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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 80 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 80/ मन्त्र 14
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - इन्द्र: छन्दः - विराट्पङ्क्ति स्वरः - पञ्चमः

    अ॒भि॒ष्ट॒ने ते॑ अद्रिवो॒ यत्स्था जग॑च्च रेजते। त्वष्टा॑ चि॒त्तव॑ म॒न्यव॒ इन्द्र॑ वेवि॒ज्यते॑ भि॒यार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ॒भि॒ऽस्त॒ने । ते॒ । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । यत् । स्थाः । जग॑त् । च॒ । रे॒ज॒ते॒ । त्वष्टा॑ । चि॒त् । तव॑ । म॒न्यवे॑ । इ॒न्द्र॒ । वे॒वि॒ज्यते॑ । भि॒या । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभिष्टने ते अद्रिवो यत्स्था जगच्च रेजते। त्वष्टा चित्तव मन्यव इन्द्र वेविज्यते भियार्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अभिऽस्तने। ते। अद्रिऽवः। यत्। स्थाः। जगत्। च। रेजते। त्वष्टा। चित्। तव। मन्यवे। इन्द्र। वेविज्यते। भिया। अर्चन्। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 80; मन्त्र » 14
    अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 31; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तस्य किं कृत्यमस्तीत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    हे अद्रिव इन्द्र ! यद्यदा ते तवाभिष्टने स्था जगच्च रेजते त्वष्टा सेनापतिस्तव मन्यवे ते भिया चिद्वेविज्यते तदा भवान् स्वराज्यमन्वर्चन् सुखी भवेत् ॥ १४ ॥

    पदार्थः

    (अभिष्टने) अभितः शब्दयुक्ते व्यवहारे (ते) तव (अद्रिवः) बहुमेघयुक्तसूर्य्यवत्सेनायुक्त (यत्) यदा (स्थाः) स्थावरम् (जगत्) जङ्गमम् (च) (रेजते) कम्पते (त्वष्टा) छेत्ता (चित्) अपि (तव) (मन्यवे) क्रोधाय (इन्द्र) राज्यधारक सभाद्यध्यक्ष (वेविज्यते) अत्यन्तं बिभेति सम्यक् (भिया) भयेन (अर्चन्) (अनु) (स्वराज्यम्) ॥ १४ ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा सूर्यस्य योगेन प्राणिनः स्वस्वकर्मसु प्रवर्त्तन्ते, भूगोला यथानुक्रमं भ्रमन्ति, तथैव सभया प्रशासितस्य राज्यस्य योगेन सर्वे प्राणिनो धर्मेण स्वस्वव्यवहारे वर्त्तित्वा सन्मार्गेऽनुचलन्तीति वेद्यम् ॥ १४ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर इस सभाध्यक्ष को क्या करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

    पदार्थ

    हे (अद्रिवः) बहुमेघयुक्त सूर्य्य के समान (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त सभाध्यक्ष (यत्) जब (ते) आपके (अभिष्टने) सर्वथा उत्तम न्याययुक्त व्यवहार में (स्थाः) स्थावर (जगच्च) और जङ्गम (रेजते) कम्पायमान होता है तथा जो (त्वष्टा) शत्रुच्छेदक सेनापति है (तव) उसके (मन्यवे) क्रोध के लिये (भिया चित्) भय से भी (वेविज्यते) उद्विग्न होता है, तब आप (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) सत्कार करते हुए सुखी हो सकते हैं ॥ १४ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिए कि जैसे सूर्य के योग से प्राणधारी अपने-अपने कर्म में वर्त्तते और सब भूगोल अपनी-अपनी कक्षा में यथावत् भ्रमण करते हैं, वैसे ही सभा से प्रशासन किये राज्य के संयोग से सब मनुष्यादि प्राणी धर्म के साथ अपने-अपने व्यवहार में वर्त्त के सन्मार्ग में अनुकूलता से गमनागमन करते हैं ॥ १४ ॥

