अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 19
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - गौः, विराट्, अध्यात्मम्
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - आत्मा सूक्त
74
ऋ॒चः प॒दं मात्र॑या क॒ल्पय॑न्तोऽर्ध॒र्चेन॑ चाक्लृपु॒र्विश्व॒मेज॑त्। त्रि॒पाद्ब्रह्म॑ पुरु॒रूपं॒ वि त॑ष्ठे॒ तेन॑ जीवन्ति प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः ॥
स्वर सहित पद पाठऋ॒च: । प॒दम् । मात्र॑या । क॒ल्पय॑न्त: । अ॒र्ध॒ऽऋ॒चेन॑ । च॒क्लृ॒प॒: । विश्व॑म् । एज॑त् । त्रि॒ऽपात् । ब्रह्म॑ । पु॒रु॒ऽरूप॑म् । वि । त॒स्थे॒ । तेन॑ । जी॒व॒न्ति॒ । प्र॒ऽदिश॑: । चत॑स्र: ॥१५.१९॥
स्वर रहित मन्त्र
ऋचः पदं मात्रया कल्पयन्तोऽर्धर्चेन चाक्लृपुर्विश्वमेजत्। त्रिपाद्ब्रह्म पुरुरूपं वि तष्ठे तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः ॥
स्वर रहित पद पाठऋच: । पदम् । मात्रया । कल्पयन्त: । अर्धऽऋचेन । चक्लृप: । विश्वम् । एजत् । त्रिऽपात् । ब्रह्म । पुरुऽरूपम् । वि । तस्थे । तेन । जीवन्ति । प्रऽदिश: । चतस्र: ॥१५.१९॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थ
(ऋचः) वेदवाणी से (पदम्) प्रापणीय ब्रह्म को (मात्रया) सूक्ष्मता के साथ (कल्पयन्तः) विचारते हुए [ऋषियों] ने (अर्धर्चेन) समृद्ध वेदज्ञान से (विश्वम्) संसार को (एजत्) चेष्टा कराते हुए [ब्रह्म] को (चक्लृपुः) विचारा। (त्रिपात्) तीन [भूत, भविष्यत्, वर्तमान काल वा ऊँचे-नीचे और मध्यलोक] में गतिवाला, (पुरुरूपम्) बहुत सौन्दर्यवाला (ब्रह्म) ब्रह्म (वि) विविध प्रकार से (तस्थे) ठहरा था (तेन) उस [ब्रह्म] के साथ (चतस्रः) चारों (प्रदिशः) बड़ी दिशाएँ (जीवन्ति) जीवन करती हैं ॥१९॥
भावार्थ
सूक्ष्मदर्शी ऋषि लोग वेद द्वारा ईश्वर की शक्तियों का अनुभव करते हैं कि वह तीनों काल तीनों लोकों में विराज कर सब सृष्टि का प्राणदाता है ॥१९॥ इस मन्त्र का केवल चौथा पाद ऋग्वेद−१।१६४।४२। में है ॥
टिप्पणी
१९−(ऋचः) वेदवाण्याः सकाशात् (पदम्) प्रापणीयं ब्रह्म (मात्रया) अ० ३।२४।६। माङ् माने शब्दे च−त्रन् टाप्। सूक्ष्मरूपेण (कल्पयन्तः) विचारयन्तः (अर्धर्चेन) ऋधु वृद्धौ-घञ्+ऋच स्तुतौ−क्विप्। ऋक्पूरब्। पा० ५।४।७४। अ प्रत्ययः। अर्धया समृद्धया वेदविद्यया (चक्लृपुः) विचारितवन्तः (विश्वम्) जगत् (एजत्) एजयत् कम्पयत् (त्रिपात्) त्रिषु कालेषु त्रिलोक्यां वा पादो यस्य तत् (ब्रह्म) प्रवृद्धः परमात्मा (पुरुरूपम्) बहुसौन्दर्ययुक्तम् (वि) विविधम् (तस्थे) तस्थौ (तेन) ब्रह्मणा (जीवन्ति) प्राणान् धारयन्ति (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशः (चतस्रः) ॥
विषय
निष्पाप ब्रह्म
पदार्थ
