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अथर्ववेद के काण्ड - 10 के सूक्त 9 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 9/ मन्त्र 16
    ऋषिः - अथर्वा देवता - शतौदना (गौः) छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - शतौदनागौ सूक्त
    39

    यत्ते॒ यकृ॒द्ये मत॑स्ने॒ यदा॒न्त्रं याश्च॑ ते॒ गुदाः॑। आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । ते॒ । यकृ॑त् । ये इति॑ । मत॑स्ने॒ इति॑ । यत् । आ॒न्त्रम् । या: । च॒ । ते॒ । गुदा॑:। अ॒मिक्षा॑म् । दु॒ह्र॒ता॒म् । दा॒त्रे । क्षी॒रम् । स॒र्पि:। अथो॒ इति॑ । मधु॑ ॥९.१६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्ते यकृद्ये मतस्ने यदान्त्रं याश्च ते गुदाः। आमिक्षां दुह्रतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । ते । यकृत् । ये इति । मतस्ने इति । यत् । आन्त्रम् । या: । च । ते । गुदा:। अमिक्षाम् । दुह्रताम् । दात्रे । क्षीरम् । सर्पि:। अथो इति । मधु ॥९.१६॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 9; मन्त्र » 16
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    वेदवाणी की महिमा का उपदेश।

    पदार्थ

    (यत्) जो (ते) तेरा (यकृत्) कलेजा, (ये) जो (मतस्ने) दो मतस्ने [गुर्दे], (यत्) जो (आन्त्रम्) आँत (च) और (याः) जो (ते) तेरी (गुदाः) गुदा [मलत्याग नाड़ियाँ] हैं, वे सब (आमिक्षाम्) आमिक्षा .....म० १३ ॥१६॥

    भावार्थ

    मन्त्र १३ के समान है ॥१६॥

    टिप्पणी

    १६−(यकृत्) अ० ९।७।११। कालखण्डम् (मतस्ने) अ० २।३३।३। ग्रीवाधस्ताद्भागस्थितहृदयोभयपार्श्वस्थे अस्थिनी (आन्त्रम्) अ० २।३३।४। उदरनाडीविशेषः (गुदाः) अ० २।३३।४। मलत्यागनाड्यः। अन्यत् स्पष्टम् ॥

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    विषय

    आमिक्षा, क्षीर, सर्पि, मधु

    पदार्थ

    १. हे वेदधेनो! (यत् ते शिर:) = जो तेरा सिर है, (यत् ते मुखम्) = जो तेरा मुख है, (यौ कर्णौ) = जो कान हैं, (ये च ते हनू) = और जो तेरे जबड़े हैं। इसी प्रकार (यौ ते ओष्ठौ) = जो तेरे ओष्ठ हैं, ये नासिके जो नासाछिद्र हैं, (ये शङ्गे) = जो सींग हैं, (ये च ते अक्षिणी) = जो तेरी आँखें हैं। (यत् ते क्लोमा) = जो तेरा फेफड़ा है (यत् हृदयम्) = जो हृदय है, (सहकण्ठिका पुरीतत्) = कण्ठ के साथ मल की बड़ी आँत है, (यत् ते यकृत्) = जो तेरा कलेजा है, (ये मतस्ने) = जो गुर्दे हैं, (यत् आन्त्रम्) = जो आँत है, (याः च ते गुदा) = और जो तेरी मलत्याग करनेवाली नाडियाँ हैं। (यः ते प्लाशि:) = जो तेरी अन्न की आधारभूत आँत है, (य: वनिष्ठुः) = जो अन्त:रक्त को बाँटनेवाली आँत है, (यौ कक्षी) = जो कुक्षिप्रदेश हैं, (यत् च ते चर्म) = और जो तेरी चमड़ी है, २. ये सब-के-सब अवयव अर्थात् भिन्न-भिन्न लोक-लोकान्तरों व पदार्थों का ज्ञान (दात्रे) = तेरे प्रति अपने को देनेवाले के लिए [दादाने] वासनाओं का विनाश करनेवाले के लिए [दाप लवने] और इसप्रकार अपने जीवन को शुद्ध बनानेवाले के लिए [दैप शोधने] (आमिक्षाम्) = [तसे पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवी आमिक्षा भवति] गर्म दूध में दही के मिश्रण से उत्पन्न पदार्थ को (क्षीरः सर्पिः अथो मधु) = दूध, घृत व शहद को (दुह्रताम्) = दूहें-प्राप्त कराएं।

