अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 17/ मन्त्र 1
ऋषिः - अथर्वा
देवता - मन्त्रोक्ताः
छन्दः - उपजगती
सूक्तम् - सुरक्षा सूक्त
127
अ॒ग्निर्मा॑ पातु॒ वसु॑भिः पु॒रस्ता॒त्तस्मि॑न्क्रमे॒ तस्मि॑ञ्छ्रये॒ तां पुरं॒ प्रैमि॑। स मा॑ रक्षतु॒ स मा॑ गोपायतु॒ तस्मा॑ आ॒त्मानं॒ परि॑ ददे॒ स्वाह॑ ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒ग्निः। मा॒। पा॒तु॒। वसु॑ऽभिः। पु॒रस्ता॑त्। तस्मि॑न्। क्र॒मे॒। तस्मि॑न्। श्र॒ये॒। ताम्। पुर॑म्। प्र। ए॒मि॒। सः। मा॒। र॒क्ष॒तु॒। सः। मा॒। गो॒पा॒य॒तु॒। तस्मै॑। आ॒त्मान॑म्। परि॑। द॒दे॒। स्वाहा॑। १७.१॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्निर्मा पातु वसुभिः पुरस्तात्तस्मिन्क्रमे तस्मिञ्छ्रये तां पुरं प्रैमि। स मा रक्षतु स मा गोपायतु तस्मा आत्मानं परि ददे स्वाह ॥
स्वर रहित पद पाठअग्निः। मा। पातु। वसुऽभिः। पुरस्तात्। तस्मिन्। क्रमे। तस्मिन्। श्रये। ताम्। पुरम्। प्र। एमि। सः। मा। रक्षतु। सः। मा। गोपायतु। तस्मै। आत्मानम्। परि। ददे। स्वाहा। १७.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
रक्षा करने का उपदेश।
पदार्थ
(अग्निः) ज्ञानस्वरूप परमेश्वर (वसुभिः) श्रेष्ठ गुणों के साथ (मा) मुझे (पुरस्तात्) पूर्व वा सामने से (पातु) बचावे, (तस्मिन्) उसमें [उस परमेश्वर के विश्वास में] (क्रमे) मैं पद बढ़ाता हूँ, (तस्मिन्) उसमें (श्रये) आश्रय लेता हूँ, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति [वा दुर्गरूप परमेश्वर] को (प्र) अच्छे प्रकार (एमि) प्राप्त होता हूँ। (सः) वह [ज्ञानस्वरूप परमेश्वर] (मा) मुझे (रक्षतु) बचावे, (सः) वह (मा) मुझे (गोपायतु) पाले, (तस्मै) उसको (आत्मानम्) अपना आत्मा [मनसहित देह और जीव] (स्वाहा) सुन्दर वाणी [दृढ़ प्रतिज्ञा] के साथ (परि ददे) मैं सौंपता हूँ ॥१॥
भावार्थ
जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा पालने में आत्मसमर्पण करते हैं, वे प्रत्येक स्थान पर उस परमात्मा की छत्र-छाया में ऐसे सुरक्षित रहते हैं, जैसे शूरवीर पुरुष दुर्ग में सुरक्षित होते हैं ॥१॥
टिप्पणी
इस सूक्त का मिलान करो-अ०३।२७।१-६ तथा १२।३।२४॥१−(अग्निः) ज्ञानस्वरूपः परमेश्वरः (मा) माम् (पातु) रक्षतु (वसुभिः) श्रेष्ठगुणैः (पुरस्तात्) पूर्वस्यां दिशि, अभिमुखीभूतायां वा (तस्मिन्) ज्ञानस्वरूपे परमेश्वरे (क्रमे) क्रमु पादविक्षेपे। पादं विक्षिपामि (तस्मिन्) (श्रये) श्रिञ् सेवायाम्। आश्रयामि (ताम्) प्रसिद्धाम् (पुरम्) पुर अग्रगमने-क्विप्। अग्रगामिनीं दुर्गरूपां वा शक्तिं परमात्मानम् (प्र) प्रकर्षेण (एमि) गच्छामि। प्राप्नोमि (सः) ज्ञानस्वरूपपरमेश्वरः (मा) (रक्षतु) (सः) (मा) (गोपायतु) पालयतु (तस्मै) परमेश्वराय (आत्मानम्) स्वात्मानम्। मनःसहितं देहं जीवं च (परि ददे) समर्पयामि (स्वाहा) अ०२।१६।१। सु+आङ्+ह्वेञ् आह्वाने-डा, वलोपः स्वाहा वाङ्नाम-निघ०१।११। सुवाण्या। दृढप्रतिज्ञया ॥
विषय
'अग्नि' वसुओं के साथ पूर्व में
पदार्थ
