अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 22/ मन्त्र 12
ऋषिः - भृग्वङ्गिराः
देवता - तक्मनाशनः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - तक्मनाशन सूक्त
64
तक्म॒न्भ्रात्रा॑ ब॒लासे॑न॒ स्वस्रा॒ कासि॑कया स॒ह। पा॒प्मा भ्रातृ॑व्येण स॒ह गच्छा॒मुमर॑णं॒ जन॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठतक्म॑न् । भ्रात्रा॑ । ब॒लासे॑न् । स्वस्रा॑ । कासि॑कया । स॒ह । पा॒प्मा । भ्रातृ॑व्येण । स॒ह । गच्छ॑ । अ॒मुम् । अर॑णम् । जन॑म् ॥२२.१२॥
स्वर रहित मन्त्र
तक्मन्भ्रात्रा बलासेन स्वस्रा कासिकया सह। पाप्मा भ्रातृव्येण सह गच्छामुमरणं जनम् ॥
स्वर रहित पद पाठतक्मन् । भ्रात्रा । बलासेन् । स्वस्रा । कासिकया । सह । पाप्मा । भ्रातृव्येण । सह । गच्छ । अमुम् । अरणम् । जनम् ॥२२.१२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
रोग नाश करने का उपदेश।
पदार्थ
(तक्मन्) हे ज्वर ! (भ्रात्रा) अपने भ्राता (बलासेन) बल गिरानेवाले सन्निपात, कफ आदि, और (स्वस्रा) अपनी बहिन (कासिकया सह) कुत्सित खाँसी के साथ, (भ्रातृव्येण) अपने भतीजे (पाप्मा=पाप्मना) चर्म रोग के (सह) साथ (अमुम्) उस (अरणम्) न भाषण करने योग्य निन्दित (जनम्) जन के पास (गच्छ) चला जा ॥१२॥
भावार्थ
कुकर्मी अपथ्यभोगी पुरुष ज्वर, खाँसी आदि से पीड़ित रहते हैं। इस से मनुष्य सुकर्मी और पथ्यभोगी होवें ॥१२॥
टिप्पणी
१२−(तक्मन्) हे ज्वर ! (भ्रात्रा) सहोदरेण (बलासेन) म० ११। बलनाशकेन श्लेष्मविकारेण (स्वस्रा) अ० १।२८।४। भगिन्या (कासिकया) कास−कुत्सायां कन्, टाप्। कुत्सितकासेन (सह) सहितः (पाप्मा) रक्षितव्यमस्मात्। नामन्सीमन्व्योमन्०। उ० ४।१५१। इति पा रक्षणे−मनिन्, पुक् च। विभक्तेः सु। पाप्मना। चर्मरोगेण (भ्रातृव्येण) भ्रातुर्व्यच्च। पा० ४।१।१४४। इति भ्रातृ−व्यत्। भ्रातृजेन (सह) (गच्छ) प्राप्नुहि (अमुम्) तम् (अरणम्) अ० १।१९।३। अ+रण शब्दे−अप्। असम्भाष्यम्। निन्द्यम्। (जनम्) लोकम् ॥
विषय
अरणं जनम्
पदार्थ
१. हे (तक्मन्) = ज्वर! तू (भ्रात्रा बलासेन) = अपने भाई कफ़ के साथ, (स्वस्त्रा कासिकया सह) = बहिन के तुल्य खाँसी के साथ, (पाप्मा भ्रातव्येण सह) = [पाप्मना] क्षय नामक पापरोग भतीजे के साथ (अमुम्) = उस (अरणम्) = अवद्य [रण शब्दे], निन्दनीय (जनम्) = मनुष्य के पास (गच्छ) = जा |
भावार्थ
कफ़, खाँसी व क्षय के साथ यह ज्वर पापी को ही प्राप्त हो।
भाषार्थ
(तक्मन्) हे तक्मा ज्वर! (भ्रात्रा बलासेन) भाई बलगम के, (स्वस्रा कासिकया) और बहिन खाँसी के (सह) साथ, तथा (पाप्मा) पापी (भ्रातृव्येण) शत्रु के (सह) साथ (अरणम्) अरण्यवासी१, (अमुम् जनम्) उस जन को (गच्छ) तू प्राप्त हो, उसकी ओर तू जा।
टिप्पणी
