अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 70/ मन्त्र 1
वी॒डु चि॑दारुज॒त्नुभि॒र्गुहा॑ चिदिन्द्र॒ वह्नि॑भिः। अवि॑न्द उ॒स्रिया॒ अनु॑ ॥
स्वर सहित पद पाठवीलु । चि॒त् । आ॒रु॒ज॒त्नुऽभि॑: । गुहा॑ । चि॒त् । इ॒न्द्र॒ । वह्नि॑भि: ॥ अवि॑न्द: । उ॒स्रिया॑: । अनु॑ ॥७०.१॥
स्वर रहित मन्त्र
वीडु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः। अविन्द उस्रिया अनु ॥
स्वर रहित पद पाठवीलु । चित् । आरुजत्नुऽभि: । गुहा । चित् । इन्द्र । वह्निभि: ॥ अविन्द: । उस्रिया: । अनु ॥७०.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 70; मन्त्र » 1
विषय - राजा परमेश्वर।
भावार्थ -
हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवन् ! सूर्य जिस प्रकार (गुहाचित्) आकाश में (वीलु चित्) अपने बल से ही (आरुजत्नुभिः) मेघों को भङ्ग कर देने वाले (वह्निभिः) वहन करने वाले प्रबल वायुओं से मेघों को छिन्न भिन्न करके (उस्त्रियाः) किरणों द्वारा समस्त लोकों को (अनु अविन्दः) प्राप्त करता है। उसी प्रकार वह परमेश्वर (आरुजत्नुभिः) सब प्रकार दुःखों का नाश करने वाले (वह्निभिः) ज्ञान के नेता विद्वान् पुरुषों द्वारा या शरीर का वहन करने वाले प्राणों द्वारा (वीलु चित्) बलपूर्वक (गुहा) हृदयाकाश में (उस्त्रियाः) अपने ज्ञान प्रकाशों को फैलाकर (अनु अविन्दः) सबको व्याप्त करता है। अथवा (उस्त्रियाः) ऊर्ध्वगति, मोक्ष मार्ग में सर्पण करने वाले मुमुक्षु आत्माओं को अपने (अनु) पीछे पीछे उन पर अनुग्रह करके (अविन्दः) अपने पास ले लेता है।
राजा के पक्ष में—(वीलु चित्) बल से (गुहा चित्) गुप्त दुर्गों को भी (आरुजत्नुभिः) तोड़ डालने वाले (वह्निभिः) सेना नायकों द्वारा राजा (उस्त्रियाः) उत्तम पदार्थों को देने वाली प्रजा और भूमियों को (अनु अविन्दः) स्वयं प्राप्त कर लेता है।
टिप्पणी -
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - ऋषिः—मधुच्छन्दाः। देवता—१,२,६-२० इन्द्रमरुतः, ३-५ मरुतः॥ छन्दः—गायत्री॥
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