अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 10/ मन्त्र 25
ऋषिः - ब्रह्मा
देवता - गौः, विराट्, अध्यात्मम्
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - आत्मा सूक्त
58
श॑क॒मयं॑ धू॒ममा॒राद॑पश्यं विषू॒वता॑ प॒र ए॒नाव॑रेण। उ॒क्षाणं॒ पृश्नि॑मपचन्त वी॒रास्तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन् ॥
स्वर सहित पद पाठश॒क॒ऽमय॑म् । धू॒मम् । आ॒रात् । अ॒प॒श्य॒म् । वि॒षु॒ऽवता॑ । प॒र: । ए॒ना । अव॑रेण । उ॒क्षाण॑म् । पृश्नि॑म् । अ॒प॒च॒न्त॒ । वी॒रा: । तानि॑ । धर्मा॑णि । प्र॒थ॒मानि॑ । आ॒स॒न् ॥१५.२५॥
स्वर रहित मन्त्र
शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एनावरेण। उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ॥
स्वर रहित पद पाठशकऽमयम् । धूमम् । आरात् । अपश्यम् । विषुऽवता । पर: । एना । अवरेण । उक्षाणम् । पृश्निम् । अपचन्त । वीरा: । तानि । धर्माणि । प्रथमानि । आसन् ॥१५.२५॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थ
(शकमयम्) शक्तिवाले (धूमम्) कँपानेवाले [परमेश्वर] को (आरात्) समीप से (एना) इस (विषुवता) व्याप्तिवाले (अवरेण) नीचे [जीव] से (परः) परे [उत्तम] (अपश्यम्) मैंने देखा है। (वीराः) वीर लोगों ने [इसी कारण से] (उक्षाणम्) वृद्धि करनेवाले (पृश्निम्) स्पर्श करनेवाले [आत्मा] को (अपचन्त) परिपक्व [दृढ़] किया है, (तानि) वे (धर्माणि) धारण योग्य [ब्रह्मचर्य आदि धर्म] (प्रथमानि) मुख्य [प्रथम कर्तव्य] (आसन्) थे ॥२५॥
भावार्थ
योगीजन सर्वशक्तिमान् सब को चेष्टा देनेवाले परमेश्वर को अल्पशक्ति जीव से अलग देखते हैं और उन्नति करते हैं जैसे वीर लोग परमात्मा के ज्ञान से अपने आत्मा को परिपक्व करके धर्म में प्रवृत्त रहते हैं ॥२५॥ इस मन्त्र का चतुर्थ पाद आ चुका है-अ० ७।५।१ ॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१।१६४।४३ ॥
टिप्पणी
२५−(शकमयम्) शक्लृ सामर्थ्ये-अच्। शक्तिमयम् (धूमम्) अ० ६।७६।२। इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। धूञ् कम्पने-मक्, अन्तर्गतण्यर्थो वा। कम्पयितारं परमात्मानम्। कम्पकं जीवम् (आरात्) समीपात् (अपश्यम्) अहं दृष्टवान् (विषुवता) व्याप्तिमता (परः) परस्तात् (एना) (अपश्यम्) अहं दृष्टवान् (विषुवता) व्याप्तिमता (परः) परस्तात् (एना) एनेन (अवरेण) निकृष्टेन जीवेन (उक्षाणम्) अ० ३।११।८। उक्ष सेचने वृद्धौ च-कनिन्। वृद्धिकर्तारम् (पृश्निम्) अ० २।१।१। स्पृश−स्पर्शे-नि प्रत्ययः, सलोपः। स्पर्शशीलमात्मानम् (अपचन्त) परिपक्वं दृढं कृतवन्तः (वीराः) शूराः (तानि) (धर्माणि) धारणीयानि ब्रह्मचर्यादीनि कर्माणि (प्रथमानि) मुख्यानि कर्तव्यानि (आसन्) अभवन् ॥
विषय
धूएँ से अग्नि का ज्ञान
पदार्थ
१. (शकमयम्) = [शकृन्मयं शुष्कगोमयसंभूतम्] उपलों की अग्नि से उठे हुए (धूमम्) = धूएँ को (आरात् अपश्यम्) = मैंने दूरी पर देखा है और (एना) = इस (विषूवता) = व्यासिवाले चारों ओर फैले हुए (अवरेण) = समीप ही विद्यमान धूर से (पर:) [परस्तात् तत्कारणात् तम् अग्निम्] दूर-आँखों से ओझल अग्नि को मैंने जाना है। जिस प्रकार धुएं को देख मैं आग्नि को जान पाता हूँ, उसी प्रकार यहाँ अपराविद्या में रचना के ज्ञान से रचयिता का ज्ञान प्राप्त करता हूँ। इसप्रकार इस अपराविद्या की अन्तिम सीमा ही पराविद्या हो जाती है। प्रकृति का ज्ञान ही प्रभु के दर्शन में परिणत हो जाता है। २. प्रभु संसारशकट का वहन करनेवाले 'महान् उक्षा' हैं, तो यह जीव इस पिण्ड का वहन करता हुआ 'पृश्नि [अल्पतनू] उक्षा' है। इस (पृश्निम् उक्षाणम्) = छोटे शरीरवाले जीवरूप उक्षा को (वीराः अपचन्त) = ज्ञान शूर आचार्य ज्ञानाग्नि में परिपक्व करते हैं। इसे वे विदग्ध बनाने का प्रयत्न करते हैं। (तानि धर्माणि) = ये 'प्रकृति, जीव व परमात्मा' के ज्ञानों में परिपक्व करना रूप धर्म ही (प्रथमानि आसन्) = मुख्य धर्म है। यह ज्ञान ही उसे प्रकृति की रचना में प्रभु की महिमा को देखने के योग्य बनाएगा।
