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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 31 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 31/ मन्त्र 14
    ऋषिः - सविता देवता - औदुम्बरमणिः छन्दः - विराडास्तारपङ्क्तिः सूक्तम् - औदुम्बरमणि सूक्त
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    अ॒यमौदु॑म्बरो म॒णिर्वी॒रो वी॒राय॑ बध्यते। स नः॑ स॒निं मधु॑मतीं कृणोतु र॒यिं च॑ नः॒ सर्व॑वीरं॒ नि य॑च्छात् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒यम्। औदु॑म्बरः। म॒णि। वी॒रः। वी॒राय॑। ब॒ध्य॒ते॒। सः। नः॒। स॒निम्। मधु॑ऽमतीम्। कृ॒णो॒तु॒। र॒यिम्। च॒। नः॒। सर्व॑ऽवीरम्। नि। य॒च्छा॒त् ॥३१.१४॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अयमौदुम्बरो मणिर्वीरो वीराय बध्यते। स नः सनिं मधुमतीं कृणोतु रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छात् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अयम्। औदुम्बरः। मणि। वीरः। वीराय। बध्यते। सः। नः। सनिम्। मधुऽमतीम्। कृणोतु। रयिम्। च। नः। सर्वऽवीरम्। नि। यच्छात् ॥३१.१४॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 31; मन्त्र » 14
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (अयम्) यह (औदुम्बरः) संघटन चाहनेवाला, (मणिः) प्रशंसनीय (वीरः) वीर [परमात्मा] (वीराय) वीर पुरुष के लिये (बध्यते) धारण किया जाता है। (सः) वह (नः) हमारे लिये (मधुमतीम्) ज्ञानयुक्त (सनिम्) लाभ (कृणोतु) करे, (च) और (नः) हमारे लिये (सर्ववीरम्) सबका वीर बनानेवाला (रयिम्) धन (नि यच्छात्) नियत करे ॥१४॥

    भावार्थ

    जो मनुष्य परमेश्वर के स्थिर कोश और नित्य दान का विचार करके पुरुषार्थ करते हैं, वे स्थिर निधि स्थापित करके सब मनुष्यों को वीर बनाते हैं ॥१४॥

    टिप्पणी

    १४−(अयम्) प्रसिद्धः (औदुम्बरः) म०१। संहतिस्वीकर्ता (मणिः) प्रशंसनीयः (वीरः) पराक्रमी परमात्मा (वीराय) पराक्रमिणे पुरुषाय (बध्यते) धार्यते (सः) तादृशः (नः) अस्मभ्यम् (सनिम्) लब्धिम् (मधुमतीम्) ज्ञानयुक्ताम् (कृणोतु) करोतु (रयिम्) धनम् (नः) अस्मभ्यम् (सर्ववीरम्) सर्वेषां वीरकरम् (नि यच्छात्) नियतं कुर्यात् ॥

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    विषय

    मधुमती सनि

    पदार्थ

    १. (अयम्) = यह (औदुम्बर: मणि:) = रेत:कणरूप मणि पापों व रोगों से उभारनेवाली है। (वीरः) = यह रोगरूप शत्रुओं को कम्पित करनेवाली है [वि ईर]। बीराय बध्यते यह वीर पुरुष के लिए शरीर में बद्ध की जाती है। २. (स:) = वह मणि (न:) = हमारी (सनिम्) = उपासना [संभजन] को (मधुमतीम्) = अत्यन्त माधुर्यवाला (कृणोतु) = करे । वीर्य के सुरक्षित होने पर यह वीर मनःप्रसाद के साथ प्रभुभजन करनेवाला होता है। यह मणि (न:) = हमारे लिए (सर्ववीरम्) = सन्तानोंवाले (रयिम्) = ऐश्वर्य को (नियच्छात्) = दे।

    भावार्थ

    सुरक्षित वीर्य रोगों को कम्पित करके दूर भगाता है। हमारी उपासना को मधुर बनाता है और वीर सन्तानों से युक्त धन प्राप्त कराता है। वीर्यरक्षण द्वारा नीरोग व दीर्घजीवन की कामनावाला 'आयुष्यकामः' अगले दो सूक्तों का ऋषि है। यह 'भृगु' है-वीर्यरक्षण के लिए अपने को तपस्या व ज्ञान की अग्नि में पकाने से यह 'भृगु' है -