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    विषय

    वह अद्भुत शक्ति

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय वीर ! वृत्र [वासना] के विजेता पुरुष ! हे (अद्रिवः) = वज्रवन् - निरन्तर क्रियाशील पुरुष ! (ते अभिष्टने) = तेरा सिंहनाद होने पर (यत्) = जो (स्थाः) = स्थावर है (जगत् च) = और जो जंगम है वह सब (रेजते) = काँप उठता है, अर्थात् तेरी शक्ति के सामने इस चराचर ब्रह्माण्ड की शक्ति भी तुच्छ होती है । २. और तो और (त्वष्टा चित्) = इस संसार का निर्माता भी (तव मन्यवे) = तेरे ऋद्ध होने पर (भिया वेविज्यते) = भय से काँप उठता है । प्रभु ने क्या काँपना ! हाँ , यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है और इस वर्णन से जितेन्द्रिय पुरुष की अद्भुत शक्ति का शंसन हो रहा है । महाभारत में वेदव्यास ने इसका चित्रण विश्वामित्र के नव - संसार के निर्माण के संकल्प की कथा में किया है । विश्वामित्र नया संसार ही बनाने के लिए उद्यत हो उठता है, तब जैसे - तैसे देवता उसे शान्त करते हैं । हाँ, यह सब होता तभी है जबकि (अर्चन् अनु स्वराज्यम ) = यह आत्मशासन की भावना का समादर करता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - जितेन्द्रिय पुरुष की शक्ति अद्भुत है । वह चराचर ब्रह्माण्ड को कम्पित करने में सक्षम है ।

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    विषय

    पक्षान्तर में ईश्वरोपासना और परमेश्वर के स्वराट् रूप की अर्चना ।

    भावार्थ

    हे ( अद्रिवः ) अखण्ड बल वीर्य के स्वामिन् ! प्रबल सेनापते ! हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् राजन् ! ( यत् ) जब ( ते ) तेरे ( अभिस्तने ) गर्जना और आज्ञा में (स्थाः) स्थावर और (जगत् च) जंगम सभी (रेजते) कांपता है । ( तव मन्यवे ) तेरे क्रोध और ज्ञान सामर्थ्य के ( भिया ) भय से ( त्वष्टा चित् ) सूर्य के समान तेजस्वी तथा छेदन भेदन करने वाला सैन्य गण और शिल्पीगण भी [ वेविज्यते ] भय से कांपा करे । तू इस प्रकार (स्वराज्यम् अनु अर्चन्) अपनी राजसत्ता की निरन्तर वृद्धि करता रह ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो राहूगण ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः—१, ११ निचृदास्तारपंक्तिः । ५, ६, ९, १०, १३, १४ विराट् पंक्तिः । २—४, ७,१२, १५ भुरिग् बृहती । ८, १६ बृहती ॥ षोडशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर इस सभा के अध्यक्ष को क्या करना चाहिये, यह विषय इस मन्त्र में कहा है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे अद्रिव इन्द्र ! यत् यदा ते तव अभिष्टने स्था जगत् च रेजते त्वष्टा सेनापतिः तव मन्यवे ते भिया चित् वेविज्यते तदा भवान् स्वराज्यम् अनु अर्चन् सुखी भवेत् ॥१४॥

    पदार्थ

    पदार्थः- हे (अद्रिवः) बहुमेघयुक्तसूर्य्यवत्सेनायुक्त=बहुत बादलोंवाले और सूर्य के समान से सेनावाले, (इन्द्र) राज्यधारक सभाद्यध्यक्ष=राज्य को धारण करनेवाले सभा आदि के अध्यक्ष! (यत्) यदा=जब, (ते) तव=तुम्हारे, (अभिष्टने) अभितः शब्दयुक्ते व्यवहारे=हर ओर से शब्द करनेवाले व्यवहारों से, (स्थाः) स्थावरम्= स्थिर, (च)=और, (जगत्) जङ्गमम्=गति करनेवाला जगत्, (रेजते) कम्पते=कांपता है, (त्वष्टा) छेत्ता=[शत्रुओं का] छेदन करनेवाला, (सेनापतिः)= सेनापति, (तव) =तुम्हारे, (मन्यवे) क्रोधाय=[शत्रुओं के विरुद्ध] क्रोध के लिये, (ते)=तुम्हारे, (भिया) भयेन=भय से, (चित्) अपि=भी, (वेविज्यते) अत्यन्तं बिभेति सम्यक्= अत्यन्त भयभीत होता है, (तदा)=तब, (भवान्)=आप, (स्वराज्यम्)=अपने राज्य की, (अनु)=भलाई के लिये, (अर्चन्)=उत्तम कार्य करते हुए, (सुखी)= सुखी, (भवेत्)=होओ ॥१४॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य के योग से प्राणधारी अपने-अपने कर्म में प्रवृत्त होते हैं और जगत् जैसे विधिपूर्वक कक्षाओं में भ्रमण करते हैं, वैसे ही सभा से प्रशासन किये राज्य के योग से सब मनुष्य आदि प्राणी अपने-अपने व्यवहार में व्यवहार करके सन्मार्ग में साथ-साथ चलते हैं, मनुष्यों को ऐसा जानना चाहिए ॥१४॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (अद्रिवः) बहुत बादलोंवाले और सूर्य के समान से सेनावाले, (इन्द्र) राज्य को धारण करनेवाले सभा आदि के अध्यक्ष! (यत्) जब (ते) तुम्हारे (अभिष्टने) हर ओर से शब्द करनेवाले व्यवहारों से, (स्थाः) स्थिर (च) और (जगत्) गति करनेवाला जगत् (रेजते) कांपता है, (त्वष्टा) शत्रुओं का] छेदन करनेवाला (सेनापतिः) सेनापति (तव) तुम्हारे (मन्यवे) [शत्रुओं के विरुद्ध] क्रोध के लिये, (ते) तुम्हारे (भिया) भय से (चित्) भी (वेविज्यते) शत्रु अत्यन्त भयभीत होता है, (तदा) तब (भवान्) आप (स्वराज्यम्) अपने राज्य की (अनु) भलाई के लिये (अर्चन्) उत्तम कार्य करते हुए (सुखी) सुखी (भवेत्) होओ ॥१४॥