भावार्थ
धूएँ से जैसे अग्नि का ज्ञान होता है, इसी प्रकार इस सृष्टि-रचना से इसके रचयिता का। व्याप्त विद्यावाले आचार्य जीव को प्रकृति, जीव व प्रभु का ज्ञान देते हैं। यह ज्ञान देना ही मुख्य धर्म है।
भाषार्थ
(शकमयम्) प्रचुरशक्ति वाले (धूमम्) धूम को (आरात्) अपने समीप (अपश्यम्) मैंने देखा है, जो कि (विषूवता) अन्तरिक्ष में फैलने वाले (एना) इस प्रत्यक्ष (अवरेण) अवर धूम से (परः) उत्कृष्ट है। (उक्षाणम्) मुझ में शक्ति सींचने वाले, (पृश्निम्) संसार को स्पर्श किये हुए परमेश्वर को (वीराः) ध्यानवीर योगी (अपचन्त) परिपक्व करते हैं, अभिव्यक्त करते रहे हैं, या अभिव्यक्त करते हैं, (तानि) वे और उस प्रकार के (धर्माणि) धर्म कर्म (प्रथमानि) मुख्य या सर्वश्रेष्ठ (आसन्) रहें हैं, या हैं।
टिप्पणी
[मन्त्र में दो प्रकार के धूम का वर्णन हुआ है, अवर धूम का और "परः" धूम का। अवर धूम विषवत् है, अन्तरिक्ष में फैलने वाला है। "विष्लृ व्याप्तौ"। और "परः धूम" समीपवर्ती है। आरात् दूरसामीप्ययोः। मन्त्र में "आरात" का अर्थ है समीप। द्रष्टा ने इस समीप के धूम को देखा है। यह आध्यात्मिक धूम है, काष्ठ और शकृतजन्य नहीं। आध्यात्मिक धूम का वर्णन श्वेताश्वतर उपनिषद् में हुआ है। यथा– नीहारधूमार्कानलानिलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम्। एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ।। अध्याय २, खण्ड ११॥ कोहरा, धूम, सूर्य, अग्नि, वायु, जुगनू या आकाश में द्युतिमान् तारागण; स्फटिक, चान्द— ये रूप योगाभ्यास में प्रथम दृष्टिगोचर होते हैं, जो कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति के सूचक होते हैं। मन्त्र २५ में इस आध्यात्मिक धूम का वर्णन हुआ है जिसे कि "परः" कहा है, श्रेष्ठ कहा है। मन्त्र में "अपचन्त" पद पठित है, जिस का अर्थ "पकाना" प्रतीत होता है, साथ ही "उक्षा" पद भी पठित है जिस का प्रसिद्ध अर्थ है बैल। इन दो शब्दों को देखकर अथर्ववेद के आङ्गलभाषा में अनुवाद के कर्ता "ह्विटनी" ने अर्थ किया है "The heroes coocked a spotted ox" अर्थात् "वीरों ने चितकबरे बैल को पकाया"। अपचन्त में पच धातु है। भ्वादिगण में "पचि व्यक्तीकरणे" भी पठित है, जिस का अर्थ है "अभिव्यक्त करना"। श्वेताश्वतर उपनिषद् के प्रमाण में भी “अभिव्यक्तिकराणि" ही पाठ है। इस प्रकार मन्त्र और श्वेताश्वतर में शब्दों और अर्थ में साम्य हो जाता है। "पचि" धातु यद्यपि आत्मनेपदी है, और "नुम्" की अपेक्षा करती है। परन्तु वैदिक प्रयोगों और लौकिक संस्कृत के प्रयोगों में प्रायः वैषम्य पाया जाता है। इसलिये अष्टाध्यायी में "बहुलं छन्दसि" कहा है। साथ ही पाकार्थक “पच्" धातु का अर्थ मन्त्र में संगत नहीं होता। "उक्षाणं पृश्निअपचन्त वीराः" में यदि यह भावना हो कि "वीर" परमेश्वर का परिपाक करते हैं, उसे ध्यानाभ्यास में परिपक्व करते हैं तब "अपचन्त” में “पच्” धातु परिपाक अर्थ में भी संगत प्रतीत होती हैं]।
विषय
आत्मा और परमात्मा का ज्ञान।
भावार्थ
