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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 10 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 23
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - मित्रावरुणौ छन्दः - त्रिष्टुप् सूक्तम् - आत्मा सूक्त
    47

    अ॒पादे॑ति प्रथ॒मा प॒द्वती॑नां॒ कस्तद्वां॑ मित्रावरु॒णा चि॑केत। गर्भो॑ भा॒रं भ॑र॒त्या चि॑दस्या ऋ॒तं पिप॑र्त्यनृ॑तं॒ नि पा॑ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒पात् । ए॒ति॒ । प्र॒थ॒मा । प॒त्ऽवती॑नाम् । क: । तत् । वा॒म् । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । आ । चि॒के॒त॒ । गर्भ॑: । भा॒रम् । भ॒र॒ति॒ । आ । चि॒त् । अ॒स्या॒: । ऋ॒तम् । पिप॑र्ति । अनृ॑तम् । नि । पा॒ति॒ ॥१५.२३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अपादेति प्रथमा पद्वतीनां कस्तद्वां मित्रावरुणा चिकेत। गर्भो भारं भरत्या चिदस्या ऋतं पिपर्त्यनृतं नि पाति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अपात् । एति । प्रथमा । पत्ऽवतीनाम् । क: । तत् । वाम् । मित्रावरुणा । आ । चिकेत । गर्भ: । भारम् । भरति । आ । चित् । अस्या: । ऋतम् । पिपर्ति । अनृतम् । नि । पाति ॥१५.२३॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 10; मन्त्र » 23
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (पद्वतीनाम्) प्रशंसित विभागोंवाली क्रियाओं में (प्रथमा) पहिली (अपात्) विना विभागवाली [सब के लिये एकरस वेदविद्या] (एति) चली आती है, (मित्रावरुणा) दोनों मित्रवरो ! [अध्यापक और शिष्य] (वाम्) तुम दोनों में (कः) किसने (तत्) उस [ज्ञान] को (आ) भले प्रकार (चिकेत) जाना है। (गर्भः) ग्रहण करनेवाला पुरुष (चित्) ही (अस्याः) इस [वेदविद्या] के (भारम्) पोषण गुण को (आ) अच्छे प्रकार (भरति) धारण करता है, (सत्यम्) सत्य व्यवहार को (पिपर्ति) पूर्ण करता है और (अनृतम्) मिथ्या कर्म को (नि) नीचे (पाति) रखता है ॥२३॥

    भावार्थ

    आचार्य और ब्रह्मचारी वेदविद्या को यथावत् समझकर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करके संसार में उन्नति करें ॥२३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।१५२।३। मन्त्र का अर्थ सहर्ष महर्षिदयानन्द-भाष्य के आधार पर किया है ॥

    टिप्पणी

    २३−(अपात्) अविद्यमानाः पादा विभागा यस्याः सा वेदविद्या (एति) प्राप्नोति (प्रथमा) आदिमा (पद्वतीनाम्) प्रशस्ताः पादा विभागा विद्यन्ते यासां तासाम् (कः) (तत्) ज्ञानम् (वाम्) युवयोर्मध्ये (मित्रावरुणा) मित्रवरौ। अध्यापकाध्याप्यौ (चिकेत) कित ज्ञाने-लिट्। ज्ञातवान् (गर्भः) यो गृह्णाति सः। विद्याग्राहकः (भारम्) पोषणगुणम् (भरति) धरति (आ) समन्तात् (चित्) अपि (अस्याः) विद्यायाः (ऋतम्) सत्यम् (पिपर्ति) पूरयति (अनृतम्) मिथ्याकर्म (नि) नीचैः (पाति) रक्षति ॥

