अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 3/ मन्त्र 9
सूक्त - अथर्वा
देवता - वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
व॑र॒णेन॒ प्रव्य॑थिता॒ भ्रातृ॑व्या मे॒ सब॑न्धवः। अ॒सूर्तं॒ रजो॒ अप्य॑गु॒स्ते य॑न्त्वध॒मं तमः॑ ॥
स्वर सहित पद पाठव॒र॒णेन॑ । प्रऽव्य॑थिता: । भ्रातृ॑व्या: । मे॒ । सऽब॑न्धव: । अ॒सूर्त॑म् । रज॑: । अपि॑ । अ॒गु॒: । ते । य॒न्तु॒ । अ॒ध॒मम् । तम॑: ॥३.९॥
स्वर रहित मन्त्र
वरणेन प्रव्यथिता भ्रातृव्या मे सबन्धवः। असूर्तं रजो अप्यगुस्ते यन्त्वधमं तमः ॥
स्वर रहित पद पाठवरणेन । प्रऽव्यथिता: । भ्रातृव्या: । मे । सऽबन्धव: । असूर्तम् । रज: । अपि । अगु: । ते । यन्तु । अधमम् । तम: ॥३.९॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 3; मन्त्र » 9
भाषार्थ -
(वरणेन) शत्रूनिवारक सेनाध्यक्ष द्वारा (प्रव्यथिताः) उग्र व्यथा को प्राप्त हुई (मे) मेरे (भ्रातृव्याः) भाई की सन्तानें, (सबन्धवः) बन्धुओं सहित, (असूर्तम्) हम द्वारा अप्रेरित, अशासित (रजः) प्रदेशों में (अपि अगुः) चली गई हैं, छिप गई हैं। (ते) वे (अधमम् तमः) अधम तम अर्थात् अन्धकार को (यन्तु) प्राप्त हों।
टिप्पणी -
[मन्त्र में सेनाध्यक्ष का वर्णन है। असुर और देव दोनों भाई हैं। "द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च" (वृहदा० उप० १।३।१)। असुर निज भोगः प्रवृत्ति के कारण दूषित हो गए। परिणामतः उन की सन्ताने भी दुष्प्रवृत्तियों वाली हो गईं। ये सन्तानें हैं, भ्रातृव्य अर्थात् भाई के पुत्र आदि। इन के अन्य सम्बन्धी भी, अर्थात् इन के साथ जिन अन्यों ने वैवाहिक सम्बन्ध किये हैं वे हैं "सबन्धवः"। वे भी दूषितप्रकृति के सम्भावित हैं, "यतः समानशीलव्यसनेषु सख्यम्"। ऐसे व्यक्तियों को सेनाध्यक्ष उग्र व्यथाओं में डाले, ऐसा वैदिकविधान मन्त्र द्वारा द्योतित होता है। तथा उन्हें तमः प्रधान स्थानों में बन्द करदे, यह वेदोक्त दण्ड१ है। असूर्तम् = अ + सू (प्रेरणे, तुदादिः) + क्त; रकारस्यागमः, अर्थात् हम शासकों द्वारा अप्रेरित, अशासित प्रदेश। रजः = "लोका रजांस्युच्यन्ते" (निरुक्त ४।३।१९)। अप्यगुः= अपि + अगुः][१. अपराधियों की अनुपस्थिति में भी यह दण्ड है।]