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अथर्ववेद के काण्ड - 5 के सूक्त 22 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 22/ मन्त्र 7
    ऋषिः - भृग्वङ्गिराः देवता - तक्मनाशनः छन्दः - अनुष्टुप् सूक्तम् - तक्मनाशन सूक्त
    92

    तक्म॒न्मूज॑वतो गच्छ॒ बल्हि॑कान्वा परस्त॒राम्। शू॒द्रामि॑च्छ प्रप॒र्व्यं॑ तां त॑क्म॒न्वीव॑ धूनुहि ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    तक्म॑न् । मूज॑ऽवत: । ग॒च्छ॒ । बल्हि॑कान् । वा॒ । प॒र॒:ऽत॒राम् ।शू॒द्राम् । इ॒च्छ॒ । प्र॒ऽफ॒र्व्य᳡म् । तान् । त॒क्म॒न् । विऽइ॑व । धू॒नु॒हि॒ ॥२२.७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    तक्मन्मूजवतो गच्छ बल्हिकान्वा परस्तराम्। शूद्रामिच्छ प्रपर्व्यं तां तक्मन्वीव धूनुहि ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    तक्मन् । मूजऽवत: । गच्छ । बल्हिकान् । वा । पर:ऽतराम् ।शूद्राम् । इच्छ । प्रऽफर्व्यम् । तान् । तक्मन् । विऽइव । धूनुहि ॥२२.७॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 5; सूक्त » 22; मन्त्र » 7
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    रोग नाश करने का उपदेश।

    पदार्थ

    (तक्मन्) हे ज्वर ! (मूजवतः) मूजवाले पहाड़ों और (बल्हिकान्) हिंसावाले देशों को, (वा) अथवा (परस्तराम्) और परे (गच्छ) चला जा। (प्रफर्व्यम्=प्रफर्वरीम्) इधर-उधर घूमनेवाली (शूद्राम्) शूद्रा स्त्री को (इच्छ) ढूँढ़, और (तान्) हिंसकों को, (तक्मन्) हे ज्वर ! (वीव) विशेष कर के ही (धूनुहि) कँपा दे ॥७॥

    भावार्थ

    जहाँ पर मलिन पदार्थ और मलिन स्वभाववाले स्त्री-पुरुष होते हैं, वहाँ रोग होते हैं, इससे सबको बाहिर और भीतर शुद्ध रखना चाहिये ॥७॥

    टिप्पणी

    ७−(तक्मन्) हे ज्वर (मूजवतः) म० ५। मुञ्जादितृणयुक्तान् पर्वतान् (गच्छ) प्राप्नुहि (बल्हिकान्) म० ५। हिंसादेशान् (वा) अथवा (परस्तराम्) किमेत्तिङव्यय०। पा० ५।४।११। इति परस्+तरप्−आमु। दूरतरम् (शूद्राम्) अरु ४।२०।४। शोचनीयां मूर्खाम् (इच्छ) अन्विच्छ (प्रफर्व्यम्) अ० ३।१७।३। कोररन्। उ० ४।१५५। इति प्र+फर्व गतौ−अरन्, ङीप्। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति अमि पूर्वरूपाभावे यणादेशः। प्रफर्वरीम्। इतस्ततो गमनशीलां व्यभिचारिणीम् (तान्) तर्व हिंसायाम्−ड। हिंसकान् (वि इव) वि विशेषेण। इव अवधारणे। एव (धूनुहि) कम्पय ॥

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    विषय

    मूजवतः, बल्हिकान्, प्रफर्व्यम्

    पदार्थ

    १. हे (तक्मन्) = ज्वर! तू (मूजवत: गच्छ) = मुंज-बासवाले प्रदेशों में जा, (वा) = अथवा (परस्तराम्) = हमसे दूर तू (बल्हिकान्) = बहुत बोलनेवाले, हिंसा की वृत्तिवाले, सदा घर में घुसे रहनेवाले को प्राप्त हो। २. तू उस (शूद्राम्) = अनपढ़, असंस्कृत स्त्री की इच्छा कर जोकि प्रफर्व्यम् = [फर्व गती] हर समय इधर-उधर भटकनेवाली हो [निष्टक्वरी दासीम्-मन्त्र ६]। हे (तक्मन्) = ज्वर! तू (ताम्) = उस स्त्री को ही (वि इव) = खुब ही (धूनहि) = कम्पित कर।

    भावार्थ

    ज्वर के प्रदेश में अतिशयेन घासवाले प्रदेश हैं। यह बहुत बोलनेवाले, हिंसक, घर में घुसे रहनेवाले लोगों को प्राप्त होता है। यह असंयमी व असंस्कृत स्त्रियों को कम्मित करता है।

