अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 3/ मन्त्र 18
सूक्त - अथर्वा
देवता - वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
यथा॒ यश॑श्च॒न्द्रम॑स्यादि॒त्ये च॑ नृ॒चक्ष॑सि। ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु। तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥
स्वर सहित पद पाठयथा॑ । यश॑: । च॒न्द्रम॑सि । आ॒दि॒त्ये । च॒ । नृ॒ऽचक्ष॑सि । ए॒व । मे॒ । व॒र॒ण: । म॒णि: । की॒र्तिम् । भूति॑म् । नि । य॒च्छ॒तु॒ । तेज॑सा । मा॒ । सम् । उ॒क्ष॒तु॒ । यश॑सा । सम् । अ॒न॒क्तु॒ । मा॒ ॥३.१८॥
स्वर रहित मन्त्र
यथा यशश्चन्द्रमस्यादित्ये च नृचक्षसि। एवा मे वरणो मणिः कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु। तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा ॥
स्वर रहित पद पाठयथा । यश: । चन्द्रमसि । आदित्ये । च । नृऽचक्षसि । एव । मे । वरण: । मणि: । कीर्तिम् । भूतिम् । नि । यच्छतु । तेजसा । मा । सम् । उक्षतु । यशसा । सम् । अनक्तु । मा ॥३.१८॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 3; मन्त्र » 18
भाषार्थ -
(यथा) जैसे (यशः) यश (चन्द्रमसि, आदित्ये च नृचक्षसि) मनुष्यों पर दृष्टि रखने वाले चन्द्रमा और आदित्य में है। (एवा) इसी प्रकार (वरणः मणिः) श्रेष्ठ तथा शत्रुनिवारक सेनाध्यक्षरूपी राज्यरत्न (मे) मुझ राजा में (कीर्त्तिम्) कीर्ति को, और (भूतिम्) वैभव को (नि यच्छतु) नियत करे, स्थापित करे, (तेजसा) तेज से (मा) मुझे (समुक्षतु) सम्यक् सींचे, (यशमा) यश से (मा) मुझे (समनक्तु) सम्यक्-कान्तिमान् करे।
टिप्पणी -
["नृचक्षसि" का अन्वय चन्द्रमा और आदित्य दोनों के साथ है। आदित्य दिन के समय और चन्द्रमा रात्रि के समय "नृचक्षाः" है। मन्त्र में राजा भी यश की प्राप्ति का इच्छुक है। राजा भी चन्द्रमा१ और आदित्य के दृष्टान्त द्वारा "नृचक्षाः" होने के यश का अभिलाषी है। वह भी चाहता है कि प्रजाजनों पर उस की सदा दृष्टि रहें, प्रजाजनों के सुख-दुःख तथा समुन्नति उस की दृष्टि में सदा रहें]। [१. चन्द्रमा शीतल है, और आदित्य तीक्ष्ण। राजा भी इन दोनों दृष्टियों द्वारा शासन करना चाहता है।]