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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 32 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 32/ मन्त्र 2
    ऋषिः - हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः देवता - इन्द्र: छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अह॒न्नहिं॒ पर्व॑ते शिश्रिया॒णं त्वष्टा॑स्मै॒ वज्रं॑ स्व॒र्यं॑ ततक्ष । वा॒श्रा इ॑व धे॒नवः॒ स्यन्द॑माना॒ अञ्जः॑ समु॒द्रमव॑ जग्मु॒रापः॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अह॑न् । अहि॑म् । पर्व॑ते । शि॒श्रि॒या॒णम् । त्वष्टा॑ । अ॒स्मै॒ । वज्र॑म् । स्व॒र्य॑म् । त॒त॒क्ष॒ । वा॒श्राःऽइ॑व । धे॒नवः॑ । स्यन्द॑मानाः । अञ्जः॑ । स॒मु॒द्रम् । अव॑ । ज॒ग्मुः॒ । आपः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष । वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अहन् । अहिम् । पर्वते । शिश्रियाणम् । त्वष्टा । अस्मै । वज्रम् । स्वर्यम् । ततक्ष । वाश्राःइव । धेनवः । स्यन्दमानाः । अञ्जः । समुद्रम् । अव । जग्मुः । आपः॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 32; मन्त्र » 2
    अष्टक » 1; अध्याय » 2; वर्ग » 36; मन्त्र » 2
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    संस्कृत (1)

    विषयः

    (अहन्) हतवान् हन्ति हनिष्यति वा (अहिम्) मेघमिवशत्रुम् (पर्वते) मेघमण्डले इव गिरौ। पर्वत इति मेघनामसु पठितम्। निघं० १।१०। (शिश्रियाणम्) विविधाश्रयम्। (त्वष्टा) स्वकिरणैः छेदनसूक्ष्मकर्त्ता स्वतेजोभिःशचुविदारको वा। (अस्मै) मेघाय दुष्टाय वा (वज्रम्) छेदनस्वभावं किरणसमूहं शस्त्रवृन्दं वा (स्वर्यम्) स्वरे गर्जने वाचि वा साधुस्तम्। स्वर इति वाङ्नामसु पठितम्। निघं० १।११। इदं पदं सायणाचार्येण मिथ्यैव व्याख्यातम्। (ततक्ष) छिनत्ति। (वाश्रा इव) वत्सप्राप्तिमुत्कंठिताःशब्दायमाना इव (धेनवः) गावः। (स्यन्दमानाः) प्रस्रवन्त्यः (अञ्जः) व्यक्तागमनशीला वा। अञ्जूव्यक्तिकरण इत्यस्य प्रयोगः। (समुद्रम्) जलेन पूर्णं सागरमन्तरिक्षं वा (अव) नीचार्थे (जग्मुः) गच्छन्ति (आपः) जलानि शत्रुप्राणा वा ॥२॥

    अन्वयः

    पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते।

    पदार्थः

    यथा ऽयं त्वष्टा सूर्य्यलोकः पर्वते शिश्रियाणं स्वर्य्यमहिमहन् हन्ति। अस्मै मेधाय वज्रं ततक्ष तक्षति। एतेन कर्मणा वाश्रा धेनव इव स्यन्दमाना अंज आपः समुद्रमवजग्मुरवगच्छन्ति। तथैव सभाध्यक्षो राजा दुर्गमाश्रितं शत्रुं हन्यादस्मै शत्रवे वज्रं तक्षेत्तेन वाश्रा धेनव इव स्यन्दमाना अंज आपः समुद्रमवगमयेत् ॥२॥

    भावार्थः

    अत्रोपमालङ्कारः। यथा सूर्यःस्वकिरणैरंतरिक्षस्थं मेघं भूमौ निपात्य जगज्जीवयति तथा सेनेशोदुर्गपर्वताद्याश्रितमपि शत्रुं पृथिव्यां संपात्य प्रजाः सततं सुखयति ॥२॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह सूर्य्य तथा सभापति क्या करता है। इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

