अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 3/ मन्त्र 4
सूक्त - अथर्वा
देवता - वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
अ॒यं ते॑ कृ॒त्यां वित॑तां॒ पौरु॑षेयाद॒यं भ॒यात्। अ॒यं त्वा॒ सर्व॑स्मात्पा॒पाद्व॑र॒णो वा॑रयिष्यते ॥
स्वर सहित पद पाठअ॒यम् । ते॒ । कृ॒त्याम् । विऽत॑ताम् । पौरु॑षेयात् । अ॒यम् । भ॒यात् । अ॒यम् । त्वा॒ । सर्व॑स्मात् । पा॒पात् । व॒र॒ण: । वा॒र॒यि॒ष्य॒ते॒ ॥३.४॥
स्वर रहित मन्त्र
अयं ते कृत्यां विततां पौरुषेयादयं भयात्। अयं त्वा सर्वस्मात्पापाद्वरणो वारयिष्यते ॥
स्वर रहित पद पाठअयम् । ते । कृत्याम् । विऽतताम् । पौरुषेयात् । अयम् । भयात् । अयम् । त्वा । सर्वस्मात् । पापात् । वरण: । वारयिष्यते ॥३.४॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 3; मन्त्र » 4
भाषार्थ -
(अयम्) यह (वरणः) शत्रूनिवारक सेनाध्यक्ष (ते) तेरे [विरोध में] (वितताम्) विस्तृत (कृत्याम्) विनाशिनी सेना को (वारयिष्यते) निवारित करेगा, (अयम्) यह (पौरुषेयात्, भयात्) सैनिक पुरुषों से होने वाले भय से [तेरी रक्षा करेगा]। (अयम्) यह (सर्वस्मात् पापात्) शत्रु द्वारा किये जाने वाले सब पापकृत्यों से (त्वा) तुझे (वारयिष्यते) निवारित करेगा, तुझे सुरक्षित करेगा।
टिप्पणी -
[मुख्यरूप में सेनाध्यक्ष के कर्तव्यों का वर्णन हुआ है। राजा की उक्ति सैनिक सर्वोच्चाधिकारी के प्रति है। मन्त्र में कृत्या का वर्णन हुआ है। इस द्वारा सूक्त का समन्वय पूर्व सूक्त १ के साथ दर्शाया है। सूक्त ३ गौणरूप में रोगरूपी कृत्या का भी वर्णन अभिप्रेत है। रोगरूपी कृत्या का वर्णन पूर्व सूक्त १ में नहीं हुआ। जनपद-ध्वंसी रोगों को "वितताम् कृत्याम्" द्वारा निर्दिष्ट किया है। और "पौरुषेयाद् वधात्" द्वारा माता-पिता से प्राप्त होने वाले रोगों को निर्दिष्ट किया है (८)। "पापात्" द्वारा दर्शाया है कि रोग पापजन्य हैं। इस प्रकार "वरण-ओषधि" का भी सम्बन्ध मन्त्र में है। मन्त्र में युद्ध को भी पापकर्म कहा है]।