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अथर्ववेद के काण्ड - 9 के सूक्त 10 के मन्त्र
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  • अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 21
    ऋषिः - ब्रह्मा देवता - गौः, विराट्, अध्यात्मम् छन्दः - पञ्चपदातिशक्वरी सूक्तम् - आत्मा सूक्त
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    गौरिन्मि॑माय सलि॒लानि॒ तक्ष॑ती॒ एक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पदी। अ॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑ स॒हस्रा॑क्षरा॒ भुव॑नस्य प॒ङ्क्तिस्तस्याः॑ समु॒द्रा अधि॒ वि क्ष॑रन्ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    गौ: । इत् । मि॒मा॒य॒ । स॒लि॒लानि॑ । तक्ष॑ती । एक॑ऽपदी । द्वि॒ऽपदी॑ । सा । चतु॑:ऽपदी । अ॒ष्टाऽप॑दी । नव॑ऽपदी । ब॒भू॒वुषी॑ । स॒हस्र॑ऽअक्षरा । भुव॑नस्य । प॒ङ्क्ति: । तस्या॑: । स॒मु॒द्रा: । अधि॑ । वि । क्ष॒र॒न्ति॒ ॥१५.२१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    गौरिन्मिमाय सलिलानि तक्षती एकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी। अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा भुवनस्य पङ्क्तिस्तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    गौ: । इत् । मिमाय । सलिलानि । तक्षती । एकऽपदी । द्विऽपदी । सा । चतु:ऽपदी । अष्टाऽपदी । नवऽपदी । बभूवुषी । सहस्रऽअक्षरा । भुवनस्य । पङ्क्ति: । तस्या: । समुद्रा: । अधि । वि । क्षरन्ति ॥१५.२१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 9; सूक्त » 10; मन्त्र » 21
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।

    पदार्थ

    (सलिलानि) बहुत ज्ञानों [अथवा समुद्रसमान अथाह कर्मों] को (तक्षती) करती हुई (गौः) ब्रह्मवाणी ने (इत्) ही (मिमाय) शब्द किया है, (सा) वह (एकपदी) एक [ब्रह्म] के साथ व्याप्तिवाली, (द्विपदी) दो [भूत भविष्यत्] में गतिवाली, (चतुष्पदी) चार [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] में अधिकारवाली, (अष्टापदी) [छोटाई, हलकाई, प्राप्ति, स्वतन्त्रता, बड़ाई, ईश्वरपन, जितेन्द्रियता, और सत्य सङ्कल्प आठ ऐश्वर्य] आठ पद करानेवाली (नवपदी) नौ [मन बुद्धि सहित दो कान, दो नथने, दो आँखें और एक मुख] से प्राप्ति योग्य, (सहस्राक्षरा) सहस्रों [असंख्यात] पदार्थों में व्याप्तिवाली (बभूवुषी) होकर के (भुवनस्य) संसार की (पङ्क्तिः) फैलाव शक्ति है। (तस्याः) उस [ब्रह्मवाणी] से (समुद्राः) समुद्र [समुद्ररूप सब लोक] (अधि) अधिक-अधिक (वि) विविध प्रकार से (क्षरन्ति) बहते हैं ॥२१॥

    भावार्थ

    जिस ब्रह्मवाणी, वेदविद्या से संसार के सब पदार्थ सिद्ध होते हैं और जिस की आराधना से योगी जन मुक्ति पाते हैं, वह वेदवाणी मनुष्यों को सदा सेवनीय है ॥२१॥ इस मन्त्र का मिलान करो-अ० ५।१९।७ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१।१६४।४१, ४२ तथा निरुक्त−११।४०, ४१ ॥