१. (अग्निः) = वह अग्रणी प्रभु-हमें निरन्तर आगे और आगे ले-चलनेवाले प्रभु (मा) = मुझे (वसुभि:) = निवास के लिए सब आवश्यक तत्त्वों के साथ (पुरस्तात्) = पूर्व दिशा की ओर से (पातु) = रक्षित करें। मैं उस प्रभु को सामने स्थित अनुभव करूँ जोकि मुझे प्रेरणा देते हुए आगे ले-चले रहे हैं और निवास के लिए आवश्यक सब तत्त्वों को प्राप्त करा रहे हैं। २. (तस्मिन् क्रमे) = उस प्रभु में स्थित होता हुआ मैं गतिशील होता हूँ। तस्मिन् श्रये उसी में आश्रय करता हूँ और इसप्रकार (तां पुरं प्रैमि) = उस ब्रह्मनगरी की ओर [प्र] निरन्तर बढ़ता हूँ। (स:) = वह प्रभु (मा रक्षतु) = मुझे रोगों से बचाए। (स:) = वे प्रभु (मा) = मुझे (गोपायतु) = मन में वासनाओं के आक्रमण से सुरक्षित करे । (तस्मा) = उस प्रभु के लिए (आत्मानं परिददे) = अपने को दे डालता हूँ। (स्वाहा) = [स्व आ हा] अपने को सर्वथा उस प्रभु में त्याग देता हूँ। प्रभु में अपने को समर्पित कर देता हूँ।
भावार्थ
मैं पूर्व दिशा में उस अग्रणी प्रभु को स्थित अनुभव करूँ, जोकि मुझे निवास के लिए सब आवश्यक तत्त्वों को प्राप्त करा रहे हैं। इस प्रभु की ओर ही, कर्त्तव्यकों के करने के द्वारा बढ़ चलूँ। ब्रह्मपुरी में पहुँचने को अपना लक्ष्य बनाऊँ। प्रभु के प्रति अपने को दे डालूँ। प्रभु में प्रवेश कर जाऊँ, उनकी गोद में पहुँच जाऊँ।
भाषार्थ
(वसुभिः) वसुओं के साथ वर्तमान (अग्निः) प्राकृतिक अग्नियों में प्रविष्ट परमेश्वराग्नि (पुरस्तात्) पूर्व से (मा) मेरी (पातु) रक्षा करे। (तस्मिन्) उस परमेश्वराग्नि में (क्रमे) मैं विचरता हूँ, (तस्मिन्) उसमें (श्रये) मैं आश्रय पाता हूँ। (ताम्) उस (पुरम्) दुर्गरूप परमेश्वर को (प्रैमि) मैं प्राप्त होता हूँ। (सः) वह परमेश्वराग्नि (मा रक्षतु) मेरी रक्षा करे। (सः) वह (मा) मेरी (गोपायतु) पूर्ण रक्षा करे। (तस्मै) उसके प्रति (आत्मानम्) अपने आप को या आत्मा को (परि ददे) भक्ति और श्रद्धा से भेंट करता हूँ, (स्वाहा) आहुत करता हूँ, समर्पित करता हूँ।
टिप्पणी
[अग्निः= प्राकृतिक अग्नि पाक तथा शिल्प आदि द्वारा हमारी रक्षा करती है। परन्तु इस में इस प्रकार की रक्षा की शक्ति तब तक है, जब तक कि इसमें अधिष्ठित परमेश्वर इसके स्वरूप को बनाए रखता है। इसका स्वरूप और इसमें विद्यमान रक्षाशक्ति, इसमें विद्यमान परमेश्वरीय प्रेरणा द्वारा जनित है। इसीलिए कहा है कि— “अग्नावग्निश्चरति प्रविष्टः” (अथर्व० ४.३९.९)। जिन गुणधर्मों के कारण अग्नि को कहा जाता है, उन गुणधर्मों की पराकाष्ठा परमेश्वर में है। अतः मुख्यरूप से अग्नि परमेश्वर है। इसी प्रकार वायु आदि नाम भी मुख्यरूप से परमेश्वर के वाचक हैं। इसीलिए कहा है कि— तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रन्तद्ब्रह्म ताऽआपः स प्रजापतिः।। यजु० ३२. १।। तथा—“एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः” (ऋ० १.१६४.४६)। आगे आने वाले मन्त्रों में भी वायु सोम वरुण आदि नामों द्वारा गौणरूप से प्राकृतिक पदार्थ, और मुख्यरूप से इनमें अधिष्ठित और नियामक परमेश्वर का ग्रहण समझना चाहिए। वसुभिः= निवास के साधनों द्वारा। वसु ८ हैं—पृथिवी, जल, अग्नि, अन्तरिक्ष, वायु, चन्द्रमा और नक्षत्र तथा आदित्य। इनके द्वारा हमारा निवास हो रहा है। समग्र आग्नेय पिण्डों अर्थात् सूर्य चन्द्र नक्षत्रों और ताराओं का उदय पूर्व से हो रहा है, इसलिए मन्त्र में “पुरस्तात्” कहा है। ये सब आग्नेय पिण्ड परमेश्वरीय शक्ति से सम्पन्न होकर उदित होते हैं। इसलिए परमेश्वरसहित इन सब आग्नेय पिण्डों को मन्त्र में “अग्नि” पद द्वारा निर्दिष्ट किया है। मन्त्र में शेष भाग में परमेश्वर का साक्षात् वर्णन है, जिसके प्रति उपासक आत्म-समर्पण करता है।]
