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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 10 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 22
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - गौः, विराट्, अध्यात्मम् छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - आत्मा सूक्त
    49

    कृ॒ष्णं नि॒यानं॒ हर॑यः सुप॒र्णा अ॒पो वसा॑ना॒ दिव॒मुत्प॑तन्ति। तं आव॑वृत्र॒न्त्सद॑नादृ॒तस्यादिद्घृ॒तेन॑ पृथि॒वीं व्यूदुः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    कृ॒ष्णम् । नि॒ऽयान॑म् । हर॑य: । सु॒ऽप॒र्णा: । अ॒प: । वसा॑ना: । दिव॑म् । उत् । प॒त॒न्ति॒ । ते । आ । अ॒व॒वृ॒त्र॒न् । सद॑नात् । ऋ॒तस्य॑ । आत् । इत् । घृ॒तेन॑ । पृ॒थि॒वीम् । वि । ऊ॒दु॒: ॥१५.२२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति। तं आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद्घृतेन पृथिवीं व्यूदुः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कृष्णम् । निऽयानम् । हरय: । सुऽपर्णा: । अप: । वसाना: । दिवम् । उत् । पतन्ति । ते । आ । अववृत्रन् । सदनात् । ऋतस्य । आत् । इत् । घृतेन । पृथिवीम् । वि । ऊदु: ॥१५.२२॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 10; मन्त्र » 22
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (हरयः) रस खींचनेवाली, (सुपर्णाः) अच्छा उड़नेवाली किरणें (अपः) जल को (वसानाः) ओढ़कर (कृष्णम्) खींचनेवाले, (नियानम्) नित्य गमनस्थान अन्तरिक्ष में होकर (दिवम्) प्रकाशमय सूर्यमण्डल को (उत् पतन्ति) चढ़ जाती हैं। (ते) वे (इत्) ही (आत्) फिर (ऋतस्य) जल के (सदनात्) घर [सूर्य] से (आ अववृत्रन्) लौट आती हैं, और उन्होंने (घृतेन) जल से (पृथिवीम्) पृथिवी को (वि) विविध प्रकार से (ऊदुः) सींच दिया है ॥२२॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य की किरणें पवन द्वारा भूमि से जल खींचकर और फिर बरसा कर उपकार करती हैं, वैसे ही मनुष्य विद्या प्राप्त करके संसार का उपकार करें ॥२२॥ यह मन्त्र ऊपर आ चुका है-अ० ६।२२।१ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-म० १।—१६४।४७। और निरुक्त ७।२४। में भी ॥

    टिप्पणी

    २२-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ६।२२।१ ॥

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    विषय

    मोक्ष-प्राप्ति के साधन

    पदार्थ

    १. (कृष्णम्) = [कृष् श्रम का प्रतीक है, ण ज्ञान का] उत्पादक श्रम व ज्ञान से बने हुए (नियानम्) = बाड़े में (हरयः) = इन्द्रियों का प्रत्याहरण करनेवाले कर्मेन्द्रियों को उत्पादन श्रम में तथा ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञान-प्राप्ति में लगाये रखनेवाले और इसप्रकार (सुपर्णा:) = अपना पालन व पूरण करनेवाले (अपः वसान:) = अपने कर्तव्यकर्मों का धारण करनेवाले लोग (दिवम् उत्पतन्ति) = स्वर्ग को जाते हैं। २. जब कभी (ते) = वे सत्य-मार्ग पर चलनेवाले लोग (ऋतस्य सदनात्) = सत्य के निवास स्थान से (आववृत्रन्) = लौट आते हैं, अर्थात् मोक्ष से लौटते हैं तो (आत् इत्) = इसके पश्चात् शीघ्र ही (पतेन) = ज्ञान की दीसि से (पृथिवीं व्यदः) = इस पृथिवी को क्लिन्न कर देते हैं। मोक्ष से लौटने पर ये पृथिवी पर ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए यत्नशील होते हैं।

    भावार्थ

    मोक्ष-प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि हम ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को ज्ञान व कर्म के बाड़े में प्रत्याहृत करें, अपना पालन व पूरण करें, सदा क्रियामय जीवनवाले हों। मोक्ष से लौटने पर हम ज्ञान-प्रसार के कार्य में ही प्रवृत्त रहें।