    टिप्पणी

    २१−(गौः) ब्रह्मवाणी (इत्) एव (मिमाय) शब्दं कृतवती (सलिलानि) सलिलं बहुनाम-निघ० ३।१। उदकनाम-निघ० १।१२। बहूनि ज्ञानानि समुद्रवद्गम्भीरकर्माणि वा (तक्षती) कुर्वती (एकपदी) संख्यासुपूर्वस्य। पा० ५।४।१३०। पदादेशः। एकेन ब्रह्मणा पदं व्याप्तिर्यस्याः सा (द्विपदी) भूतभविष्यतोर्गतिर्यस्याः सा (सा) गौः (चतुष्पदी) चतुर्वर्गे धर्मार्थकाममोक्षेषु पुरुषार्थेषु पदमधिकारो यस्याः सा (अष्टापदी) अ० ५।१९।७। अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा। ईशित्वं च वशित्वं च तथा कामावसायिता ॥१॥ इति अष्टैश्वर्याणि पदानि प्राप्तव्यानि यथा सा (नवपदी) मनोबुद्धिसहितैः सप्तशीर्षण्यच्छिद्रैः प्राप्या (बभूवुषी) भवतेः-क्वसु, ङीपि वसोः सम्प्रसारणम्। भूतवती (सहस्राक्षरा) अशेः सरः। उ० ३।७०। अशू व्याप्तौ-सर, टाप्। सहस्रेषु असंख्यातेषु पदार्थेषु व्यापनशीला (भुवनस्य) संसारस्य (पङ्क्तिः) पचि व्यक्तिकरणे-क्तिन्। विस्तारशक्तिः (तत्त्वाः) गोः सकाशात् (समुद्राः) समुद्ररूपलोकाः (अधि) अधिकम् (वि) विविधम् (क्षरन्ति) संचलन्ति ॥

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    विषय

    एकपदी-नवपदी

    पदार्थ

    १. (गौ:) = वेदवाणी (इत) = निश्चय से (मिमाय) = शब्द करती है। यह वेदवाणी इन शब्दों के द्वारा (सलिलानि) = [सति लीनानि] सत् परमात्मा में लीन ज्ञानों को (तक्षती) = हमारे लिए बनानेवाली है। जब हम इन वेदवाणियों को पढ़ेंगे तब ये हमारे अन्दर ज्ञान का निर्माण करती हुई इन शब्दों का उच्चारण करेंगी। इसका एक-एक शब्द हमारे ज्ञान की वृद्धि का कारण बनेगा। (सा) = वह वेदवाणी (एकपदी) = [पद गतौ] उस अद्वितीय परमात्मा में गति-[ज्ञान]-वाली होती है-उस अद्वितीय प्रभु का वर्णन करती है। कभी (द्विपदी) = परमात्मा और जीवात्मा-दोनों का साथ-साथ ज्ञान देती है, ताकि उनकी तुलना ठीक रूप से हो जाए और जीव अपने आदर्श को समझ ले। यह वेदवाणी (चतुष्पदी) = जीव के पुरुषार्थभूत 'धर्मार्थ-काम-मोक्ष' चारों पुरुषार्थों का ज्ञान देती है। २. (अष्टापदी) = शरीरस्थ आठों चक्रों का ज्ञान देती हुई, इन चक्रों के विकास के लिए योग के अङ्गभूत 'यम-नियम' आदि आठों अङ्गों का प्रतिपादन करती है। (नवपदी बभूवुषी) = शरीरस्थ नव इन्द्रिय-द्वारों का ज्ञान देनेवाली होती हुई यह वेदवाणी (सहस्त्राक्षरा) = हजारों रूपों से उस प्रभु को व्याप्त करती है [अक्षर व्याप्ती]-अनेक रूपों में यह प्रभु का वर्णन करती है। (भुवनस्य पंक्ति:) = [पची विस्तारे] यह ब्रह्माण्ड को विस्तृत करती है-ब्रह्माण्ड का ज्ञान देती है। (तस्याः) = उस वेदवाणी से ही (समुद्राः अधि विक्षरन्ति) = ज्ञान के समुद्रों का प्रवाह चलता है।