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    विषय

    ऋत का पालन, अनृत-विनाश

    पदार्थ

    १. (पद्वतीनाम्) = पाँववाली प्रजाओं में (अपात्) = बिना पाँववाली होती हुई यह ब्रह्मशक्ति (प्रथमा एति) = सर्वप्रथम प्राप्त होती है। शरीरधारी जीव पाँववाले हैं, प्रभु अपात् है, परन्तु अपात् प्रभु को कोई पाँववाला जीत नहीं पाता। हे (मित्रावरुणा) = प्राणापानो! (वाम्) = आपमें से (तत् चिकेत) = उस ब्रह्म को जो जानता है, वह (क:) = आनन्दमय जीवनवाला होता है। २. वह प्रभु ही (गर्भ:) = सारे ब्रह्माण्ड को अपने अन्दर ग्रहण किये हुए (चित्) = निश्चय से (अस्या:) = इस पाँववाली प्रजा की (भारं आभरति) = पोषण क्रिया को (सर्वतः) = सम्यक् धारण करता है। वे प्रभु ही (ऋतं पिपर्ति) = सत्य का पालन करते हैं और (अनृतं निपाति) = अनृत को नीचे रखते हैं। सत्य की विजय और अन्त का पराभव प्रभु ही करते हैं।

    भावार्थ

    पाँववाली प्रजाओं में अपात् होते हुए भी वे प्रभु प्रथम है। प्राणसाधना द्वारा प्रभु का ज्ञान होने पर जीवन आनन्दमय होता है। प्रभु ही सबका पोषण कर रहे हैं। वे हि ऋत का रक्षण व अनृत का विनाश करते हैं।

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    भाषार्थ

    (अपाद्) पादरहित उषा (पद्वतीनाम्) पादवाली प्रजाओं से (प्रथमा) पहले (एति) आती है, (मित्रावरुणा) हे सूर्य-और-चन्द्रमा ! (वाम्) तुम दोनों में से (कः) कौन (तद्) उस घटना को (आ चिकेत) जानता है। (चित्) चिद्-ब्रह्म (गर्भः) गर्भीभूत हुआ, (अस्याः) इस उषा के (भारम्) भार को (भरति) धारण करता है, या (भरति=हरति) ढो रहा है। वह गर्भ (ऋतम्) ऋत को (पिपर्ति) पालित करता है, और (अनृतम्) अनृत को (निपाति) पूर्णतया पी जाता है, निगल जाता है।

    टिप्पणी

    ["अपाद्" उषा पाद वाली प्रजाओं से पहले आती है, अर्थात् उषा तो निज कार्य में व्याप्त हो जाती है जब कि पादों वाले मनुष्य अभी अपने अपने निज कार्यो में व्याप्त नहीं होने पाते। इस तथ्य को न तो सूर्य जानता है, और न चन्द्रमा। क्योंकि जब उषा आती है उस समय द्युलोक में न सूर्य की स्थिति होती है, न चन्द्रमा की। सूर्य उषा के पश्चात् उदित होता है, और चन्द्रमा रात को। परन्तु प्रश्न यह है कि उषा का संचालन कौन करता है? वेद ने उत्तर दिया कि “चिद्”, चिद्-ब्रह्म। चिद्-ब्रह्म उषा में गर्भरूप में स्थित है। जैसे सारथि रथ में स्थित हुआ रथ का संचालन करता है, या ड्राईवर मोटर या इञ्जन में स्थित हुआ मोटर ओर इंजन का संचालन करता है इसी प्रकार चिद्-ब्रह्म उषा के गर्भ में स्थित हुआ उषा का संचालन करता है। पिपति = पॄ पालनपुरणयोः (जुहोत्यादिः)। निपाति= पा को पिब आदेश नहीं हुआ। अतः निपाति१–नितरां पिबति, निगिरति] [१.अथवा निपाति= निः +पै (शोषणे, भ्वादिः) नितरां सुखा देता है। वैदिक प्रयोग]

