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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 22 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 22/ मन्त्र 4
    ऋषिः - अङ्गिराः देवता - मन्त्रोक्ताः छन्दः - दैवी जगती सूक्तम् - ब्रह्मा सूक्त
    34

    नी॑लन॒खेभ्यः॒ स्वाहा॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नी॒ल॒ऽन॒खेभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥२२.४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नीलनखेभ्यः स्वाहा ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नीलऽनखेभ्यः। स्वाहा ॥२२.४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 22; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    महाशान्ति के लिये उपदेश।

    पदार्थ

    (नीलनखेभ्यः) निश्चित ज्ञान प्राप्त करानेवाले [परमेश्वर के गुणों] के लिये (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥४॥

    भावार्थ

    स्पष्ट है ॥४॥

    टिप्पणी

    ४−(नीलनखेभ्यः) नि+इल गतौ-क+णख गतौ-क। इला वाङ्नाम-निघ०१।११। नीलानां निश्चितज्ञानानां नखेभ्यः प्रापकेभ्यः परमात्मगुणेभ्यः ॥

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    विषय

    योगी का जीवन

    पदार्थ

    १. योगांगों का अभ्यास करनेवाले ये व्यक्ति नील-कृष्णा-निर्लेप [नीरंग-जिनपर दुनिया का रंग नहीं चढ़ गया] बनते हैं तथा उन्नति के शिखर पर पहुँचते हैं, इनके जीवन में (न-ख) = छिद्र [दोष] नहीं रहते। इन (नीलनखेभ्य:) = निर्लेप, निश्छिद्र जीवनवाले पुरुषों के लिए हम [सु आह] (स्वाहा) = शुभ शब्दों का उच्चारण करते हैं। अपने जीवनों को भी उन-जैसा बनाने का प्रयत्न करते हैं। ३. इन (हरितेभ्यः) = इन्द्रियों का विषयों से प्रत्याहार करनेवालों के लिए (स्वाहा) = हम प्रशंसात्मक शब्द कहते हैं और इन-जैसा बनने के लिए यत्नशील होते हैं। ३. (क्षुद्रेभ्यः) = [क्षुदिर संपेषणे]-शत्रुओं का संपेषण कर डालनेवाले इन व्यक्तियों के लिए हम (स्वाहा) = [स्व हा] अपना अर्पण करते हैं। उनके शिष्य बनकर उन-जैसा बनने के लिए यल करते हैं। ४. (पर्यायिकेभ्यः) = [पर्याय-regular order] इन व्यवस्थित जीवनवालों के लिए (स्वाहा) = प्रशंसात्मक शब्द कहते हुए हम भी उनके जीवनों को अपना जीवन बनाते हैं। उनकी भाँति ही जीवन की प्रत्येक क्रिया को व्यवस्थित करते हैं।

    भावार्थ

    योगांगों के अभ्यास से हम निर्लेप व निश्छिद्र जीवनवाले हों। इन्द्रियों का विषयों से प्रत्याहार करें। काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं का संपेषण कर डालें। हमारे जीवन की प्रत्येक क्रिया व्यवस्थित [regular order में] हो।

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    भाषार्थ

    (नीलनखेभ्यः) नखों के नीलेपन के निवारणार्थ (स्वाहा) आहुतियाँ हो।

    टिप्पणी

    [नीलनखेभ्यः= नीलनखान् निवारयितुं स्वाहा। “क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः” (अष्टा० २.३.१४) द्वारा, अथवा वारणार्थ को बुद्धिगत करके “वारणार्थानामीप्सितः” (अष्टा० १.४.२७) द्वारा चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग हुआ है। यथा “मशकाय धूमः”= मशकनिवारणार्थो धूमः। नखों का नीलपन यक्ष्मरोगजन्य अभिप्रेत है। यथा—“अस्थिभ्यस्ते मञ्जभ्यः स्नावभ्यो धमनिभ्यः। यक्ष्मं पाणिभ्यामङ्गुलिभ्यो नखेभ्यो वि वृहामि ते॥ (अथर्व० २.३३.६; तथा २०.९६.२२)। अथर्व० २.३३.६) में यक्ष्मरोग का निवारण “कश्यपस्य वीवर्हेण” द्वारा निर्दिष्ट किया है। यथा—“कश्यपस्य वीवर्हेण वि वृहामसि” (अथर्व० २.३३.७)। कश्यपस्य वीवर्ह= पश्यक अर्थात् द्रष्टा सूर्य की रश्मियों द्वारा। कश्यप=सूर्य (अथर्व० १७.१.२७, २८); तथा (अथर्व० २.३२.१)।]

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    विषय

    अथर्व सूक्तों का संग्रह।

    भावार्थ

    (नीलनखेभ्यः स्वाहा) ‘नीलनख’ नामक उन सूक्तों से उत्तम ज्ञान प्राप्त करो जिनमें शस्त्रास्त्रों द्वारा दुष्ट पुरुषों के दमन करने का उपदेश किया गया है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अंगिरा ऋषिः। मन्त्रोक्ता देवताः। १ साम्न्युष्णिक् ३, १९ प्राजापत्या गायत्री। ४, ७, ११, १७, दैव्यो जगत्यः। ५, १२, १३ दैव्यस्त्रिष्टुभः, २, ६, १४, १६, दैव्यः पंक्तयः। ८-१० आसुर्यो जगत्यः। १८ आसुर्यो अनुष्टुभः, (१०-२० एकावसानाः) २ चतुष्पदा त्रिष्टुभः। एकविंशत्यृचं समाससूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Chhandas

    Meaning

    Svaha for the cure of bluish nails.

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    Translation

    Svaha with the (chapters called) Nilnakha.

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    Translation

    Through the set of verses indicating aspect of speech and knowledge.

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    Translation

    Study thoroughly the nilnakha-named suktas, teaching how to quell the wicked with good armaments.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ४−(नीलनखेभ्यः) नि+इल गतौ-क+णख गतौ-क। इला वाङ्नाम-निघ०१।११। नीलानां निश्चितज्ञानानां नखेभ्यः प्रापकेभ्यः परमात्मगुणेभ्यः ॥

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