    भावार्थ

    वेदवाणी अद्वितीय प्रभु का वर्णन करती है। जीव व परमात्मा का तुलनात्मक चित्रण करती है। जीव के चारों पुरुषार्थों का प्रतिपादन करती है। शरीरस्थ आठों चक्रों व नौ इन्द्रिय-द्वारों का ज्ञान देती है। प्रभु तथा ब्रह्माण्ड का ज्ञान देती हुई यह ज्ञान के समुद्रों के प्रवाहवाली है।

     

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    भाषार्थ

    (सलिलानि) जलों का (तक्षती) निर्माण करती हुई (गौः) माध्यमिका अर्थात् अन्तरिक्षस्था वाक् [विद्युत्] (मिमाय) शब्द करती है। वह (एकपदी नवपदी) एक पदी आदि (बभूवुषी) होती हुई (सहस्राक्षरा) हजारों जल धाराओं को क्षरित करती हुई, (भुवनस्य) जल का (पंक्तिः) विस्तार करती है। (तस्याः अधि) उस से (समुद्राः) समुद्र (विक्षरन्ति) अलग-अलग क्षरित होते हैं। [पार्थिव समुद्र वर्षाजनित ही है]।

    टिप्पणी

    [गौः वाङ्नाम (निघं० १।११)। मिमाय= माङ माने शब्दे च (जुहोत्यादिः)। तक्षती =कुर्वती (निरुक्त ११।४।४०)। सहस्राक्षरा=बहूदका (निरुक्त ११।४।४०)। तथा अक्षरः, अक्षरम्, अक्षराः=उदकम् (निघं० १।१२)। भुवनस्य; भूवनम् उदक नाम (निघं० १।१२)। पंक्तिः= पचि विस्तारवचने (चुरादिः)। एकपदी सम्भवतः एकपाद, द्विपाद आदि वाले मन्त्रों में वर्णित वाक् [विद्युत्]। निरुक्त में कहा है कि "एकपदी मध्यमेन, द्विपदी मध्यमेन च आदित्येन च, चतुष्पदी दिग्भिः, अष्टापदी दिग्भिश्चावान्तरदिग्भिश्च, नवपदी दिग्भिश्चावान्तरदिग्भिश्चादित्येन च"। अर्थात् इन ९ स्थानों में बाक् [विद्युत्] के होने के कारण वाक् [विद्युत्] एकपदी आदि है। तथा गौः=वेद वाक् (गौः वाङ्नाम, निघं० १।११)। यह "एकपाद" आदि मन्त्रों में विभक्त है। यह सहस्राक्षरा अर्थात हजारों अक्षरों [अर्थात वर्णमाला के अक्षरों] द्वारा निर्मित है। शतपथ ब्राह्मण में तीन वेदों में १०८००X८० अक्षर कहे हैं (का० १०।४।२।२५)।सलिलानि = बहुनाम (निघं० ३।१)। "बहु" शब्द विशेषण है, इसका उपयुक्त विशेष्य 'ज्ञान' प्रतीत होता है। अतः मन्त्र २१ में सलिलानि= बहूनि ज्ञानानि। वेदवाक् नानाविध ज्ञानों का निर्माण अर्थात् प्रकाश करती है। वेदवाक् से समुद्र क्षरित हुए हैं ४ वेद, जो कि ज्ञानसागर हैं]।