[तक्मा-ज्वर के सहचारी-रोगों का वर्णन मन्त्र में हुआ है। मन्त्र ११ में सहचारी रोगों को सखा कहा है। मन्त्र १२ में इन्हें भाई और स्वसा कहा है। भ्रातृव्य के साथ "पाप्मा-पाप्मना पद का प्रयोग हुआ है, भातृव्य को पापी कहा है। भातृव्य='व्यन्त्सपत्ने' (अष्टा० ४.१.१४५) । अत: भ्रातृव्य=सपत्न=शत्रु । तभी वेद में कहा है 'भ्रातृव्यस्य वधाय' (यजु:० १.१७)। मन्त्र में भ्रातृव्य के वध का निर्देश हुआ है, पाप या पापी का वध उचित ही है।] [१. जनम्=जनताम्। अरण्य में स्वास्थ्य-सम्बन्धी उपायों का अभाव होने से तक्मा-ज्वर की सत्ता दर्शायी हैं।]
विषय
ज्वर का निदान और चिकित्सा।
भावार्थ
हे (तक्मन्) ज्वर ! (भ्रात्रा) तुझे पुष्ट करने वाले (बलासेन) कफ़ और (स्वस्ना) भगिनी के समान कफ़ के साथ २ स्वयं आजाने वाली (कासिकया सह) खांसी के साथ और (भ्रातृव्येण) अपने परिपोषक भाई के समान कफ़ से उत्पन्न होने वाले अन्य (पाप्मा = पाप्माना) दु:खकारी, चर्म रोग के साथ तू (अमुम्) उस २ अर्थात् नाना प्रकार के (अरणं) मलिन, गन्दे (जनम्) पुरुष को (गच्छ) प्राप्त हो। अर्थात् तू नाना व्याधियों के सहित अस्वच्छ आदमी को चिपटता है। उस को खांसी, कफ़ और चर्मरोग-खुजली भी उत्पन्न करता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
भृग्वङ्गिरसो ऋषयः। तक्मनाशनो देवता। १, २ त्रिष्टुभौ। (१ भुरिक्) ५ विराट् पथ्याबृहती। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Cure of Fever
Meaning
Fever with its brother-like cough and with its sister-like bronchitis is damned too bad, and in this form it catches a poor person of weak immunity.
Translation
O fever, along with your brother, the wasting disease (balsa), with your nephew, the eruption (papma), may you go to so and so stranger people.
Translation
Let this fever go to dirty germs of disease with its brother cough, with its sister consumption and with its nephew herps.
Translation
Go, Fever, with consumption, thy brother, and with thy sister, cough, and with thy nephew Herpes, go away unto that despicable person.
Footnote
Fever and other diseases attack a dirty, mean fellow.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१२−(तक्मन्) हे ज्वर ! (भ्रात्रा) सहोदरेण (बलासेन) म० ११। बलनाशकेन श्लेष्मविकारेण (स्वस्रा) अ० १।२८।४। भगिन्या (कासिकया) कास−कुत्सायां कन्, टाप्। कुत्सितकासेन (सह) सहितः (पाप्मा) रक्षितव्यमस्मात्। नामन्सीमन्व्योमन्०। उ० ४।१५१। इति पा रक्षणे−मनिन्, पुक् च। विभक्तेः सु। पाप्मना। चर्मरोगेण (भ्रातृव्येण) भ्रातुर्व्यच्च। पा० ४।१।१४४। इति भ्रातृ−व्यत्। भ्रातृजेन (सह) (गच्छ) प्राप्नुहि (अमुम्) तम् (अरणम्) अ० १।१९।३। अ+रण शब्दे−अप्। असम्भाष्यम्। निन्द्यम्। (जनम्) लोकम् ॥
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