    पदार्थ

    जैसे यह (त्वष्टा) सूर्य्यलोक (पर्वते) मेघमण्डल में (शिश्रियाणम्) रहनेवाले (स्वर्य्यम्) गर्जनशील (अहिम्) मेघ को (अहन्) मारता है (अस्मै) इस मेघ के लिये (वज्रम्) काटने के स्वभाववाले किरणों को (ततक्ष) छोड़ता है। इस कर्म से (वाश्रा धेनव इव) बछरो को प्रीतिपूर्वक वा चाहती हुई गौओं के समान (स्यन्दमानाः) चलते हुए (अंजः) प्रकट (आपः) जल (समुद्रम्) जल से पूर्ण समुद्र को (अवजग्मुः) नदियों के द्वारा जाते हैं। वैसे ही सभाध्यक्ष राजा को चाहिये कि किला में रहनेवाले दुष्ट शत्रु को मारे इस शत्रु के लिये उत्तम शस्त्र छोड़े इस प्रकार उसके बछरों को चाहनेवाली गौओं के समान चलते हुए प्रसिद्ध प्राणों को अन्तरिक्ष में प्राप्त करे उन कण्टक शत्रुओं को मार के प्रजा को सुख देवे ॥२॥

    भावार्थ

    इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपनी किरणों से अन्तरिक्ष में रहनेवाले मेघ को भूमि पर गिराकर जगत् को जिआता है वैसे ही सेनापति किला पर्वत आदि में रहनेवाले भी शत्रु को पृथिवी में गिरा के प्रजा को निरन्तर सुखी करता है ॥२॥

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    विषय

    वात्सल्य - भक्ति

    पदार्थ

    १. गतमन्त्र का इन्द्र (पर्वते) - पञ्चपर्वत अविद्या में (शिश्रियाणम्) - आश्रय करनेवाले (अहिम्) - वासनारूप अहि को (अहन्) - नष्ट करता है । सारी वासनाओं का मूल अविद्या है ; अविद्या में ही ये वासनाएँ पनपती हैं । 

    २. (त्वष्टा) - [त्विषेर्वास्याद्दीप्तिकर्मणः त्वक्षतेर्वा] सब ज्ञान - दीप्तियों का अथवा शक्तियों का कर्ता प्रभु (अस्मै) - इस इन्द्र के लिए (स्वर्यम्) - सब सुखों की प्राप्ति के साधनभूत अथवा [स्वृ शब्दे] जिसमें निरन्तर प्रभुनाम - स्मरण चल रहा है ऐसे (वज्रम्) - इस क्रियाशीलतारूप वज्र को (ततक्ष) - बनाता है, कर्मों को करता हुआ वह सदा प्रभु - स्मरण करता है, इस वज्र से वह सब वासनाओं का विनाश करने में समर्थ होता है । 

    ३. इस प्रकार वासनाओं के नष्ट हो जाने पर (वाश्रा) - शब्द करती हुई (धेनवः) - नव प्रसूतिका गौएँ (इव) - जिस प्रकार (स्यन्दमानाः) - पानी की तरह तीव्रता से गति करती हुई बछड़े के प्रति जाती है इसी प्रकार (स्यन्दमानाः) - अपने कार्य में प्रवृत्त होती हुई (आपः) - ये क्रियाओं में व्याप्त रहनेवाली प्रजाएँ [आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः] (अजः) - उस ज्ञानज्योति से देदीप्यमान [अञ्ज - व्यक्ति] (स - मुद्रम्) - सदा आनन्दमय प्रभु के प्रति (अवजग्मुः) - नम्रता से प्राप्त होती हैं । 'जैसे गौ बछड़े के प्रति, इसी प्रकार ये क्रियाशील प्रजाएँ प्रभु के प्रति प्राप्त होती हैं ' इस उपमा में वात्सल्य - भक्ति का सुन्दर चित्रण है । वात्सल्य - भक्ति में भक्त को प्रभु उसी प्रकार प्रिय होते हैं जैसे कि माता को पुत्र । एक माता अकेली जा रही हो तो शेर के आने पर भयभीत हो भाग खड़ी होगी और कहीं आस - पास छुपने का प्रयत्न करेगी, परन्तु यही माता पुत्र के साथ होने पर उस शेर से निर्भीक लड़ेगी और भाग न खड़ी होगी । यही वात्सल्य भक्ति का परिणाम है, इसमें भक्त वीर व निर्भीक बन जाता है । 