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    विषय

    आत्मा और परमात्मा का ज्ञान।

    भावार्थ

    (गौः इत्) वह पूर्वोक्त गौ, व्यापक ब्रह्मशक्ति ही (सलिलानि) जगत् के कारणस्वरूप प्रकृति के सूक्ष्म आपः स्वरूप परमाणुओं को (तक्षती) विपरिणत करके सृष्टि की रचना करती है। वह (एकपदी) एक ब्रह्म रूप से जानने योग्य होने से ‘एकपदी’ है। वह (द्विपदी) चर और अचर रूप से या प्रकृति-पुरुष रूप से भेद वर्तमान रहने के कारण ‘द्विपदी’ कहाती है। (चतुष्पदी) चारों दिशाओं में व्यापक होने से या चार भूतों में परिणाम पैदा करने से ‘चतुष्पदी’ कहाती है। (अष्टापदी) अवान्तर दिशाओं में व्याप्त होने से अथवा वह ब्रह्मशक्ति प्रकृति के आठ भेदों से आठ रूपों में अभिव्यक्त होने के कारण ‘अष्टापदी’ कहाती है। (नवपदी) वही उक्त आठों में पुरुष या जीवात्मा की गणना से ‘नवपदी’ कहाती है। वही (सहस्राक्षरा) सहस्रा या बलमयी, शक्तिमयी ‘अक्षरा’, अविनाशिनी ब्रह्म शक्ति, सहस्रों पृथक् रूपों में या सहस्र=विश्व के रूपों में प्रादुर्भाव होनेवाली (भुवनस्य) इस समस्त भुवन, ब्रह्माण्ड की (पङ्क्तिः) पकाने या परिपक्व करनेवाली है अर्थात् उसको अपरिपक्व, अव्याकृत दशा से परिपक्व अर्थात् व्याकृत दशा में लानेवाली है। ‘एकपदी’—‘अजः एकपात्’। वेद। ‘द्विपदी’—प्रकृति पुरुषञ्चैव विद्व्यनादी उभावपि। [ गीता १३। १२] ‘चतुष्पदी’—प्रकृति पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। [ गीता० १३। १ ] ‘अष्टापदी’—भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्न प्रकृतिरष्टधा। [ गी० अ० ७। ४। ] ‘नवपदी’—अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ [ गी० ३। ७। ५] ‘सहस्राक्षरा’—एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा। [ गी० अ० ७। ६] (तस्याः) उसी ब्रह्मशक्ति से (समुद्राः) समुद्र, अक्षय भण्डार प्रकृति के अक्षयकोष (अधि वि क्षरन्ति) नाना प्रकार से बह रहे हैं। पांचों भूत पांच अक्षय कोष हैं। एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्तिभिः। जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत्। इति मनुः १२। १। ४॥ वीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् [ गी० अ० १०। ] वाक् पक्ष में—वह सदा ब्रह्ममयी वाणी, घट आदि पदार्थों को प्रकाशित करती हुई, अव्याकृत ‘ओम्’ रूप एकपदा; सुप् तिङ् भेद से द्विपदा, नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात भेद से ‘चतुष्पदा’; सात विभक्ति और सम्बोधन भेद से ‘अष्टापदी’; अव्यय भेद से नवपदी, अथवा नाभि सहित कण्ठ तालु आदि भेद से नवपदी और फिर भी नाना रूप होकर परम व्योम हृदय देश या मूलाधार में सहस्राक्षरा होकर विराजती है, इति दिक्।

    टिप्पणी

    (प्र०) ‘गौरीर्मिमाय’ (च०) ‘सहस्राक्षरा परमे व्योमन्’ इति ऋ०। पञ्चमः पादः। ऋ० २। १६४। ४२॥ इत्यस्याः प्रथमः पादः।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ब्रह्मा ऋषिः। गौः, विराड् आत्मा च देवताः। १, ७, १४, १७, १८ जगत्यः। २१ पञ्चपदा शक्वरी। २३, २४ चतुष्पदा पुरस्कृतिर्भुरिक् अतिजगती। २, २६ भुरिजौ। २, ६, ८, १३, १५, १६, १९, २०, २२, २५, २७, २८ त्रिष्टुभः। अष्टाविंशर्चं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (4)

    Subject

    Spiritual Realisation

    Meaning

    The Voice of Veda, knowledge and enlighte¬ nment, in spotless white light of the Word in the highest heaven of eternal omniscience, ever keen to reveal and grow, speaks loud and bold, stirring the stillness of space in waves of consciousness in the universal mind and in the pools of the seer’s mind, and thus reveals the Word in forms and structures for humanity: One Veda as the knowledge, two Vedas as knowledge and action, three Vedas as knowledge, action and prayer, four Vedas as one compendium of discrete forms, eightfold knowledge of four Vedas and four Upa-Vedas of practical knowledge such as health science (Ayurveda), military science (Dhanurveda), etc., and nine stage knowledge, the nineth being grammar, phonetics, etc. Indeed, this is knowledge contained in countless thousand variations of the One imperishable Word AUM. This is the expansive evolution of the universe of one Prakrti and of the one Word, and from that One, flow out the oceanic streams of nature and the Word.