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    विषय

    आत्मा और परमात्मा का ज्ञान।

    भावार्थ

    (पद्वतीनां प्रथमा) पूर्वोक्त एकपदी, द्विपदी, चतुष्पदी आदि ब्रह्मशक्तियों में से सबसे प्रथम विद्यमान, अव्याकृत ब्रह्मशकि (अपाद्) ‘अपात्’ अविज्ञेय रूप, अमात्र है। वही परम ‘तुरीय पद’ कहाती है। हे (मित्रावरुणौ) मित्र और वरुण, प्राण और अपान ! (वां कः) तुम दोनों में से कौन (तत्) उस ‘अपात्’ ब्रह्मशक्ति के स्वरूप को (चिकेत) जानता है। (अस्याः) इसके (गर्भः) गर्भ में स्थित तेजोमय स्वरूप ज्ञान या इसका धारण करनेहारा ब्रह्म ईश्वर (भारम्) समस्त विश्व के भार को या भरणपोषण के सामर्थ्य को (आभरति चित्) निश्चय से धारण करता है। और वही परमेश्वर (ऋतम्) सत्य ज्ञान और अनन्त बल या जगत् को (पिपर्त्ति) पूर्ण रूप से धारण या पालन करता है और (अमृतम्) असत्य, अज्ञान अन्धकार का नाश करता है।

    टिप्पणी

    (तृ०) ‘आचित्। अस्याः। ऋतम्।’ इति अथर्वगतमन्त्रस्य पदच्छेदः। ‘आचित्। अस्य। ऋतम्।’ इति ऋग्वेदीयः पदच्छेदः। (न्र०) ‘अस्य ऋतं’, ‘वितारीत्’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। गौः, विराड् आत्मा च देवताः। १, ७, १४, १७, १८ जगत्यः। २१ पञ्चपदा शक्वरी। २३, २४ चतुष्पदा पुरस्कृतिर्भुरिक् अतिजगती। २, २६ भुरिजौ। २, ६, ८, १३, १५, १६, १९, २०, २२, २५, २७, २८ त्रिष्टुभः। अष्टाविंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Spiritual Realisation

    Meaning

    Just as the dawn arises all at once, not in parts, before active humanity, so does Original Speech arise in creative wholeness without having been analysed into its formal constituents, with the stir of Prakrti by the Divine Will. O Mitra and Varuna, sun and moon, teacher and disciple, which one of you knows of this wonder? And just as the sun itself, which is the embryo of the dawn, bears the burden of the dawn, so does Divine Omniscience, which itself is the content of that silent speech, bear the burden of that speech. And that will, knowledge and speech protects and promotes the truth and knowledge of Rtam, law and evolution of life, and wholly rejects untruth and negation.

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    Translation

    She, the footless, goes foremost among those who have feet. O friendly Lord (Mitra) and O venerable Lord (Varuna), who has speculated about this (doing) of yours. ? (The wonder is that) the unborn ‘embryo bears her (body’s) burden; it supports the righteousness and keeps a watch over untruth.

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    Translation

    The first speech of all the articulate speeches of syllables and stanzas is without syllable and sttanzas as it is inarticulate sound. Who of you, O teacher and disciple know this fact ? The almighty alt-pervading God upholds the heavy burden of analysing this speech. He preserves truth and dispels untruth.

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    Translation

    The incorporeal soul is superior to material objects. O teacher and disciple, who of you both knows the soul! The mobile soul endures all the burden of Matter. It guards Truth and destroys Falsehood.

    Footnote

    See Rig, 1-152-3.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २३−(अपात्) अविद्यमानाः पादा विभागा यस्याः सा वेदविद्या (एति) प्राप्नोति (प्रथमा) आदिमा (पद्वतीनाम्) प्रशस्ताः पादा विभागा विद्यन्ते यासां तासाम् (कः) (तत्) ज्ञानम् (वाम्) युवयोर्मध्ये (मित्रावरुणा) मित्रवरौ। अध्यापकाध्याप्यौ (चिकेत) कित ज्ञाने-लिट्। ज्ञातवान् (गर्भः) यो गृह्णाति सः। विद्याग्राहकः (भारम्) पोषणगुणम् (भरति) धरति (आ) समन्तात् (चित्) अपि (अस्याः) विद्यायाः (ऋतम्) सत्यम् (पिपर्ति) पूरयति (अनृतम्) मिथ्याकर्म (नि) नीचैः (पाति) रक्षति ॥

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