    भावार्थ

    भावार्थ - इन्द्र अविद्यामूलक वासना का विनाश करता है । सर्वज्ञ प्रभु ने इस कार्य के लिए उसे क्रियाशीलतारूप वज्र दिया है । इस वज को हाथ में लिये हुए यह इन्द्र वासनारूप शेर का विनाश करता है और उस प्रभु की ओर जाता है, जो सब ज्ञानों की ज्योति से देदीप्यमान हैं और सदा आनन्द के साथ निवास करते हैं । धेनु अपने नवप्रसूत बछड़े की ओर जैसे प्रेम से जाती है और उसका रक्षण करती है, उसी प्रकार यह कार्यव्यापृत भक्त प्रभु - भावना को अपने में सुरक्षित करता है । 

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    विषय

    फिर वह सूर्य्य तथा सभापति क्या करता है। इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है।

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    (ऋषिकृत)- यथा अयं त्वष्टा सूर्य्यलोकः पर्वते शिश्रियाणं स्वर्यम् अहिम् अहन् हन्ति। अस्मै मेधाय वज्रं ततक्ष तक्षति। एतेन कर्मणा वाश्रा धेनवः इव स्यन्दमाना अंजः आपः समुद्रम् अवजग्मुः अवगच्छन्ति। तथैव सभाध्यक्षः राजा दुर्गमाश्रितं शत्रुं हन्यात् अस्मै शत्रवे वज्रं तक्षेत् तेन वाश्राः धेनवः इव स्यन्दमानाः अंज आपः समुद्रम् अवगमयेत् ॥२॥  