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    Translation

    The divine speech has been uttered enabling the thoughts to flow, and is one-footed, two-footed, four-footed, eight-footed, nine-footed in the innermost region of heart. (Also Rg. I.164.41)

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    Translation

    This speech of the middle region thunders aloud forming the rain. This becoming one-worded, two worded, four worded eight worded, nine-worded and thousand-syllabled is spreading throughout the world in articulate sound. The oceans descend from it. [N.B.: Here the mystery of speech has been exploded in the Verse. The speech of the middle region, the lightning is inarticulate sound. But develops itself in the from of articuled speech besides raining water.]

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    Translation

    The Vedic speech has spoken of various forms of knowledge and preached multifarious duties. It deals with one God. It gives us the knowledge of the past and future. It tells us of religion, worldly prosperity, desirable objects, and salvation. It grants us eight boons. It is attainable through nine organs. Dealing with various topics it is a vast force in the world. Through Divine force inexhaustible stores of Matter are flowing in various forms.

    Footnote

    Chatushpadi: Dharma, Artha, Kama, Moksha. Ashtpadi: (1) Smallness (Anima) (2) Lightness (Laghima) (3) Acquisition (Prapti) (4) Freedom (Prakamayam) (5) Greatness (Mahima) (6) Superiority (Ishitvam) (7) Control over senses (Jitendryata) (8) True resolve (Kama Ansayita). Navpadi: Mind, Intellect (बुद्धि) two ears, two eyes, two noses, mouth.

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    संस्कृत (1)

    सूचना

    कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।

    टिप्पणीः

    २१−(गौः) ब्रह्मवाणी (इत्) एव (मिमाय) शब्दं कृतवती (सलिलानि) सलिलं बहुनाम-निघ० ३।१। उदकनाम-निघ० १।१२। बहूनि ज्ञानानि समुद्रवद्गम्भीरकर्माणि वा (तक्षती) कुर्वती (एकपदी) संख्यासुपूर्वस्य। पा० ५।४।१३०। पदादेशः। एकेन ब्रह्मणा पदं व्याप्तिर्यस्याः सा (द्विपदी) भूतभविष्यतोर्गतिर्यस्याः सा (सा) गौः (चतुष्पदी) चतुर्वर्गे धर्मार्थकाममोक्षेषु पुरुषार्थेषु पदमधिकारो यस्याः सा (अष्टापदी) अ० ५।१९।७। अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा। ईशित्वं च वशित्वं च तथा कामावसायिता ॥१॥ इति अष्टैश्वर्याणि पदानि प्राप्तव्यानि यथा सा (नवपदी) मनोबुद्धिसहितैः सप्तशीर्षण्यच्छिद्रैः प्राप्या (बभूवुषी) भवतेः-क्वसु, ङीपि वसोः सम्प्रसारणम्। भूतवती (सहस्राक्षरा) अशेः सरः। उ० ३।७०। अशू व्याप्तौ-सर, टाप्। सहस्रेषु असंख्यातेषु पदार्थेषु व्यापनशीला (भुवनस्य) संसारस्य (पङ्क्तिः) पचि व्यक्तिकरणे-क्तिन्। विस्तारशक्तिः (तत्त्वाः) गोः सकाशात् (समुद्राः) समुद्ररूपलोकाः (अधि) अधिकम् (वि) विविधम् (क्षरन्ति) संचलन्ति ॥

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