अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 22/ मन्त्र 12
ऋषिः - अङ्गिराः
देवता - मन्त्रोक्ताः
छन्दः - दैवी त्रिष्टुप्
सूक्तम् - ब्रह्मा सूक्त
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उ॑त्त॒मेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥
स्वर सहित पद पाठउ॒त्ऽत॒मेभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥२२.१२॥
स्वर रहित मन्त्र
उत्तमेभ्यः स्वाहा ॥
स्वर रहित पद पाठउत्ऽतमेभ्यः। स्वाहा ॥२२.१२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
महाशान्ति के लिये उपदेश।
पदार्थ
(उत्तमेभ्यः) अत्यन्त श्रेष्ठ [पुरुषों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥१२॥
भावार्थ
स्पष्ट है ॥१२॥
टिप्पणी
१२−(उत्तमेभ्यः) अतिश्रेष्ठपुरुषेभ्यः ॥
विषय
उपोत्तम-उत्तम-उत्तर
पदार्थ
१. गतमन्त्र के शान्तेन्द्रिय, अतएव (उपोत्तमेभ्यः) = उस उत्तमपुरुष प्रभु के समीप वास करनेवालों के लिए (स्वाहा) = हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं। २. (उत्तमेभ्यः) [ब्रह्मभूतेभ्यः] = इन उत्तम-ब्रह्मप्राप्त पुरुषों के लिए (स्वाहा) = हम शुभ शब्द बोलते हैं। ३. (उत्तरेभ्यः) = संसार-सागर को उत्तीर्ण कर गये इन पुरुषों के लिए हम (स्वाहा) = अपने को अर्पित करते हैं [स्व हा] और उनकी भाँति हम भी भवसागर को तैरने के लिए यत्नशील होते हैं।
भावार्थ
हम प्रभु की उपासना करें। प्रभु को प्राप्त करें और भवसागर से उत्तीर्ण हो जाएँ।
भाषार्थ
(उत्तमेभ्यः) उत्तम पाशों को शिथिल करने के लिए (स्वाहा) समर्पण हो॥ १२॥
विषय
अथर्व सूक्तों का संग्रह।
भावार्थ
(उपोत्तमेभ्यः उत्तमेभ्यः उत्तरेभ्यः स्वाहा ३) उत्तमों के समीप उपोत्तम, उत्तम और उत्तर इन तीन प्रकार के सूक्तों का भी ज्ञान करना चाहिये, मोक्ष विषयक सूक्त उत्तम, साधना विषयक सूक्त उपोत्तम, और कर्मकाण्ड विषयक या यज्ञ विषयक सूक्त उत्तर प्रतीत होते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अंगिरा ऋषिः। मन्त्रोक्ता देवताः। १ साम्न्युष्णिक् ३, १९ प्राजापत्या गायत्री। ४, ७, ११, १७, दैव्यो जगत्यः। ५, १२, १३ दैव्यस्त्रिष्टुभः, २, ६, १४, १६, दैव्यः पंक्तयः। ८-१० आसुर्यो जगत्यः। १८ आसुर्यो अनुष्टुभः, (१०-२० एकावसानाः) २ चतुष्पदा त्रिष्टुभः। एकविंशत्यृचं समाससूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Translation
Svaha to the hymns of the last chapter.
Translation
Attain the knowledge of excellent things and appreciate them.
Translation
The suktas that are better, the near-best and the best should be completely studied.
Footnote
(11.-13) ‘The better’: concerning sacrifice, or action. ‘The near best’—concerning preparation for salvation by yogic exercises. ‘The best’—concerning the state of bliss. Pt. Khem Karan Das Trivedi has given a different rendering to this as well as to the next hymn. But it seems to far-fetch the meanings of the numbers, given herein and the next hymn, too.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१२−(उत्तमेभ्यः) अतिश्रेष्ठपुरुषेभ्यः ॥
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