    पदार्थ

    (यथा)=जैसे,   (अयम्)=यह, (त्वष्टा) स्वकिरणैः छेदनसूक्ष्मकर्त्ता स्वतेजोभिःशत्रुविदारको वा=अपनी किरणों से शत्रु के सूक्ष्म छेदन करने वाला,  (सूर्य्यलोकः)=सूर्य्यलोक,  (पर्वते) मेघमण्डले इव गिरौ=मेघमण्डल जैसे पर्वत में, (शिश्रियाणम्) विविधाश्रयम्=विविध सहारों से,  (स्वर्यम्) स्वरे गर्जने वाचि वा साधुस्तम्=गर्जनशील,  (अहिम्) मेघमिवशत्रुम्=मेघ रूपी शत्रु को, (अहन्) हतवान् हन्ति हनिष्यति वा हन्ति=मारता है,  (अस्मै) मेघाय दुष्टाय वा=इस मेघ अथवा दुष्ट के लिये, (वज्रम्) छेदनस्वभावं किरणसमूहं शस्त्रवृन्दं वा=छेदन के स्वभाववाले किरणों को, (ततक्ष) छिनत्ति=  (ततक्ष) छेदता है। (एतेन)=इस, (कर्मणा)=कर्म से, (वाश्रा) वत्सप्राप्तिमुत्कंठिताःशब्दायमाना=बछड़ों की प्राप्ति के लिये उत्कंठित होकर आवाज करती हुई  गौओं के समान,  (स्यन्दमानाः) प्रस्रवन्त्यः=तीव्रता से जाते हुए, (अञ्जः) व्यक्तागमनशीला वा=प्रकट रूप से  आने वाले स्वभाव की,  (समुद्रम्) जलेन पूर्णं सागरमन्तरिक्षं वा=जल से पूर्ण समुद्र को, (अव-नीचार्थे)=नीचे,  (जग्मुः) गच्छन्ति= जाती हैं, (तथैव)=वैसे ही,  (सभाध्यक्षः)=सभाध्यक्ष (राजा)=राजा को चाहिये कि (दुर्गमाश्रितम्)=किलों में रहनेवाले,  (शत्रुम्)=शत्रु को  (हन्यात्)=मारे, (अस्मै)=इस,  (शत्रवे)=शत्रु को, (वज्रम्) छेदनस्वभावं किरणसमूहं शस्त्रवृन्दं वा=छेदन स्वभाव के किरणों के समूह अथवा शत्रुओं के समूह,  (तक्षेत्)=छेदें,  (तेन)=उनके द्वारा,  (वाश्राः)=बछड़ों की प्राप्ति के लिये उत्कंठित होकर आवाज करती हुई,  (धेनवः)=गौओं, (इव)=के समान,  (स्यन्दमानाः)=तीव्रता से जाते हुए, (अञ्जः) व्यक्तागमनशीला वा=प्रकट रूप से  जाने वाले स्वभाव की, (आपः) जलानि शत्रुप्राणा वा=जलों या शत्रुओं के प्राणों का, (समुद्रम्)=अन्तरिक्ष में, (अवगमयेत्)=प्रत्यक्ष जानें॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपनी किरणों से अन्तरिक्ष में रहनेवाले मेघ को भूमि पर गिराकर जगत् को जिआता है वैसे ही सेनापति किला पर्वत आदि में रहनेवाले भी शत्रु को पृथिवी में गिरा के प्रजा को निरन्तर सुखी करता है ॥२॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)


    (यथा) जैसे   (अयम्) यह (त्वष्टा) अपनी किरणों से शत्रु के सूक्ष्म छेदन करने वाला  (सूर्य्यलोकः) सूर्य्यलोक  (पर्वते) जैसे मेघमण्डल में पर्वत (शिश्रियाणम्) विविध सहारों से  (स्वर्यम्) गर्जनशील  (अहिम्) मेघ रूपी शत्रु को (अहन्) मारता है अथवा छिन्न-भिन्न करता है,  (अस्मै) इस मेघ अथवा दुष्ट के लिये (वज्रम्) छेदन के स्वभाववाले किरणों से (ततक्ष) छेदता है। (एतेन) इस (कर्मणा) कर्म से (वाश्रा) बछड़ों की प्राप्ति के लिये उत्कंठित होकर आवाज करती हुई  गौओं के समान  (स्यन्दमानाः) तीव्रता से जाते हुए (अञ्जः) प्रकट रूप से  आने वाले स्वभाव की  (समुद्रम्) जल से पूर्ण समुद्र को (अव) नीचे  (जग्मुः) जाती हैं। (तथैव) वैसे ही  (सभाध्यक्षः) सभाध्यक्ष (राजा) राजा को चाहिये कि (दुर्गमाश्रितम्) किलों में रहनेवाले  (शत्रुम्) शत्रु को  (हन्यात्) मारे। (अस्मै) इस  (शत्रवे) शत्रु को (वज्रम्) छेदन स्वभाव के किरणों के समूह अथवा शत्रुओं के समूह  (तक्षेत्) छेदें।  (तेन) उनके द्वारा  (वाश्राः) बछड़ों की प्राप्ति के लिये उत्कंठित होकर आवाज करती हुई  (धेनवः) गौओं (इव) के समान  (स्यन्दमानाः) तीव्रता से जाते हुए (अञ्जः) प्रकट रूप से  जाने वाले स्वभाव की (आपः) जलों या शत्रुओं के प्राणों को (समुद्रम्) अन्तरिक्ष में (अवगमयेत्) प्रत्यक्ष जानें॥ 

