ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 80/ मन्त्र 11
ऋषिः - गोतमो राहूगणः
देवता - इन्द्र:
छन्दः - निचृदास्तारपङ्क्ति
स्वरः - पञ्चमः
इ॒मे चि॒त्तव॑ म॒न्यवे॒ वेपे॑ते भि॒यसा॑ म॒ही। यदि॑न्द्र वज्रि॒न्नोज॑सा वृ॒त्रं म॒रुत्वाँ॒ अव॑धी॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठइ॒मे । चि॒त् । तव॑ । म॒न्यवे॑ । वेपे॑ते॒ इति॑ । भि॒यसा॑ । म॒ही । यत् । इ॒न्द्र॒ । व॒ज्रि॒न् । ओज॑सा । वृ॒त्रम् । म॒रुत्वान् । अव॑धीः । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
इमे चित्तव मन्यवे वेपेते भियसा मही। यदिन्द्र वज्रिन्नोजसा वृत्रं मरुत्वाँ अवधीरर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥
स्वर रहित पद पाठइमे। चित्। तव। मन्यवे। वेपेते इति। भियसा। मही। यत्। इन्द्र। वज्रिन्। ओजसा। वृत्रम्। मरुत्वान्। अवधीः। अर्चन्। अनु। स्वऽराज्यम् ॥
ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 80; मन्त्र » 11
अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 31; मन्त्र » 1
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अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 31; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥
अन्वयः
हे वज्रिन्निन्द्र सभाद्यध्यक्ष ! यद्यस्य तवौजसा यथा सूर्यस्याकर्षणेन ताडनेन चेमे मही वेपेते तत्तुल्यस्य तव भियसा मन्यवे बलेन शत्रवोऽनुकम्पन्ते यथा मरुत्वानिन्द्रो वृत्रं हन्ति तथा स्वराज्यमन्वर्चन्नरांश्चिदवधीः ॥ ११ ॥
पदार्थः
(इमे) वक्ष्यमाणे (चित्) अपि (तव) (मन्यवे) न्यायव्यवस्थापालनहेतवे (वेपेते) चलतः (भियसा) भयेन (मही) महत्यौ द्यावापृथिव्यौ (यत्) यस्य (इन्द्र) सभाद्यध्यक्षराजन् (वज्रिन्) सुशिक्षितशस्त्रविद्यायुक्त (ओजसा) सेनाबलेन (वृत्रम्) मेघमिवारीन् (मरुत्वान्) प्रशस्तवायुमान् (अवधीः) हिन्धि (अर्चन्) (अनु) (स्वराज्यम्) ॥ ११ ॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सभाप्रबन्धेन प्रजाः सुखेन सन्मार्गेण गच्छन्त्यागच्छन्ति तथैव सूर्यस्याकर्षणेन सर्वे भूगोला गच्छन्त्यागच्छन्ति यथा सूर्यो मेघं हत्वा जलेन प्रजाः पालयति, तथैव सभासभाद्यध्यक्षौ शत्र्वन्यायौ हत्वा विद्यान्यायप्रचारेण प्रजाः पालयेताम् ॥ ११ ॥
हिन्दी (4)
विषय
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥
पदार्थ
हे (वज्रिन्) शस्त्रविद्या को ठीक-ठीक जाननेवाले (इन्द्र) सभाध्यक्ष राजन् ! (यत्) जिस (तव) आपके (ओजसा) सेना के बल से जैसे सूर्य के आकर्षण और ताड़न से (इमे) ये (मही) लोक (वेपेते) कँपते हैं, उनके समान जो आप (भियसा) भयबल से (मन्यवे) क्रोध की शान्ति के लिये शत्रु लोग (अनु) अनुकूल होके कम्पते रहते हैं जैसे (मरुत्वान्) बहुत वायु से युक्त सूर्य (वृत्रम्) मेघ को मारता है, वैसे ही (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अर्चन्) सत्कार करता हुआ (चित्) और शत्रु को (अवधीः) मारा कर ॥ ११ ॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सभाप्रबन्ध के होने से सुखपूर्वक प्रजा के मनुष्य अच्छे मार्ग में चलते-चलाते हैं, वैसे ही सूर्य के आकर्षण से सब भूगोल इधर-उधर चलते-फिरते हैं। जैसे सूर्य मेघ को वर्षा के सब प्रजा का पालन करता है, वैसे सभा और सभापति आदि को भी चाहिये कि शत्रु और अन्याय का नाश करके विद्या और न्याय के प्रचार से प्रजा का पालन करें ॥ ११ ॥
विषय
मही - कम्पन
पदार्थ
१. हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (यत्) = जब (वज्रिन्) = हाथ में क्रियाशीलता वज्र को लिये हुए (मरुत्वान्) = प्राणोंवाला, प्राणसाधना करनेवाला बनकर तू (ओजसा) = ओजस्विता से (वृत्रम्) = ज्ञान पर आवरणभूत इस वासनारूप वृत्र को (अवधीः) = नष्ट कर देता है तब (तव मन्यवे) = तेरे क्रोध के लिए, अर्थात् तेरे क्रोध करने पर (इमे मही चित्) = ये महान् द्युलोक व पृथिवीलोक भी (भियसा) = भय से (वेपेते) = काँप उठते हैं । २. जितेन्द्रिय पुरुष में इतनी शक्ति आ जाती है कि वह द्यावापृथिवी को हिलाने में समर्थ हो जाता है । यह शक्ति [ओजसा] उसमें जितेन्द्रिय बनने से उत्पन्न होती है [इन्द्र] । इस जितेन्द्रियता के लिए वह क्रियाशील बनता है [वज्रिन्] और प्राणसाधना को अपनाता है [मरुत्वान्] । ३. यह सब हो तभी पाता है जबकि यह इन्द्र (अर्चन अनु स्वराज्यम्) = आत्मशासन की भावना का समादर करता है । संयम ही सब शक्तियों व उन्नतियों का मूल है । संयमी पुरुष आत्मविजय के कारण संसार का भी विजय करता है ।
भावार्थ
भावार्थ - क्रियाशीलता व प्राणसाधना से वासना को विनष्ट करके हम स्वराट् बनें और अपने अन्दर उस शक्ति को उत्पन्न करें जो सारे संसार को प्रभावित करनेवाली हो ।
विषय
पक्षान्तर में ईश्वरोपासना और परमेश्वर के स्वराट् रूप की अर्चना ।
भावार्थ
हे ( इन्द्र ) राजन् ! ऐश्वर्यवन् ! ( यत् ) जब तू (स्वराज्यम् अनु अर्चन्) अपनी राज्य शक्ति को बराबर बढ़ाता हुआ (मरुत्वान्) वायु के वेग से युक्त विद्युत् के समान शत्रु के मारने में समर्थ वीर सेना गण का स्वामी होकर ( ओजसा ) पराक्रम से ( वृत्रं ) मेघ के समान उमड़ते हुए शत्रु को ( अवधीः ) विनाश करता है तब जिस प्रकार ( मही ) बड़ी विशाल आकाश और पृथिवी दोनों, सूर्य या विद्युत् के प्रकोप से कांपते हैं उसी प्रकार (तत्र मन्यवे) तेरे क्रोध के ( भियसा ) भय से ( इमे ) ये दोनों राजवर्ग और प्रजावर्ग अथवा स्वसेना और पर: सेना दोनों ( वेपेते ) कांपें ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गोतमो राहूगण ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः—१, ११ निचृदास्तारपंक्तिः । ५, ६, ९, १०, १३, १४ विराट् पंक्तिः । २—४, ७,१२, १५ भुरिग् बृहती । ८, १६ बृहती ॥ षोडशर्चं सूक्तम् ॥
विषय
विषय (भाषा)- फिर वह सभा आदि का अध्यक्ष कैसा है, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥
सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः
सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे वज्रिन् इन्द्रः सभाद्यध्यक्ष ! यत् यस्य तव ओजसा यथा सूर्यस्य आकर्षणेन ताडनेन च इमे मही वेपेते तत् तुल्यस्य तव भियसा मन्यवे बलेन शत्रवः अनु कम्पन्ते यथा मरुत्वान् इन्द्रः वृत्रं हन्ति तथा स्वराज्यम् अनु अर्चन् अरीन् चित् अवधीः ॥११॥
पदार्थ
पदार्थः- हे (वज्रिन्) सुशिक्षितशस्त्रविद्यायुक्त= सुशिक्षित और शस्त्र विद्या के ज्ञाता, (इन्द्रः) सभाद्यध्यक्षराजन्=सभा आदि के अध्यक्ष राजन्! (यत्) यस्य=जिस, (तव)=तुम्हारी, (ओजसा) सेनाबलेन= सेना के बल से, (यथा)=जैसे, (सूर्यस्य)= सूर्य के, (आकर्षणेन)= आकर्षण से, (च)=और, (ताडनेन) =ताडना से, (इमे) वक्ष्यमाणे= कहे गये, (मही) महत्यौ द्यावापृथिव्यौ= महान् द्यावा और पृथिवी के, (वेपेते) चलतः= गति करने से, (तत्)=उसके, (तुल्यस्य)=समान, (तव) =तुम्हारे, (भियसा) भयेन=भय से, (मन्यवे) न्यायव्यवस्थापालनहेतवे= न्याय व्यवस्था के पालन करानेवाले के माध्यम, (बलेन) =बल से, (शत्रवः)=शत्रु लोग, (अनु) =एक-एक करके, (कम्पन्ते)=कांपते हैं, (यथा)=जैसे, (मरुत्वान्) प्रशस्तवायुमान्= प्रशस्त वायु वाला, (इन्द्रः)= इन्द्र, (वृत्रम्) मेघमिवारीन् =बादल के समान शत्रुओं को, (हन्ति)=छिन्न-भिन्न कर देता है, (तथा)=वैसे ही, (स्वराज्यम्) =अपने राज्य की, (अनु)= भलाई के लिये, (अर्चन्)=उत्तम कार्य करते हुए, (अरीन्)=शत्रुओं को, (चित्) अपि=भी, (अवधीः) हिन्धि=मार दीजिये ॥११॥
महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद
महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सभा के द्वारा प्रबन्ध के करने से प्रजाजन उत्तम मार्ग से सुखपूर्वक आवागमन करते हैं, जैसे मेघ को छिन्न-भिन्न करके वर्षा के जल से प्रजा का पालन करता है, वैसे ही सभा और सभा के अध्यक्ष आदि शत्रु के अन्याय का नाश करके विद्या से और न्याय के प्रचार से प्रजा की रक्षा करें ॥११॥
पदार्थान्वयः(म.द.स.)
पदार्थान्वयः(म.द.स हे (वज्रिन्) सुशिक्षित और शस्त्र विद्या के ज्ञाता, (इन्द्रः) सभा आदि के अध्यक्ष राजन्! (यत्) जिस (तव) तुम्हारी (ओजसा) सेना के बल से, (यथा) जैसे (सूर्यस्य) सूर्य के (आकर्षणेन) आकर्षण (च) और [ताप की] (ताडनेन) ताडना से, (इमे) ये कहे गये (मही) महान् द्यावा और पृथिवी के (वेपेते) गति करने से, (तत्) उसके (तुल्यस्य) समान (तव) तुम्हारे (भियसा) भय से (मन्यवे) न्याय व्यवस्था के पालन करानेवाले के माध्यम (बलेन) बल से, (शत्रवः) शत्रु (अनु) एक-एक करके (कम्पन्ते) कांपते हैं। (यथा) जैसे (मरुत्वान्) प्रशस्त वायु वाला (इन्द्रः) इन्द्र, (वृत्रम्) बादल के समान शत्रुओं को (हन्ति) छिन्न-भिन्न कर देता है, (तथा) वैसे ही (स्वराज्यम्) अपने राज्य की (अनु) भलाई के लिये, (अर्चन्) उत्तम कार्य करते हुए (अरीन्) शत्रुओं को (चित्) भी (अवधीः) मार दीजिये ॥११॥
संस्कृत भाग
इ॒मे । चि॒त् । तव॑ । म॒न्यवे॑ । वेपे॑ते॒ इति॑ । भि॒यसा॑ । म॒ही । यत् । इ॒न्द्र॒ । व॒ज्रि॒न् । ओज॑सा । वृ॒त्रम् । म॒रुत्वान् । अव॑धीः । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सभाप्रबन्धेन प्रजाः सुखेन सन्मार्गेण गच्छन्त्यागच्छन्ति तथैव सूर्यस्याकर्षणेन सर्वे भूगोला गच्छन्त्यागच्छन्ति यथा सूर्यो मेघं हत्वा जलेन प्रजाः पालयति, तथैव सभासभाद्यध्यक्षौ शत्र्वन्यायौ हत्वा विद्यान्यायप्रचारेण प्रजाः पालयेताम् ॥११॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सभेची व्यवस्था किंवा प्रबंध असल्यास माणसे सुखपूर्वक सन्मार्गाने चालतात व चालवितात. तसेच सूर्याच्या आकर्षणाने सर्व भूगोल इकडेतिकडे भ्रमण करतात. जसा सूर्य मेघाद्वारे वृष्टी करून सर्व प्रजेचे पालन करतो तसे सभा व सभापती इत्यादींनीही शत्रू व अन्यायाचा नाश करून विद्या व न्यायाचा प्रचार करून प्रजेचे पालन करावे. ॥ ११ ॥
इंग्लिश (3)
Meaning
Indra, lord of law and the thunderbolt of strength and power, both these, the great earth and the vast environment, feel stirred with awe in reverence to your spirit and passion when you, O lord of stormy troops, with your valour and blazing brilliance, attack and destroy Vrtra, demon of darkness and want, to defend and maintain the sanctity and glory of the freedom and sovereignty of the republic.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