१. (ऋच:) = ऋचाओं के परम प्रतिपाद्य विषयभूत ब्रह्म के (पदम्) = ज्ञातव्य स्वरूप को (मात्रया) = जगत् का निर्माण करनेवाली शक्ति से (कल्पयन्त:) = कल्पना करते हुए विद्वान् पुरुष (अर्थर्चेन) = उसके तेजोमय समृद्ध ज्ञानमयस्वरूप से इस (एजत्) = गतिशील (विश्वम्) = विश्व को (चाक्लृपु:) = बना हुआ मानते हैं। संसार की रचना में वे प्रभु की बुद्धिपूर्वक कृति व महिमा को देखते हैं। २. (त्रिपात् ब्रह्म) = सृष्टि की "उत्पत्ति, स्थिति व प्रलयरूप' तीन पगों को रखनेवाला ब्रह्म (पुरुरूपम्) = नाना रूपों को धारण करता हुआ (वितष्ठे) = विविधरूपों में स्थित हो रहा है [रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव]। (तेन) = उसी प्रभु के सामर्थ्य से (चतस्त्र: प्रदिश:) = चारों दिशाएँ-चारों दिशाओं में स्थित प्राणी (जीवन्ति) = प्राण धारण कर रहे हैं। प्रभु ही सर्वाधार है।
भावार्थ
ज्ञानी लोग सृष्टि के प्रत्येक पदार्थ में प्रभु की महिमा को देखते हैं। इस सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय करनेवाले प्रभु ही नानारूपों में इस ब्रह्माण्ड को धारण किये हुए हैं। वे ही सर्वाधार हैं।
भाषार्थ
(ऋचः) ऋग्वेवादि के प्रतिपाद्य पद [ओ३म्] को, (मात्रया) मात्रा [अ, उ, म्] में (कल्पयन्तः) कल्पित करते हुए वेदों ने, (एजत्) गतिमान् (विश्वम्) विश्व को (अर्धर्चेन) आधी-आधी ऋचा द्वारा (चाक्लृपुः) कल्पित या समर्थित किया है। (त्रिपाद्) तीन मात्राओं द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म (पुरुरूपम्) नानारूपों वाले विश्व पर (वि तष्ठे) अधिष्ठातृरूप में स्थित है, (तेन) उस ब्रह्म द्वारा (चतस्रः) चारों (प्रविशः) दिशाएं (जीवन्ति) सजीव हो रही हैं।
टिप्पणी
["पदम्" का अभिप्राय है "ओ३म्" अर्थात् तद् द्वारा प्रतिपाद्य ब्रह्म। यथा “सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रद्गीम्यो३मित्येतत्" (कठ उपनिषद्)। इस उपनिषद् मन्त्र में "पदम और ओ३म" का वर्णन हुआ है जिस का निर्देश व्याख्येय मन्त्र १९ में, "पदम्-तथा-मात्रयः" द्वारा किया प्रतीत होता है। यजुर्वेद ने आधी-आधी ऋचा द्वारा विश्व और त्रिपाद्-व्रह्म का पूर्णतया कथन कर दिया है। यथा - "पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि" (३१।३); तथा "त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः" (३१।४)। ये दो आधी-आधी ऋचाएं हैं, प्रत्येक आधी ऋचा द्वारा "पाद और त्रिपाद" का कथन हुआ है।]
विषय
आत्मा और परमात्मा का ज्ञान।
भावार्थ
जिस प्रकार (ऋचः) ऋचा के (पदं मात्रया) एक चरण को ह्रस्व, दीर्घ आदि मात्रा से कल्पित करते हैं, उसी प्रकार (ऋचः) परम अर्चनीय अथवा ऋचाओं के परम प्रतिपाद्य विषय या परम पूजनीय ब्रह्म की (मात्रया) मात्रा अर्थात् जगत् का निर्माण करनेहारी शक्ति से उसके (पदम्) परम स्वरूप की (कल्पयन्तः) कल्पना करते हुए विद्वान् पुरुष (अर्धर्चेन) उसके तेजोमय समृद्ध ज्ञानमय स्वरूप से इस (एजत्) गतिशील (विश्वम्) विश्व को (चक्लृपुः) बना हुआ मानते हैं। वस्तुतः (त्रिपात्) तीन चरणों वाला, तीन रूपों वाला ब्रह्म ही (पुरु रूपं) नाना रूप धारण करके (वितस्थे) विविध रूप से स्थित है. (तेन) उसी के सामर्थ्य से (चतस्रः) चारों (प्रदिशः) दिशाएँ, दिशाओं के लोक (जीवन्ति) प्राण धारण करते हैं।
टिप्पणी