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    भाषार्थ

    (हरयः) जल का हरण करने वाली, (सुपर्णाः) शीघ्रता से, पक्षियों के सदृश उड़ने वाली सूर्यरश्मियां, (कृष्णम्) काले (नियानम्) निचले मार्ग को प्राप्त हो कर, (अपो वसानाः) जल की ओढ़नी ओढ़े हुई, (दिवम्) द्युलोक की ओर (उत्पतन्ति) उड़ जाती हैं। (ते) वे रश्मियां,-जो कि जल से भरी होती हैं, (ऋतस्य) जल के (सदनात्) घर से (आववृत्रन्) लौटती हैं, (आत् इत्) तदनन्तर ही (पृथिवीम्) पृथिवी को (घृतेन) घृत द्वारा (व्यूदुः) गीली करती हैं, सींचती हैं। घृतेन= घी द्वारा तथा उदक द्वारा।

    टिप्पणी

    [कृष्णं नियानम् = कृष्ण वर्ण निचला-मार्ग है, अन्तरिक्ष। सूर्यरश्मियां प्रकाशमान सूर्य से, अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर, पृथिवी से जलाहरण कर, द्युलोक की ओर उड़ जाती हैं। ग्रीष्मकाल में जलाहरण करती रहती हैं, और वर्षा ऋतु में पृथिवी पर जल बरसाती हैं। कविता में वर्णन हुआ है। सुपर्णाः आदित्यरश्मयः। “सुपर्णा रश्मयः" (निघं० १।५)। ऋतस्य, " ऋतम् उदकनाम" (निघं० १।१२)। घृतेन, “घृतम् उदकनाम" (तिघं० १।१२)। व्यदुः= वि + उन्दी क्लेवने (रुधादिः)। घृतेन का अभिप्राय घी भी है। रश्मियां जल सींचती हुई मानो घृत सींचती है। जल द्वारा घास, ओषधियां, बनस्पतियां प्रभूत मात्रा में उत्पन्न होती हैं, और इन का भक्षण कर गौएं दुग्ध और घृत प्रदान करती हैं]

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    विषय

    आत्मा और परमात्मा का ज्ञान।

    भावार्थ

    व्याख्या देखो [ अथर्व० का० ६। २२। १ ] (नियानम्) अपने परम आश्रय स्थान (कृष्णम्) आकर्षणशील या सर्व भवदुःखों के विलेखन या विच्छेदन करनेहारे उस ब्रह्म को (सुपर्णाः) उत्तम ज्ञानसम्पन्न, मुक्त जीवात्मा (हरयः) रश्मियों के समान प्रदीक्ष तेजःसम्पन्न (अपः वसानाः) कर्म और ज्ञानों से सम्पन्न होकर (दिवम्) प्रकाशमय परम मोक्षपद को (उत्पतन्ति) जाते हैं। (ते) वे अपना मोक्षानन्द भोग कर (ऋतस्य सदनात्) उस सत्यज्ञान के आश्रय स्थान परमात्मा के पास से (आ ववृत्रन्) पुनः लौट कर आते हैं और (घृतेन इत्) प्रकाशमय ज्ञान से सूर्य में निकली किरणें जिस प्रकार मेघ-जल से पृथिवी को सींचती हैं उसी प्रकार (पृथिवीं व्यूदुः) वे पृथिवीवासी जनों को तृप्त करते हैं। अर्थात् ज्ञान का प्रकाश करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। गौः, विराड् आत्मा च देवताः। १, ७, १४, १७, १८ जगत्यः। २१ पञ्चपदा शक्वरी। २३, २४ चतुष्पदा पुरस्कृतिर्भुरिक् अतिजगती। २, २६ भुरिजौ। २, ६, ८, १३, १५, १६, १९, २०, २२, २५, २७, २८ त्रिष्टुभः। अष्टाविंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Spiritual Realisation

    Meaning

    Bright and beautiful rays of the sun, wearing vestments of vapour rise to the sun which holds the earth and its atmosphere. They turn round and down from the regions of water and flood the earth with showers of rain.

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    Translation

    The way is dark; golden birds of beautiful wings, robed in waters, fly up to the sky. From the seat of rta (righteousness) they descend and innundate the earth with. ghrta (purified butter, water). (Also Rg. I.164:47)

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    Translation

    The rays of light carrying water rise to the heaven in the Uttarayana and return back in Dakshinayana from the atmospheric region and the earth is made moistened with water of rain.

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    Translation

    The lustrous, learned souls, equipped with knowledge and virtuous deeds go to God, their highest shelter, and attain to salvation. After enjoying the pleasure of emancipation, they return from God, the House of truth, and satisfy the inhabitants of Earth with resplendent knowledge.

    Footnote

    See Rig, 1-164-47; Atharva, 6-22-1.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २२-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ६।२२।१ ॥

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