विषय
रक्षा की प्रार्थना।
भावार्थ
(अग्निः) अग्रणी, ज्ञानवान् (पुरस्तात्) आगे से या पूर्व की दिशा से (वसुभिः) वसुओं सहित (मा पातु) मेरी रक्षा करे। मैं (तस्मिन्) उसके बलपर या उसपर (क्रमे) आगे पग बढ़ाऊं या उसे वश करूं (तस्मिन् श्रये) मैं उसी में आश्रय लूं (तां) उसीको (पुरम्) अपनी पालक दुर्गनगरी समझकर (प्रैमि) उसको प्राप्त करूं। (स मा रक्षतु) वह मेरी रक्षा करे। (स मा गोपायतु) वह मुझे बचाये रखे। (तस्मै) उसी के हाथों (आत्मानं परिददे) मैं अपने आपको सौंपता हूं। (सु-आहा) यही मेरी उत्तम आहुति है, या त्याग है। इन दशों मन्त्रों में परमेश्वर से रक्षा की प्रार्थना है। राष्ट्र के पक्ष में—भिन्न दिशा के भिन्न भिन्न अधिकारियों या राजा के भिन्न भिन्न गुणों द्वारा उनसे रक्षा की प्रार्थना है। या आधिभौतिक शक्तियों को वश करें, वह वास योग्य अनादि पदार्थों से हमारी रक्षा करें।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अथर्वा ऋषिः। मन्त्रोक्ता देवताः । १-४ जगत्यः। ५, ७, १० अतिजगत्यः, ६ भुरिक्, ९ पञ्चपदा अति शक्वरी। दशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Protection and Security
Meaning
May Agni, leading light of life on earth, with Vasus, life sustaining powers and energies, protect and promote me forward from the front direction. Therein I advance. Therein I rest and sustain myself. That life and light I attain to. May that guard me. May that preserve me. To that I offer myself life and soul. Thus do I surrender in truth of word and deed.
Subject
To Various Gods for protection
Translation
May the adorable Lord (Agni) along with the Vasus (young sages) guard me from the east. I step in Him; in Him I take shelter; to that castle do I go. May He defend me; may He protect me. To Him I totally surrender myself. Sváhá (hail).
Translation
Agni, the self-refulgent God guard me with the Vasus (the fight Vasus) from east. I walk in Him, I rest in and I seek this place for refuge (in Him). May He protect me, may He preserve me and I surrender soul to Him. Svaha‘(i.e.) this is my appreciation.
Translation
May Radiant and All-Leading God protect me through Vasus, from the east or front side. I (a devotee) just step unto Him and take refuge under Him. I approach Him as a well-protected residential town. May He protect me. May He guard me I entrust myself completely to Him as an humble offering.