    संस्कृत भाग

    पदार्थः(महर्षिकृतः)- (अहन्) हतवान् हन्ति हनिष्यति वा (अहिम्) मेघमिवशत्रुम् (पर्वते) मेघमण्डले इव गिरौ। पर्वत इति मेघनामसु पठितम्। निघं० १।१०। (शिश्रियाणम्) विविधाश्रयम्। (त्वष्टा) स्वकिरणैः छेदनसूक्ष्मकर्त्ता स्वतेजोभिःशचुविदारको वा। (अस्मै) मेघाय दुष्टाय वा (वज्रम्) छेदनस्वभावं किरणसमूहं शस्त्रवृन्दं वा (स्वर्यम्) स्वरे गर्जने वाचि वा साधुस्तम्। स्वर इति वाङ्नामसु पठितम्। निघं० १।११। इदं पदं सायणाचार्येण मिथ्यैव व्याख्यातम्। (ततक्ष) छिनत्ति। (वाश्रा इव) वत्सप्राप्तिमुत्कंठिताःशब्दायमाना इव (धेनवः) गावः। (स्यन्दमानाः) प्रस्रवन्त्यः (अञ्जः) व्यक्तागमनशीला वा। अञ्जूव्यक्तिकरण इत्यस्य प्रयोगः। (समुद्रम्) जलेन पूर्णं सागरमन्तरिक्षं वा (अव) नीचार्थे (जग्मुः) गच्छन्ति (आपः) जलानि शत्रुप्राणा वा ॥२॥
    विषयः- पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते। 

    अन्वयः- यथा ऽयं त्वष्टा सूर्य्यलोकः पर्वते शिश्रियाणं स्वर्य्यमहिमहन् हन्ति। अस्मै मेधाय वज्रं ततक्ष तक्षति। एतेन कर्मणा वाश्रा धेनव इव स्यन्दमाना अंज आपः समुद्रमवजग्मुरवगच्छन्ति। तथैव सभाध्यक्षो राजा दुर्गमाश्रितं शत्रुं हन्यादस्मै शत्रवे वज्रं तक्षेत्तेन वाश्रा धेनव इव स्यन्दमाना अंज आपः समुद्रमवगमयेत् ॥२॥

    भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्रोपमालङ्कारः। यथा सूर्यःस्वकिरणैरंतरिक्षस्थं मेघं भूमौ निपात्य जगज्जीवयति तथा सेनेशोदुर्गपर्वताद्याश्रितमपि शत्रुं पृथिव्यां संपात्य प्रजाः सततं सुखयति ॥२॥

