती है।

    भावार्थ

    वेदवाणी हमें किसी की भी अशुभकामना से रोकती है, यह हमारे रोगरूप शत्रुओं को नष्ट करती है। प्रभु इसे सृष्टि के प्रारम्भ में हमारे लिए देते हैं। यह हमारी शक्तियों का विस्तार करती हुई शतवर्षपर्यन्त हमें सुखों से सिक्त करती है। काम-क्रोध आदि शत्रुओं को विनष्ट करती है।

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    भाषार्थ

    (अघायताम्) पापकर्म चाहने वालों के (मुखानि) मुखों को (अपि नह्य) बान्ध दे, (सपत्नेषु) शत्रुओं पर (एतम् वज्रम्) इस वज्र को (अर्पय) अर्पित कर, प्रेरित कर। (इन्द्रेण) इन्द्र द्वारा (दत्ता) दी गई (प्रथमा) श्रेष्ठ या अनादि (शतौदना) सैकड़ों ओदनों वाली, (भ्रातृव्यघ्नी) तथा शत्रुरूप भावों, विचारों, कर्मों का हनन करने वाली हे पारमेश्वरी मातः ! तू हो, तथा (यजमानस्य) यजमान के लिये (गातुः) मार्गरूप हो।१

    टिप्पणी

    [यजमानस्य = तेरा जो पूजन, सत्संग करता, और तेरे प्रति आत्मसमर्पण करता है, उसे तू हे पारमेश्वरी मातः ! मार्ग प्रदर्श करती है। आघायताम् = अघम् (पापम्) + क्यच (छन्दसि परेच्छायामपि) + शतृ = दूसरों के प्रति पापकर्म चाहने वालों के मुखों को बांधने का अभिप्राय है उन पर प्रतिबन्ध लगा देना ताकि वे पापों का प्रचार न कर सकें। सपत्नेषु = पापकर्म, शत्रु हैं। इन पर तू हे मातः! वज्र प्रहार कर, ताकि ये पनपने न पाएं। इन्द्रेण= इदि परमैश्वर्ये। अध्यात्म सम्पत्ति से सम्पन्न आत्मा द्वारा पारमेश्वरी माता के दर्शन कराए जा सकते हैं, यह है उस का दान। शतौदना है पारमेश्वरी माता। वह सैकड़ों प्रकार के ओदन भोज्य पदार्थ दे रही है। भ्रातृव्यघ्नी= पारमेश्वरी माता भातृव्यों अर्थात् सपत्नरूप पाप विचारों तथा पापकर्मों का हनन करती है। "व्यन्सपत्ने" (अष्टा० ४।१‌।१४५) द्वारा भ्रातृव्य का अर्थ है सपत्न अर्थात् शत्रु। यथा "पाप्मा भ्रातृव्येण" (अथर्व० ५।२२।१२) में पाप को भ्रातृव्य अर्थात् शत्रु कहा है। इस प्रकार सूक्त ९ में पारमेश्वरी माता का वर्णन शतौदना [गौ] के रूप में हुआ है। गौ भी सैकड़ों प्रकार के ओदन आदि भोज्य पदार्थ देती है। यथा– दूध, दधि, घृत; तथा बैलों द्वारा कृष्यन्न। समग्र सूक्त में गौ नाम पठित नहीं। यद्यपि गौ के अङ्गों का वर्णन हुआ है। इन अङ्गों के वास्तविक अर्थ भी दर्शा दिये हैं। मन्त्र १२-२४ में अमिक्षा, क्षीर, सर्पिः के साथ मधु का भी वर्णन हुआ है। मधु गौ द्वारा प्राप्त नहीं होता न मधु पद क्षीरम् का विशेषण है। क्योंकि “अथो" द्वारा इस का वर्णन पृथक् रूप में हुआ है]। [१. सायणाचार्य के शब्दों में सूक्त का याज्ञिक विनियोग। यथा– "अघायतामिति सूक्तम् आहूत्यर्थगोवधे विनियुज्यते। सा व वन्ध्या गौः शतौदनेत्युच्यते। तस्या वधेन, तस्या मांसाहुत्या च यद् यजनं, तत् अग्निष्टोमादपि अतिरात्रादपि च श्रेष्ठम् इत्यादि रूपाप्रशंसा। या इयं हन्यते तां प्रति ''हन्तृभ्यो मा भैषी:, त्वं देवी भविष्यसि, त्वां स्वर्गे देवा गोप्स्यन्तीत्यादि प्रोत्साहनम्"।]

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Shataudana Cow

    Meaning

    O divine Mother, shut the mouths of sinners and criminals. Upon the adversaries, strike this thunderbolt. Mother gift of Indra’s, first giver of a hundred nourishments, is the destroyer of enemies and a guide for the yajamana in his journey through life.

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    Subject

    Śataudanā (Hundred Rice Dishes)

    Translation

    May you bind the mouths of those, who intend to commit sin; may you hurl this adamantine weapon upon the rivals. The Šataudana (worth a hundred measures of rice) cow, first given by the resplendent Lord, is destroyer of rivals of the worshipful sacrificer.

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    Translation

    [N.B.: In this hymn we find the description of Cow which has been called Shataudana. The term Shataudama described the multifarious preparations of the milk of Cow. Those who think that Cow would be prepared in hundred kinds of food are wrong. Cow is not to be killed as it is Aghnya. Its meat is not eatable as it creates tuber-culosis. So to prepare hundreds of dishes from cow is absurd. Odana means pouring or sprinkling. In hundred ways the Cow’s milk is poured or sprinkled in food etc. Milk produces curd, butter, ghee and other preparations made from them. Therefore it should be taken here correctly that hundred kinds of drinks and eatable can be prepared from the milk of cow. Cow is Shataudana because its milk is the source of hundred kinds of preparations. Cow is also Shataudana as its milk gives hundred preparations for yajna.]O King! bind the mouth of the enemies and cast Deadly weapon against the foes. The Shataudana (whose milk used in hundred kinds of preparations) first given by Indra, the Almighty Lord is the destroyer of foes-like diseases and is the pathway of Yajmana, the performer of yajna.

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    Translation

    O Vedic speech, bind the mouths of the sinners, cast this bolt of thunder against my rivals. God revealed in the beginning of creation, the foe-destroying Veda, the guide of the worshippers.

    Footnote

    Veda is spoken of as Sataudna as it fulfils hundreds of requirements of mankind.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १−(अघायताम्) अ० १०।४।१०। अघमिच्छताम् (अपि) सर्वथा (नह्य) सांहितिको दीर्घः। बधान (मुखानि) (सपत्नेषु) शत्रुषु (वज्रम्) (अर्पय) क्षिप (एतम्) (इन्द्रेण) परमेश्वरेण (दत्ता) आविष्कृता (प्रथमा) सृष्ट्यादौ जाता (शतौदना) उन्देर्नलोपश्च। उ० २।७६। शत+उन्दी क्लेदने युच्, टाप्। ओदनो मेघः-निघ० १।१०। ओदनमुदकदानं मेघम्-निरु० ६।३४। शतप्रकारेण ओदनः सेचनं यस्याः सा वेदवाणी (भ्रातृव्यघ्नी) शत्रुनाशनी (यजमानस्य) श्रेष्ठकर्मकर्तुः (गातुः) अ० २।३४।२। गाङ् गतौ-तु। मार्गः ॥

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