How is Indra is taught further in the eleventh Mantra.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O great Indra ( President or King ) well-versed in the handling of arms, of whose power and awe, the enemies remain in fear and try to pacify thy wrath just as these two vast worlds, the earth and the heaven, are kept in motion by the heat and force of gravitation of the sun, so do thou, like the sun, shattering the cloud, accept the sovereign authority and certainly put down thy adversary.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
(मन्यवे) न्यायव्यवस्थापालनहेतवे । = For the observance of the law and justice.
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
As by the proper arrangements made by the Assembly or the council, the subjects tread upon the right path with delight, in the same manner, by the attraction of the sun, all worlds revolve. As the sun shatters the cloud and protects the people, in the same manner, the President of the Assembly and the council etc. should shatter the foes and injustice and preserve the subjects with the propagation of knowledge and justice.
Subject of the mantra
Then, what kind of President of the Assembly et cetera are?This subject has been preached in this mantra.
Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-
He=O! (vajrin) =well-educated and expert in weaponry, (indraḥ)= the President of the Assembly etc., (yat) =which,(tava)=your, (ojasā) by the power of army, (yathā) =like, (sūryasya) =of Sun, (ākarṣaṇena) =attraction, (ca) =and, [tāpa kī]=of heat, (tāḍanena) =by striking, (ime) =these said, (mahī) of the great earth and space, (vepete) =by movement, (tat) =its,(tulyasya) =like, (tava) =your, (bhiyasā) =by fear, (manyave)= through the enforcer of justice system, (balena)= by force, (śatravaḥ) =enemy, (anu) =one by one, (kampante)= tremble, (yathā) =like, (marutvān)=having excellent air, (indraḥ)=Indra, (vṛtram)= enemies like a cloud, (hanti)=scatters, (tathā)=in the same way, (svarājyam) =of own kingdom, (anu) =for welfare, (arcan)=by doing good work, (arīn) =to enemy, (cit) bhī (avadhīḥ)= kill.
English Translation (K.K.V.)
O well-educated and expert in weaponry, the President of the Assembly etc.! Just as by the power of your army, and by the attraction of the Sun and by the striking of its heat; by the movement of the great earth and space, the enemies tremble one by one out of fear by the power of the enforcer of justice. Just as Indra, with his excellent air, scatters his enemies like a cloud, in the same way, do good work for the welfare of your kingdom and kill your enemies as well.
TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand
Just as by making arrangements by the Assembly, the people travel happily on the best path, just as by dispersing the clouds, rain water takes care of the people, in the same way, the Assembly and the President of the Assembly etc. destroy the injustice of the enemy through knowledge and protect the people by promoting justice.
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