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    विषय

    सूर्य, वायु, विद्युत् और मेघ के वर्णन से वीर सेनापतियों के कर्मों का वर्णन ।

    भावार्थ

    (पर्वते) पर्वत पर या मेघमण्डल मैं (शिश्रियाणम्) आश्रय लेने वाले (अहिम्) मेघ को जिस प्रकार (त्वष्टा) कान्तिमान् सूर्य या वायु (अहन्) अघात करता है और (अस्मै) इस राजा के लिये (त्वष्टा) शिल्पी जिस प्रकार शस्त्र बनाता है उसी प्रकार स्वयं सूर्य (स्वर्यं) घोर गर्जना करने और अतितापदायी (वज्रं) विद्युत रूप वज्र को (ततक्ष) उत्पन्न करता है। उसी प्रकार विजयशील राजा (पर्वते) पालन करने में समर्थ गिरि पर्वत या बड़े राजा के (शिश्रियाणं) आश्रय पर रहने वाले अपने, न जीता छोड़ने योग्य, बध्य शत्रु को (अहन्) मारे। और (त्वष्टा) करीगर शिल्पी (अस्मै) उसके मारने के लिये (स्वर्यं) अति गर्जना कारी अतिताप या अग्नि से चलने योग्य (वज्रं) शस्त्र को (ततक्ष) बनावे। (आपः) और जिस प्रकार (धेनवः) दुधार गौएं (स्यन्दमानाः) दूध की धाराएं प्रेमवश बहाती हुईं अपने बछड़े के पास वेग से जाती हैं उसी प्रकार (आपः) जलधाराएं भी (अञ्जः) प्रकट रूप में, अति शीघ्र (स्यन्दमानाः) बहती हुईं (समुद्रम्) अन्तरिक्ष और समुद्र को (अवजग्मुः) पहुंच जाती है उसी प्रकार (आपः) प्रजाएं (अञ्जः) शीघ्र ही प्रेम से वशीभूत (स्यन्दगानाः) अतिद्रवीभूत होकर (समुद्रम् अव जग्मुः) समुद्र के समान गम्भीर राजा के पास आवें।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    हिरण्यस्तूप आङ्गिरस ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ त्रिष्टुभः । पञ्चदशर्चं सूक्तम् ।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात उपमालंकार आहे. सूर्य आपल्या किरणांनी अंतरिक्षात राहणाऱ्या मेघाला भूमीवर उतरवून जगाला जीवित ठेवतो तसेच सेनापती किल्ला, पर्वत इत्यादीमध्ये राहणाऱ्या शत्रूंचा निःपात करतो व प्रजेला निरन्तर सुख देतो. ॥ २ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Indra, lord of shooting rays of light, breaks the cloud resting on the mountain. Tvashta, creative power of the Divine, making fine forms and subtle energies, creates the catalytic power for Him and His shooting rays against the cloud. And, like cows eager for the calves, rushing to the stalls, the waters instantly rush down to the sea.

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    Subject of the mantra

    Then, what that Sun and chairman of the assembly do, this subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    (yathā)=Just as, (ayam)=this (tvaṣṭā)=one who pierces the enemy with his rays, (sūryyalokaḥ) =the Sun world, (parvate)=as a mountain in the clouds, (śiśriyāṇam)=by various supports, (svaryam)=roaring, (ahim)=to cloud-like enemies, (ahan)=kills or shatters, (asmai)=For this cloud or evil, (vajram)=by penetrating rays, (tatakṣa)=pierces, (etena)=this, (karmaṇā)=by the deeds, (vāśrā)=like cows crying out for calves, (syandamānāḥ)=going fast, (añjaḥ)=coming of in the manifest nature, (samudram)=to the sea full of water (ava)=downwards, (jagmuḥ)=go, (tathaiva)=in the same way, (sabhādhyakṣaḥ)=Chairman, (rājā)=the king should, (durgamāśritam)=those living in forts, (śatrum)=to enemies, (hanyāt)=kill, (asmai)=this, (śatrave)= to the enemy, (vajram)=Groups of rays of penetrating nature or groups of enemies, (takṣet)=pierce, (tena)=by them, (vāśrāḥ)=making sound, being anxious to get calves (dhenavaḥ)=cows, (iva) ke samāna (syandamānāḥ)=going fast, (añjaḥ)=going of the manifest nature, (āpaḥ)=of water or the soul of enemies (samudram)=in space, (avagamayet)= know evidently.

    English Translation (K.K.V.)