(च०) ‘त इमे’ ऋ०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। गौः, विराड् आत्मा च देवताः। १, ७, १४, १७, १८ जगत्यः। २१ पञ्चपदा शक्वरी। २३, २४ चतुष्पदा पुरस्कृतिर्भुरिक् अतिजगती। २, २६ भुरिजौ। २, ६, ८, १३, १५, १६, १९, २०, २२, २५, २७, २८ त्रिष्टुभः। अष्टाविंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Spiritual Realisation
Meaning
Deconstructing, reconstructing and realising the reality content, ‘artha’ (Patanjali’s yoga sutras, 3, 17), of the Rks, which is Aum, stage by stage through A, U, and M (Mandukyopanishad, 9-11), the sages simulate and recreate for themselves the active presence of Brahma by analytical study of the Rks and experience the three-stage Brahma of universal nature immanent in the threefold world of Sattva, Rajas and Tamas, over earth, firmament and the heavens, by which they know that all the four quarters of space vibrate with life. (Refer also to Shvetashvatara Upanishad, 1, 3 how the sages come to realise the immanent presence of Brahma vibrating in the world of Prakrti.)
Translation
Composing a foot of the Rk verse-by the measure, with the half-verse they have fashioned all the moves. The supreme Lord, with (remaining) three feet, continues to exist in many forms; by Him the four mid-quarters (of thé universe) live.
Translation
The Cosmic force producing the foot of Rik with measure arranange the moving world with half of the Rik. The. Supreme spirit who is Tripad, the creator protector and anmilator makes the world of multifarious forms and through Him four regions have their being.
Translation
The Rishis minutely contemplating on God, Attainable through Vedic speech, thought through vast Vedic knowledge of Him, the Mobiliser of the world In fact, the most Beautiful God, working in Past, Present and Future, stands in His various forms. Through His power, the denizens of the world s four regions have their being.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
१९−(ऋचः) वेदवाण्याः सकाशात् (पदम्) प्रापणीयं ब्रह्म (मात्रया) अ० ३।२४।६। माङ् माने शब्दे च−त्रन् टाप्। सूक्ष्मरूपेण (कल्पयन्तः) विचारयन्तः (अर्धर्चेन) ऋधु वृद्धौ-घञ्+ऋच स्तुतौ−क्विप्। ऋक्पूरब्। पा० ५।४।७४। अ प्रत्ययः। अर्धया समृद्धया वेदविद्यया (चक्लृपुः) विचारितवन्तः (विश्वम्) जगत् (एजत्) एजयत् कम्पयत् (त्रिपात्) त्रिषु कालेषु त्रिलोक्यां वा पादो यस्य तत् (ब्रह्म) प्रवृद्धः परमात्मा (पुरुरूपम्) बहुसौन्दर्ययुक्तम् (वि) विविधम् (तस्थे) तस्थौ (तेन) ब्रह्मणा (जीवन्ति) प्राणान् धारयन्ति (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशः (चतस्रः) ॥
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