Footnote
The whole of this sukta can be applied to various forces of nature as well as various officers entrusted with different kinds of duties by the king.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
इस सूक्त का मिलान करो-अ०३।२७।१-६ तथा १२।३।२४॥१−(अग्निः) ज्ञानस्वरूपः परमेश्वरः (मा) माम् (पातु) रक्षतु (वसुभिः) श्रेष्ठगुणैः (पुरस्तात्) पूर्वस्यां दिशि, अभिमुखीभूतायां वा (तस्मिन्) ज्ञानस्वरूपे परमेश्वरे (क्रमे) क्रमु पादविक्षेपे। पादं विक्षिपामि (तस्मिन्) (श्रये) श्रिञ् सेवायाम्। आश्रयामि (ताम्) प्रसिद्धाम् (पुरम्) पुर अग्रगमने-क्विप्। अग्रगामिनीं दुर्गरूपां वा शक्तिं परमात्मानम् (प्र) प्रकर्षेण (एमि) गच्छामि। प्राप्नोमि (सः) ज्ञानस्वरूपपरमेश्वरः (मा) (रक्षतु) (सः) (मा) (गोपायतु) पालयतु (तस्मै) परमेश्वराय (आत्मानम्) स्वात्मानम्। मनःसहितं देहं जीवं च (परि ददे) समर्पयामि (स्वाहा) अ०२।१६।१। सु+आङ्+ह्वेञ् आह्वाने-डा, वलोपः स्वाहा वाङ्नाम-निघ०१।११। सुवाण्या। दृढप्रतिज्ञया ॥
बंगाली (1)
পদার্থ
স্তুতা ময়া বরদা বেদমাতা প্রচোদয়ন্তাং পাবমানী দ্বিজানাম্ ।
আয়ুঃ প্রাণং প্রজাং পশুং কীর্তিং দ্রবিণং ব্রহ্মবর্চসম্ ।মহ্যং দত্ত্বা ব্রজত ব্রহ্মলোকম্ ।।৯৭।।
(অথর্ব ১৯।৭১।১)
পদার্থঃ (বরদা) ইষ্ট ফল প্রদানকারী (বেদমাতা) জ্ঞানের উৎসরূপ বেদ মাতাকে (ময়া) আমি (স্তুতা) স্ততি করি । বিদ্বান ব্যক্তিগণ (পাবমানী) পবিত্রকারী, পরমাত্মার সন্ধান প্রদানকারী এই বেদ বাণীকে (দ্বিজানাম্) সংস্কার সম্পন্ন ব্যক্তিদের মাঝে (প্রচোদয়ন্তাম্) প্রচার করেন। বেদ মাতা (আয়ুঃ) জীবন, (প্রাণম্) আত্মিক বল, (প্রজাম্) সন্তানাদি, (পশুম্) গো, ঘোড়া আদি পশু, (কীর্তিম্) যশ, (দ্রবিণম্) ধন, (ব্রহ্মবর্চসম্) বেদাভ্যাসের তেজ (মহ্যং দত্ত্বা) আমায় দিয়ে (ব্রহ্মলোকম্) ব্রহ্মলোক (ব্রজত) প্রাপ্ত করান ।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ এই মন্ত্রে সকল পার্থিব এবং আত্মিক সুখ প্রাপ্তির উপদেশ রয়েছে। বেদমাতার জ্ঞান দানকারী পরমাত্মা এই পবিত্র বেদবাণীর মাধ্যমে সকল ইষ্ট ফল দেওয়ার কথা বলেছেন। এই বেদমাতার যতই প্রশংসা করা যায়, ততই কম হবে। নীতিবান বিদ্বানগণের উচিত এই ঈশ্বরীয় পবিত্র বেদবাণীকে উত্তম সংস্কারযুক্ত মনুষ্যদের মাঝে প্রচার করবে, সংসারে প্রচার করা। এই বেদমাতার কৃপা দ্বারা পুরুষগণ দীর্ঘ জীবন, আত্মবল, পুত্রকন্যাদি সন্তান, গরু ঘোড়া আদি পশু, যশ এবং পার্থিব ধন প্রাপ্ত করতে পারে। একই সাথে এই বেদবাণীর মাধ্যমে পুরুষগণ ব্রহ্মচর্যাদি পালন করে সর্বজ্ঞ, সর্বশক্তিমান পরমাত্মাকে জেনে মোক্ষ তথা ব্রহ্মলোক প্রাপ্ত করতে পারে ।।৯৭।
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