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अथर्ववेद के काण्ड - 19 के सूक्त 31 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 31/ मन्त्र 3
    ऋषिः - सविता देवता - औदुम्बरमणिः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - औदुम्बरमणि सूक्त
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    क॑री॒षिणीं॒ फल॑वतीं स्व॒धामिरां॑ च नो गृ॒हे। औदु॑म्बरस्य॒ तेज॑सा धा॒ता पु॒ष्टिं द॑धातु मे ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क॒री॒षिणी॑म्। फल॑ऽवतीम्। स्व॒धाम्। इरा॑म्। च॒। नः॒। गृ॒हे। औदु॑म्बरस्य। तेज॑सा। धा॒ता। पु॒ष्टिम्। द॒धा॒तु॒। मे॒ ॥३१.३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    करीषिणीं फलवतीं स्वधामिरां च नो गृहे। औदुम्बरस्य तेजसा धाता पुष्टिं दधातु मे ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    करीषिणीम्। फलऽवतीम्। स्वधाम्। इराम्। च। नः। गृहे। औदुम्बरस्य। तेजसा। धाता। पुष्टिम्। दधातु। मे ॥३१.३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 19; सूक्त » 31; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।

    पदार्थ

    (नः) हमारे (गृहे) घर में (औदुम्बरस्य) संघटन चाहनेवाले [परमेश्वर] के (तेजसा) तेज से (करीषिणीम्) बहुत गोबरवाली, (फलवतीम्) बहुत फलवाली, (स्वधाम्) बहुत अन्नवाली (च) और (इराम्) बहुत भूमिवाली (पुष्टिम्) वृद्धि को (धाता) पोषक [गृहपति] (मे) मुझे (दधातु) देवे ॥३॥

    भावार्थ

    गृहपति परमेश्वर के अनुग्रह और अपने पुरुषार्थ से कुटुम्ब पालने को बहुत गौएँ दूध घृत आदि के लिये, आरामवाटिका फल आदि के लिये, अन्न-भोजनादि के लिये और भूमि राज्य खेती आदि के लिये रक्खे ॥३॥

    टिप्पणी

    ३−(करीषिणीम्) अ०३।१४।३। बहुना करीषेण गोमयेन युक्ताम् (फलवतीम्) बहुफलयुक्ताम् (स्वधाम्) स्वधा-अर्शआद्यच्। बह्वन्नवतीम् (इराम्) अर्शआद्यच्। बहुभूमियुक्ताम् (च) (नः) अस्माकम् (गृहे) निवासे (औदुम्बरस्य) म०१। संहतिस्वीकारकस्य (तेजसा) प्रतापेन (धाता) पोषको गृहपतिः (पुष्टिम्) पोषणम् (दधातु) ददातु (मे) मह्यम् ॥

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    विषय

    गौ और औदुम्बर मणि

    पदार्थ

    १. (करीषिणीम्) = प्रशस्त करीष [गोमय] को प्राप्त करानेवाली, (फलवतीम्) = [बिफला विशरणे] रोगों को विशीर्ण करने की क्रियावाली (च) = और (स्वधाम्) = हमारे अन्दर आत्मतत्व को धारण करानेवाली [सात्विक दुग्ध से बुद्धि को सात्विक करके यह हमें आत्मदर्शन के योग्य बनाती है] (इराम्) = [इडा-गौ] गौ को (न:) = हमारे (गृहे) = घर में (धाता) = वे धारक प्रभु (दधात) = धारण करें। इन गौओं के होने पर प्रशस्त गोमय प्राप्त होता है-यह भूमि को उपजाऊ बनाता है तथा लेपन आदि के होने पर क्रिमिनाशन का कार्य करता है। गौ का दूध प्रशस्त बुद्धि देता है और नीरोगता प्राप्त कराता है। २. गोदुग्ध के प्रयोग से 'धाता'-वह धारक प्रभु (औदुम्बरस्य) = इस औदुम्बरमणि को (तेजसा) = तेज से (मे) = मेरे लिए (पुष्टिम्) = अंग-प्रत्यंग के पोषण को [दधातु] धारण करे।