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    भाषार्थ

    (तक्मन्) हे तक्मा-ज्वर ! (मूजवत:) मूँजवाले प्रदेशों को (गच्छ) तू जा, (बल्हिकान्) जल प्रधान प्रदेशों को, तथा आच्छादित निवास स्थानों [ गृहों] को, (वा) या (परस्तराम्) उन से भी परे के प्रदेशों को तू जा। (प्रफर्व्यम्=प्रफर्वीम्) स्फूर्ति से प्रगत [ विहीन] या विशीर्ण हुई (शूद्राम् ) शोक से गति करनेवाली कन्या को (इच्छ) तू चाहे, (ताम्) उसे (वि, इव, धूनुहि) तू विकम्पित सदृश कर।

    टिप्पणी

    [प्रफर्व्यम्="पीवरी स्थूलाम् प्रफर्व्यम् प्रथमवयाः कन्या प्रफर्वी ताम्" (सायण अथर्व० ३.१७.३)। अथवा प्रफर्व्या=ञिफला विशरणे (भ्वादिः) विशीर्ण हुई कन्या। एतदनुसार शुद्रा है अल्पवयस्का कन्या, जो कि शोकान्विता है, "शुचा द्रवतीति शुद्रा"। वह पीवरी है, मोटी है, कफप्रधाना है, अत: स्फूर्ति-रहित है। ऐसी कन्या को तक्मा प्राप्त होता ही है। यह स्वाभाविक वर्णन ही है। यह तक्मा शीतज्वर प्रतीत होता है, जो कि शरीर को कंपा देता है (मन्त्र १०, शीत:) । अथवा प्रफर्व्यम्=प्रगतफरवरीम्ः स्फूर्तिरहिताम; स्फर स्फुरणे (तुदादिः), स्फूर्ति रहिता कन्या, सुस्त कन्या। "मूजवतः, बल्हिकान्, परस्तराम्"-ये वर्षा-प्रधान प्रदेश हैं, जिन्हें महावृषान् कहा है (मन्त्र ४, ५, ८)।]

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    विषय

    ज्वर का निदान और चिकित्सा।

    भावार्थ

    हे (तक्मन्) ज्वर ! तू (मूजवतः) प्रथम निर्बल, छोटे छोटे प्राणियों को (गच्छ) प्राप्त होता है। अथवा (बल्हिकान्) बलवानों को और (परः तराम्) उनसे भी अधिक शक्ति वालों को भी प्राप्त होता है। तू (प्र-फर्व्यम्) नवयुवति (शूद्राम्) काटने वाली कीट जाति को (इच्छ) प्राप्त होकर (तां वि-इव धूनुहि) उसको मानो सदा चन्चल बनाये रखता है। वह जगह २ उड़ २ बैठती, काटती और विष फैलाती रहती है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    भृग्वङ्गिरसो ऋषयः। तक्मनाशनो देवता। १, २ त्रिष्टुभौ। (१ भुरिक्) ५ विराट् पथ्याबृहती। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Cure of Fever

    Meaning

    Takman fever spreads in grassy and bushy places. It affects the far off oppressive areas. It affects the weaker sections of the community moving around and gives them body shivers all over.

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    Translation

    O fever, may you go to the region, where the munja grass grows; or may you go even farther to Balhikas. Seek there some wanton (prapharvya) maid-servant and shake her severely.

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    Translation

    Let this fever go to the places covered with Munja grass, let it go to distant localities of moisture and dampness, let it desire (to go) to want on species of biting germs and shake them through and through.

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    Translation

    O Fever, thou attackest first the weak, and then the strong, even stronger persons. Long for the young biting race of mosquitoes, and make it ever restless.

    Footnote

    Mosquitoes being restless fly and bite the people injecting poison in them.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    ७−(तक्मन्) हे ज्वर (मूजवतः) म० ५। मुञ्जादितृणयुक्तान् पर्वतान् (गच्छ) प्राप्नुहि (बल्हिकान्) म० ५। हिंसादेशान् (वा) अथवा (परस्तराम्) किमेत्तिङव्यय०। पा० ५।४।११। इति परस्+तरप्−आमु। दूरतरम् (शूद्राम्) अरु ४।२०।४। शोचनीयां मूर्खाम् (इच्छ) अन्विच्छ (प्रफर्व्यम्) अ० ३।१७।३। कोररन्। उ० ४।१५५। इति प्र+फर्व गतौ−अरन्, ङीप्। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति अमि पूर्वरूपाभावे यणादेशः। प्रफर्वरीम्। इतस्ततो गमनशीलां व्यभिचारिणीम् (तान्) तर्व हिंसायाम्−ड। हिंसकान् (वि इव) वि विशेषेण। इव अवधारणे। एव (धूनुहि) कम्पय ॥

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