    संस्कृत भाग

    अ॒भि॒ऽस्त॒ने । ते॒ । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । यत् । स्थाः । जग॑त् । च॒ । रे॒ज॒ते॒ । त्वष्टा॑ । चि॒त् । तव॑ । म॒न्यवे॑ । इ॒न्द्र॒ । वे॒वि॒ज्यते॑ । भि॒या । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥ विषयः- पुनस्तस्य किं कृत्यमस्तीत्युपदिश्यते ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा सूर्यस्य योगेन प्राणिनः स्वस्वकर्मसु प्रवर्त्तन्ते, भूगोला यथानुक्रमं भ्रमन्ति, तथैव सभया प्रशासितस्य राज्यस्य योगेन सर्वे प्राणिनो धर्मेण स्वस्वव्यवहारे वर्त्तित्वा सन्मार्गेऽनुचलन्तीति वेद्यम् ॥१४॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. माणसांनी हे जाणावे की सूर्याच्या योगाने जसे प्राणी आपापले कर्म करतात व भूगोल आपापल्या कक्षेत भ्रमण करतात, तसे सभेने प्रशासित केलेल्या राज्याद्वारे सर्व माणसे धर्माने आपापल्या व्यवहारात राहून सन्मार्गाने चालतात. ॥ १४ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Indra, lord ruler of the republic, dedicated to the freedom of the people and sovereignty of the state, when in the resounding fame and reverberations of your power, everything non-moving and everybody moving shines with brilliance, and the artists and technologists, Tvashtas of the nation, creators and makers of beautiful things, move with awe in homage to your spirit and passion for freedom and governance, then your dedication to the republic would be complete and wholly fulfilled.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    What is the duty of Indra (President or King) is taught further in the 14th Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O great King or President, whose realm is adorned with innumerable cloud-like mountains, when at thy awfully just dealing, all objects both movable and immovable tremble and even thy own mighty commander of army who never fails to put down thine enemies in battle becomes agitated with fear at thy indignation, do thou, then honour thy sovereign authority and feel happy

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (अभिष्टने) अभित: शब्दयुक्ते व्यवहारे । = In battles where there is noise all around. (त्वष्टा ) छेता = Destroyer or or piercer of enemies- Commander of the army.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As by the presence of the sun all creatures engage themselves in their activities and the worlds revolve according to their due course, in the same manner, men should know that by the proper administration conducted by the Assembly or the council, they follow the right path.

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    Subject of the mantra

    Then, what should the President of this Assembly do?This subject is mentioned in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (adrivaḥ) the one with many clouds and an army like the Sun, (indra) =the one who possesses the kingdom and is the President of the Assembly etc., (yat) =when, (te) =your, (abhiṣṭane) =your vocal actions on all sides, (sthāḥ) =static, (ca) =and, (jagat) =dynamic world, (rejate) =trembles, (tvaṣṭā)= who pierces, [śatruoṃ kā]=of enemies, (senāpatiḥ) =Commander, (tava) =your, (manyave)=for anger, [śatruoṃ ke viruddha]=against enemies, (te) =your, (bhiyā) =out fear, (cit) =also, (vevijyate)=the enemy becomes very afraid, (tadā) =then, (bhavān) =you, (svarājyam) =of own kingdom, (anu) =for welfare, (arcan) =doing good work, (sukhī) =happy, (bhavet) =be.

    English Translation (K.K.V.)

    O the one with many clouds and an army like the Sun, the one who possesses the kingdom and is the President of the Assembly etc.! When the world, which is static and dynamic, trembles because of your vocal actions on all sides and when the commander who pierces the enemies, who is extremely afraid of you out of anger against the enemies, then you do great work for the welfare of your kingdom. Be happy while doing it.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is silent vocal simile as a figurative in this mantra. Just as the living beings are engaged in their respective activities due to the combination of the Sun and the world moves in its orbits in a systematic way, in the same way, due to the combination of the state administered by the Assembly, all the human beings etc. behave together in the right path. Humans should know this.

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