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    भाषार्थ

    (मणिः) राज्यरत्न (अयम्) यह (वीरः) शूरवीर (औदुम्बरः) वनाधिपति (वीराय) वीर सम्राट् के लिए (बध्यते) प्रतिज्ञाबद्ध किया जाता है। (सः) वह वनाधिपति (नः) हमारे (सनिम्) धन-विभाजन को (मधुमतीम्) मधुर (कृणोतु) करे। (च) और (नः) हमें (रयिम्) सम्पत्तियाँ (नि यच्छात्) देवे, जिससे कि (सर्ववीरम्) हम सब वीर बन जाएँ।

    टिप्पणी

    [सनिम्= षणु दाने, षण संभक्तौ। अर्थात् सम्पत्तियों का प्रजा के प्रति दान और उसका सम्यक्-विभाजन प्रत्येक प्रजा के लिए करना।]

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    विषय

    औदुम्बर मणि के रूप में अन्नाध्यक्ष, पुष्टपति का वर्णन।

    भावार्थ

    (अयम्) यह (चौदुम्बरः) बहुतों के पालन पोषण में समर्थ (मणिः) शिरोमणि पुरुष (वीरः) वीर, वीर्यवान् होकर (वीराय) वीर्यवान् राजा के उपकार के निमित्त (बध्यते) बांधा जाता है, वेतन आदि द्वारा नियुक्त किया जाता है। (सः) वह (नः) हमारी (सनिम्) धन प्राप्ति को (मधुमतीम्) आनन्द और सुखसे युक्त (कृणोतु) करे। और (नः सर्ववीरं च रयिम् नियच्छात्) हमें सब सामर्थ्यो से युक्त धन ऐश्वर्य प्रदान करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पुष्टिकामः सविता ऋषिः। मन्त्रोक्त उदुम्बरमणिर्देवता। ५, १२ त्रिष्टुभौ। ६ विराट् प्रस्तार पंक्तिः। ११, १३ पञ्चपदे शक्वर्य्यौ। १४ विराड् आस्तारपंक्तिः। शेषा अनुष्टुभः। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Darbha

    Meaning

    Mighty brave is this Audumbara mani, worthy of the brave to wear and bear. Let it make our share of wealth for body, mind and soul full of honey sweets. May it give us wealth, honour and excellence wholly worthy of all the brave. Note: As the theme of Audumbara-mani grows in this Sukta, it becomes clear that this ‘jewel’ is not simply a magical amulet from the Udumbara tree. It is a valuable extract from the tree, very efficacious in home yajna too for the growth of health and development of animals (verses 1-5). Then it becomes the source of health, wealth and progeny (6-8). Then the thought moves on to Sarasvati (mother of knowledge), Vanaspati (preserver, developer and manager of forests, also the sun), and Gramani (village leader), which are all human and divine variations of the source of health, wealth, honour, excellence and enlightenment. At the end the ‘mani’ becomes the sole source of humanity’s share of food, energy and excellence for body, mind and soul, Lord Supreme, diversifier as well as the unifier of all that is. The Sukta is a mystical vision of the concrete, moving up to the mysterious. Darbha ordinarily is Kusha grass, specially white, different from ordinary Kusha and Kasa. But derived from the root ‘dr’, ‘to break’, in Vedic language it would mean ‘the breaker of negativities and joiner of positivities to wholeness’, a giver of invulnerable strength. Darbha, then, is to be understood as both medicinal and metaphorical.

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    Translation

    This brave udumbara blessing is bound to the brave one. May it make our attainment full of sweetness and bestow on us riches with all brave sons.

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    Translation

    This nice Udumbar is the source of increasing strength and so it is held for the purpose of daring performance. Let it make my grains sweet and give us the wealth blessed with progeny.

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    Translation

    Here is the Audumber-mani, the source of ail energy and valour. It is installed for the brave and the courageous. Let it grant us sweet gifts, riches, brave offspring and warriors.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    १४−(अयम्) प्रसिद्धः (औदुम्बरः) म०१। संहतिस्वीकर्ता (मणिः) प्रशंसनीयः (वीरः) पराक्रमी परमात्मा (वीराय) पराक्रमिणे पुरुषाय (बध्यते) धार्यते (सः) तादृशः (नः) अस्मभ्यम् (सनिम्) लब्धिम् (मधुमतीम्) ज्ञानयुक्ताम् (कृणोतु) करोतु (रयिम्) धनम् (नः) अस्मभ्यम् (सर्ववीरम्) सर्वेषां वीरकरम् (नि यच्छात्) नियतं कुर्यात् ॥

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