अथर्ववेद - काण्ड 10/ सूक्त 3/ मन्त्र 1
सूक्त - अथर्वा
देवता - वरणमणिः, वनस्पतिः, चन्द्रमाः
छन्दः - अनुष्टुप्
सूक्तम् - सपत्नक्षयणवरणमणि सूक्त
अ॒यं मे॑ वर॒णो म॒णिः स॑पत्न॒क्षय॑णो॒ वृषा॑। ते॒ना र॑भस्व॒ त्वं शत्रू॒न्प्र मृ॑णीहि दुरस्य॒तः ॥
स्वर सहित पद पाठअयम् । मे॒ । व॒र॒ण: । म॒णि: । स॒प॒त्न॒ऽक्षय॑ण: । वृषा॑ । तेन॑ । आ । र॒भ॒स्व॒ । त्वम् । शत्रू॑न् । प्र । मृ॒णी॒हि॒ । दु॒र॒स्य॒त: ॥३.१॥
स्वर रहित मन्त्र
अयं मे वरणो मणिः सपत्नक्षयणो वृषा। तेना रभस्व त्वं शत्रून्प्र मृणीहि दुरस्यतः ॥
स्वर रहित पद पाठअयम् । मे । वरण: । मणि: । सपत्नऽक्षयण: । वृषा । तेन । आ । रभस्व । त्वम् । शत्रून् । प्र । मृणीहि । दुरस्यत: ॥३.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 10; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
विषय - वीर राजा और सेनापति का वर्णन।
भावार्थ -
(अयम्) यह (वरणः) सब से वरण करने या मुख्य रूप से चुनने योग्य श्रेष्ठतम हम में से राज्यतिलक द्वारा अभिषेक करने योग्य अथवा शत्रु का वारण करने हारा पुरुष ही (मणिः) शिरोमणि सब का प्रमुख नेता होता है। वह स्वयं (वृषा) सब सुखों का वर्षक, शकट के भार को उठाने योग्य वृषभ के समान राज्य भार को उठाने में समर्थ, बलवान् या मेघ के तुल्य सुखों का वर्षक (सपत्न-क्षयणः) शत्रुओं का नाशक है। हे राष्ट्रपते ! (तेन) ऐसे पुरुष के बल पर (त्वं) तू (शत्रून्) शत्रुओं को (रभस्व) विनाश कर या पकड़ और (दुरस्यतः) दुष्ट कामना करने वालों को (प्र मृणीहि) विनाश कर।
टिप्पणी -
‘वरुणो’ इति सर्वत्र पैप्प० सं०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - अथर्वा ऋषिः। वरणो, वनस्पतिश्चन्द्रमाश्च देवताः। २, ३ ६ भुरिक् त्रिष्टुभः, ८ पथ्यापंक्तिः, ११, १६ भुरिजौ। १३, १४ पथ्या पंक्ती, १४-१७, २५ षट्पदा जगत्य:, १, ४, ५, ७, ९, १०, १२, १३, १५ अनुष्टुभः। पञ्चविशर्चं सूक्तम्॥
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