    Just as, it pierces the enemy's subtle holes with its rays, like a mountain in the cloud, kills or disintegrates the enemy like a cloud with various means, for this cloud or wicked, it pierces with rays of piercing nature. For the attainment of these calves, going furiously like a cow, making a sound, they go down to the ocean full of water of the coming nature. Similarly, the chairman should kill the enemy living in the forts. Bunch of rays of penetrating nature or groups of enemies must pierce. Being anxious to get calves, the cows making sound, going fast, having the manifest nature of going know evidently water or the soul of enemies in the space.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is simile as a figurative in this mantra. Just as the Sun animates the world with its rays by bringing down the clouds in space to the ground, similarly, the commander, who lives in the fort, mountain, etc., brings down the enemy to the earth and makes the people constantly happy.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What does he (Indra) do is further taught in the second Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    1. The Sun who is disintegrator by his rays, strikes down the thundering cloud seeking refuge on the mountain; he sharpens his far-whirling bolt in the form of his rays; then the flowing waters quickly hasten to the ocean like cows hastening to their calves. 2. The king who is the President of the Assembly should be full of vigor and splendor like the Sun. He should be destroyer of his un-righteous enemies with his splendor and force. He should smite the foe who has taken shelter in the royal fort with his powerful and destructive weapons. He should put an end to the life of such wicked and unrighteous enemies.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    ( अहिम्) मेघमिव शत्रुम् = Enemy like the cloud. ( पर्वते) मेघमण्डले इव गिरौ = On the mountain like the Clouds. पर्वत इति मेघनांमसु पठितम् ( निघ० १.१० ) ( त्वष्टा) (१) स्वकिरणै: छेदनसूक्ष्मकर्ता सूर्यः, (२) स्वतेजोभिः शत्रुविदारको वा सेनासभाध्यक्षः 1. The disintegrator of the articles-the Sun. २. The disintegrator or destroyer of enemies-the Commander of the army or the President of the Assembly. (स्वर्यम् ) स्वरे गर्जने वाचि वा साधुम् = Thundering or speaking loudly. स्वर इति वाङ् नामसुपठितम् (निघ० १.११) इदं पदं सायणाचार्येण मिथ्यैव व्याख्यातम् || = Sayanacharya has explained this word wrongly. (वाश्रा इव) वत्सप्राप्तिमुत्कण्ठिताः शब्दायमाना इंव गाव: = Like the lowing cows eager to meet their calves. ( अंज:) व्यक्ता गमनशीला वा = Manifest or moving. अंजू व्यत्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु इत्यस्य प्रयोगः (समुद्रम् ) जलेन पूर्णसागरम् अन्तरिक्षं वा = To the ocean full of water or the firmament. (अप:) जलानि शत्रुप्राणा वा = Waters or the lives of the enemies.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    There is Upamalankar or simile used in the Mantra. As. the Sun gives new life to all beings by striking down the cloud in the firmament and bringing it down on the earth, in the same manner, the Commander of the army should strike down wicked enemies who take shelter in the mountains or the forts and thereby should gladden the people constantly.

    Translator's Notes

    Rishi Dayananda in his commentary has pointed out the mistake of Sayanacharya regarding सवर्यम् Sayanacharya seems to be himself un-certain about the correct derivation and interpretation. He gives two derivations quite different from each other and Rishi Dayananda's main objection seems to his first arbitrary interpretation which is- ऋ-गतौ अस्मात् सुपूर्वकात् ऋहलोर्ण्यत् इति ण्यत् । संज्ञापूर्वको विधिरनित्य इति वृद्ध्यभावः । This derivation is arbitrary and farfetched. Being himself dissatisfied with this interpretation (to which Rishi Dayananda has rightly objected) Sayanacharya gives another derivation or interpretation saying. (२) यदा स्व-शब्दोषतापयोः इत्यस्मात् णयति पूर्ववद् वृद्धयभावः । तित् स्वरितम् इति स्वरितत्वम् || Rishi 'Dayananda's own interpretation based upon the Vedic Lexicon-Nighantu ( 1.II) is akin to this, which is natural and direct.आप: has been interpreted by Rishi Dayananda as जलानि शत्रु प्राणा वा The first meaning of waters is too well-known to require any authority. The second meaning of शत्रुप्राणा: वा is based upon the following and other Brahmanic passages. प्राणा वा आपः ॥ तैत्तिरीय० ३.२.५.२ ॥ ताण्ड्यमहाब्राह्मणे ९.९.४ आपो वै प्राणाः ॥ शत० ३.८.२.४ ।। प्राणो ह्यापः ॥ जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मणे ३.१०.९

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