अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 3/ मन्त्र 6
सूक्त - अथर्वा
देवता - वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
सूक्तम् - सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
स्वप्नं॑ सु॒प्त्वा यदि॒ पश्या॑सि पा॒पं मृ॒गः सृ॒तिं यति॒ धावा॒दजु॑ष्टाम्। प॑रिक्ष॒वाच्छ॒कुनेः॑ पापवा॒दाद॒यं म॒णिर्व॑र॒णो वा॑रयिष्यते ॥
स्वर सहित पद पाठस्वप्न॑म् । सु॒प्त्वा । यदि॑ । पश्या॑सि । पा॒पम् । मृ॒ग: । सृ॒तिम् । यति॑ । धावा॑त् । अजु॑ष्टाम् । प॒रि॒ऽक्ष॒वात् । श॒कुने॑: । पा॒प॒ऽवा॒दात् । अ॒यम् । म॒णि: । व॒र॒ण: । वा॒र॒यि॒ष्य॒ते॒ ॥३.६॥
स्वर रहित मन्त्र
स्वप्नं सुप्त्वा यदि पश्यासि पापं मृगः सृतिं यति धावादजुष्टाम्। परिक्षवाच्छकुनेः पापवादादयं मणिर्वरणो वारयिष्यते ॥
स्वर रहित पद पाठस्वप्नम् । सुप्त्वा । यदि । पश्यासि । पापम् । मृग: । सृतिम् । यति । धावात् । अजुष्टाम् । परिऽक्षवात् । शकुने: । पापऽवादात् । अयम् । मणि: । वरण: । वारयिष्यते ॥३.६॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 3; मन्त्र » 6
भाषार्थ -
(स्वप्नम् सुप्त्वा) सोने से उठ कर (यदि) यदि (पापम्, पक्ष्यासि) पाप अर्थात् बुरा दृश्य तू देखे कि (यति = यदि) यदि (मृगः) छिद्रान्वेषी शत्रुगुप्तचर (अजुष्टाम्) अप्रिय या उस द्वारा असेवित (सृतिम्) मार्ग में (धावात्) दौड़-धूप कर रहा है, या मृगरूपी शत्रु दौड़-धूप कर रहा है, तो उस दृश्य से; (परिक्षवात्) यदि सब और शोर-शराबा हो रहा है, उससे (शकुनेः) या शक्तिशाली शत्रु के (पापवादात्) पापमय कथनों से (अयं, वरणः, मणिः) यह शत्रुनिवारक श्रेष्ठ सेनाध्यक्ष (वारयिष्यते) उस सब का निवारण कर देगा।
टिप्पणी -
[मन्त्र में वरणनामक सेनाध्यक्ष का मुख्यरूप में वर्णन है। "स्वप्नंसुप्त्वा" में "क्त्वा" प्रत्यय द्वारा यह अर्थ होता है कि "सोकर उठने पर" अर्थात् जागने पर, न कि स्वप्नावस्था में। राजा या सेना का सर्वोच्चाधिकारी जागने पर यदि मन्त्रोक्त दृश्यों को देखता है तो उन के निवारण के लिये वह यत्नवान् होता है। "मृग" का अभिप्राय है "छिद्रान्वेषी गुप्तचर" "मृग" अन्वेषणे" (चुरादिः), अथवा 'मृगः स मृगयुस्त्वम्" (अथर्व० १०।१।२६) अर्थात् शत्रु का सेनाध्यक्ष "मृग" है, और तू निज सेनाध्यक्ष "मृगयु" है, मृग का शिकारी है। पापमय दृश्य निम्नलिखित मन्त्र में दर्शाए हैं, (१) शत्रुपक्ष के गुप्तचरों का राष्ट्र में घुस कर राष्ट्र के मार्गों में दौड़-धूप करना (२) उन द्वारा राष्ट्र या राजधानी में सब ओर शोर मचाना। परिक्षव= परि (सब ओर) + क्षव (टक्षु शब्दे, अदादिः)। (३) पापवादात् = पापकथन, अर्थात् राजा या सेनाधिकारी की निन्दा और अपमानजनक शब्दों का कथन करना। मन्त्र में यत्किंचित् वरण-औषध का भी निर्देश किया है। "परिक्षव" का अर्थ है "सब ओर हो रही "छींकें", तथा "पापवादात्" का अर्थ है कण्ठ की बुरी आबाज, खांसना। ये अवस्थाएं जुकाम में हो जाती है। वरण-ओषधि के सेवन से ये अवस्थाएं निवारित हो सकती हैं। पैप्पलाद शाखा में "यति" के स्थान में "यदि" पाठ है]।