मैं तत्वदर्शी ऋषि, (विषूवता) नाना प्रकार से उत्पत्ति क्रिया से युक्त (एना अवरेण) इस प्रत्यक्ष कार्यरूप जगत् से (परः) परे (शकमयम्) शक्तिमय (धूमम्) इस संसार को गति देने वाले परमेश्वर को कारण रूपसे; (आरात्) साक्षात् (अपश्यम्) देख रहा हूँ। (वीराः) वीर्यवान् ब्रह्मचारी विद्वान् लोग उसी (उक्षाणम्) समस्त जगत् को धारण करने में समर्थ (पृश्निम्) आदित्य स्वरूप, तेजोमय समस्त आनन्द रसों को धारण करने वाले आनन्दघन को (अपचन्त) योग अभ्यास, तप द्वारा परिपक्व करते हैं। (तानि) ये (धर्माणि) धारण करने योग्य यम, नियम आदि के तपोमय आचार (प्रथमानि) सबसे श्रेष्ठ (आसन्) हैं जिनके अभ्यास से उस परम शक्ति का साक्षात् होता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ब्रह्मा ऋषिः। गौः, विराड् आत्मा च देवताः। १, ७, १४, १७, १८ जगत्यः। २१ पञ्चपदा शक्वरी। २३, २४ चतुष्पदा पुरस्कृतिर्भुरिक् अतिजगती। २, २६ भुरिजौ। २, ६, ८, १३, १५, १६, १९, २०, २२, २५, २७, २८ त्रिष्टुभः। अष्टाविंशर्चं सूक्तम्॥
इंग्लिश (4)
Subject
Spiritual Realisation
Meaning
I have ‘seen’ that infinite omnipotent Being wrapped in mystery beyond the eye. I have it from far and near, boundless, dynamic, here, there, everywhere, yet far beyond this closest light of mundane reality. That mighty brave generous Spirit, the brave realise to their self-perfection, and what they do and the way they do are the first ordinances of noble living.
Translation
I behold near (me) the smoky clouds; and by that one arrives l at the universe concept of inference of cause (the cosmic heat) from the effect. The priests have glorified with affectionate laurels that causal fire in the fire-rituals for such are their first duties. (Also Rg. I:164.43)
Translation
I, the man of intuitive power see the mighty Lord giving the motion to world and being far away and separate from this perceptible present world of multifarious phenomena. The men brave in knowledge and action make ripe and mature their spiritual power which whowers wisdom and happiness. The rules and observances to attain this power are the first and important codes of conduct.
Translation
I have directly seen the Almighty God, Who is higher than this world | below, full of various sorts of creation. The celibate, learned persons, through yoga and penance, fully perceive God, the Controller of the universe, and full of luster and joy. These are the primary laws of celibacy and austerity through which God is realized.
Footnote
See Rig, 1-164-43.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२५−(शकमयम्) शक्लृ सामर्थ्ये-अच्। शक्तिमयम् (धूमम्) अ० ६।७६।२। इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। धूञ् कम्पने-मक्, अन्तर्गतण्यर्थो वा। कम्पयितारं परमात्मानम्। कम्पकं जीवम् (आरात्) समीपात् (अपश्यम्) अहं दृष्टवान् (विषुवता) व्याप्तिमता (परः) परस्तात् (एना) (अपश्यम्) अहं दृष्टवान् (विषुवता) व्याप्तिमता (परः) परस्तात् (एना) एनेन (अवरेण) निकृष्टेन जीवेन (उक्षाणम्) अ० ३।११।८। उक्ष सेचने वृद्धौ च-कनिन्। वृद्धिकर्तारम् (पृश्निम्) अ० २।१।१। स्पृश−स्पर्शे-नि प्रत्ययः, सलोपः। स्पर्शशीलमात्मानम् (अपचन्त) परिपक्वं दृढं कृतवन्तः (वीराः) शूराः (तानि) (धर्माणि) धारणीयानि ब्रह्मचर्यादीनि कर्माणि (प्रथमानि) मुख्यानि कर्तव्यानि (आसन्) अभवन् ॥
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