    भावार्थ

    हम गोदुग्ध के प्रयोग से नोरोग व तीन-बुद्धि बनें। प्रभु गोदुग्ध से अंग-प्रत्यंग को पुष्ट कर हमें दीर्घजीवी बनाते हैं।

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    भाषार्थ

    (धाता) राष्ट्र का धारण-पोषण करनेवाला सर्वप्रेरक प्रधानमन्त्री (मन्त्र १) (औदुम्बरस्य) वनाधिपति के (तेजसा) प्रभाव द्वारा, सुशासन द्वारा (नः) हमारे (गृहे) घरों में (करीषिणीम्) गोबर देनेवाली गौ को, (फलवतीम्) फलोंवाली वाटिका को, (स्वधाम्) स्वधारण और पोषण करनेवाले अन्न को, (च इराम्) और जल को (दधातु) धारित करे, (मे) और मुझ प्रत्येक प्रजाजन के लिए (पुष्टिम्) उपर्युक्त सम्पुष्ट वस्तुएँ धारित करे।

    टिप्पणी

    [स्वधा=अन्न (निरु० २.७)। इरा=Water (जल; आप्टे)। करीष= गोबर। लेपने जलाने और खाद में गोबर उपयोगी है।]

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    विषय

    औदुम्बर मणि के रूप में अन्नाध्यक्ष, पुष्टपति का वर्णन।

    भावार्थ

    (धाता) सबका पोषक परमेश्वर या राजा अपने नियत किये हुए (औदुम्बरस्य) औदुम्बर अर्थात् अन्न और पुष्टि के अध्यक्ष के (तेजसा) तेज, पराक्रम से, प्रयत्न से (नः गृहे) हमारे घरों में (करीषिणीम्) लक्ष्मी समृद्धि से युक्त और (फजवतीम्) खूब उत्तम फल से युक्त (स्वधाम्) अन्न और (इराम्) जलको या स्वधा = अन्न और भूमि को प्रदान करे और (मे) मुझे (पुष्टिम्) पुष्टि, पशु समृद्धि प्रदान करे।

    टिप्पणी

    पुरीष्य इति वै तमाहुः यः श्रियं गच्छति। समानं वै पुरीषं च करीषं च॥ श० २। १। १। ७॥ (प्र०) ‘करीषिगम् फलावतीम्’ इति पैप्प० सं०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    पुष्टिकामः सविता ऋषिः। मन्त्रोक्त उदुम्बरमणिर्देवता। ५, १२ त्रिष्टुभौ। ६ विराट् प्रस्तार पंक्तिः। ११, १३ पञ्चपदे शक्वर्य्यौ। १४ विराड् आस्तारपंक्तिः। शेषा अनुष्टुभः। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Audumbara Mani

    Meaning

    Abundance of fertility and fruitfulness, profusion of self-sufficiency in food and drink, and growth of prosperity, may Dhata, lord of the world order, bear and bring into our home by the power and lustre of the efficacy of Audumbara.

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    Translation

    By the power of the udumbara blessing, may the sustainer Lord grant me prospertiy and a cow with plenty of dung (manure), calves and milk in our house.

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    Translation

    May Dhatar, the All-subsisting God give in our houses the grain and the land full of fruits and cow-droppings. He may give me nourishing food with the power of Udumbar.

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    Translation

    Let the production-minded officer bring about fruitful grains and drinks, accompanied by profuse riches. May he create prosperity and well-being through the energy of the Audumber-mani.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ३−(करीषिणीम्) अ०३।१४।३। बहुना करीषेण गोमयेन युक्ताम् (फलवतीम्) बहुफलयुक्ताम् (स्वधाम्) स्वधा-अर्शआद्यच्। बह्वन्नवतीम् (इराम्) अर्शआद्यच्। बहुभूमियुक्ताम् (च) (नः) अस्माकम् (गृहे) निवासे (औदुम्बरस्य) म०१। संहतिस्वीकारकस्य (तेजसा) प्रतापेन (धाता) पोषको गृहपतिः (पुष्टिम्) पोषणम् (दधातु) ददातु (मे) मह्यम् ॥

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