    भावार्थ

    वेदज्ञान हमारे लिए 'आमिक्षा-सर्पि, क्षीर व मधु' को प्राप्त कराता है, अर्थात् हमें इनके प्रयोग के लिए प्रेरित करता है।

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    भाषार्थ

    (यत् ते) जो तेरा (यकृत्) जिगर, (ये) जो (मतस्ने) दो गुर्दे (यद् आन्त्रम्) जो स्थूल आन्त, (याः च) और जो (ते गुदाः) तेरी गुदा के अवयव है, वे दाता के लिये आमिक्षा, क्षीर, सर्पिः और मधु प्रदान करें।

    टिप्पणी

    [यकृत्=Liver। १मतस्ने=दो गुर्दे, जो कि मदकारी मूत्र को स्रावित कर शुद्धि करते रहते हैं, मत (मद्) + स्ने (ष्णा शौचे अदादिः) आन्त्रम् =Colon स्थूलान्त्र। तथा यकृत्= मेधा (अथर्व० ९।१२(७)।११)। गुदाः= देवजनाः (अथर्व० ९।११(७)।१६)। ये ब्रह्माण्ड गौ के अवयव हैं]। [१. मतस्नाभ्याम्= वृक्याभ्याम् (सायण, अथर्व० २।३३।३)।वृक्कौ= क्रोधः (अथर्व० ९। १२ (७।१३)।]

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    विषय

    ‘शतौदना’ नाम प्रजापति की शक्ति का वर्णन।

    भावार्थ

    (यत् ते यकृद्) जो तेरा कलेजा है, (ये मतस्त्रे) जो गुर्दे हैं, (यद् आन्त्रम्) जो आंतें हैं, (याः च ते गुदाः) जो तेरी गुदा भाग की आंत हैं,

    टिप्पणी

    (द्वि०) ‘यान्त्राणि’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता शतोदना देवता। १ त्रिष्टुप्, २- ११, १३-२४ अनुष्टुभः, १२ पथ्यापंक्तिः, २५ द्व्युष्णिग्गर्भा अनुष्टुप्, २६ पञ्चपदा बृहत्यनुष्टुप् उष्णिग्गर्भा जगती, २७ पञ्चपदा अतिजगत्यनुष्टुब् गर्भा शक्वरी। सप्तविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Shataudana Cow

    Meaning

    Let that which is your liver, your kidneys, your intestines and the colon yield curd and cheese, milk, ghrta and the honey sweets of life’s nourishments for the generous giver.

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    Translation

    May your this liver (Yakrt), these two kidneys (matasnā), these entrails and your these intestines (antra), yield to your donor mingled curd, milk, melted butter and honey as well.

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    Translation

    Let the liver of it, let the kidneys of it, let the entrails and the Parts within pour Amiksha and the sweet milk for the giver,

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    Translation

    Let liver, and let kidneys, let thine entrails, and let anus-arteries, grant for a charitably disposed person, curd, milk, butter and the knowledge of God.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १६−(यकृत्) अ० ९।७।११। कालखण्डम् (मतस्ने) अ० २।३३।३। ग्रीवाधस्ताद्भागस्थितहृदयोभयपार्श्वस्थे अस्थिनी (आन्त्रम्) अ० २।३३।४। उदरनाडीविशेषः (गुदाः) अ० २।३३।४। मलत्यागनाड्यः। अन्यत् स्पष्टम् ॥

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