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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 80 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 80/ मन्त्र 4
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - इन्द्र: छन्दः - भुरिग्बृहती स्वरः - मध्यमः

    निरि॑न्द्र॒ भूम्या॒ अधि॑ वृ॒त्रं ज॑घन्थ॒ निर्दि॒वः। सृ॒जा म॒रुत्व॑ती॒रव॑ जी॒वध॑न्या इ॒मा अ॒पोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    निः । इ॒न्द्र॒ । भूम्याः॑ । अधि॑ । वृ॒त्रम् । ज॒घ॒न्थ॒ । निः । दि॒वः । सृ॒ज । म॒रुत्व॑तीः । अव॑ । जी॒वऽध॑न्याः । इ॒माः । अ॒पः । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    निरिन्द्र भूम्या अधि वृत्रं जघन्थ निर्दिवः। सृजा मरुत्वतीरव जीवधन्या इमा अपोऽर्चन्ननु स्वराज्यम् ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    निः। इन्द्र। भूम्याः। अधि। वृत्रम्। जघन्थ। निः। दिवः। सृज। मरुत्वतीः। अव। जीवऽधन्याः। इमाः। अपः। अर्चन्। अनु। स्वऽराज्यम् ॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 80; मन्त्र » 4
    अष्टक » 1; अध्याय » 5; वर्ग » 29; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥

    अन्वयः

    हे इन्द्र ! त्वं यथा सूर्य्यो वृत्रं हत्वा भूम्याऽधीमा जीवधन्या मरुत्त्वतीरपो निर्जघन्थ दिवोऽवसृजति तथा दुष्टाचारान् हत्वा धर्माचारं प्रचार्य स्वराज्यमन्वर्चन् राज्यं शाधि विविधं वस्तु सृज ॥ ४ ॥

    पदार्थः

    (निः) नितराम् (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रद (भूम्याः) पृथिव्याः। भूमिरिति पृथिवीनामसु पठितम्। (निघं०१.१) (अधि) उपरि (वृत्रम्) मेघम् (जघन्थ) हन्ति (निः) नित्यम् (दिवः) किरणान् (सृज) (मरुत्वतीः) मनुष्यादिप्रजासम्बन्धिनीः (अव) (जीवधन्याः) या जीवेषु धन्या धनाय हिताः (इमाः) प्रत्यक्षाः (अपः) जलानि (अर्चन्) सत्कुर्वन् (अनु) आनुकूल्ये (स्वराज्यम्) ॥ ४ ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यो राज्यं कर्त्तुमिच्छेत् स विद्याधर्मविनयान् प्रचार्य्य स्वयं धार्मिको भूत्वा प्रजासु पितृवद्वर्तेत ॥ ४ ॥

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    हिन्दी (4)

    विषय

    फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) परमैश्वर्य के देनेहारे ! तू जैसे सूर्य्य (वृत्रम्) मेघ का ताड़न कर (भूम्याः) पृथिवी के (अधि) ऊपर (इमाः) ये (जीवधन्याः) जीवों में धनादि की सिद्धि में हितकारक (मरुत्वतीः) मनुष्यादि प्रजा के व्यवहारों को सिद्ध करनेवाले (अपः) जलों को (निर्जघन्थ) नित्य पृथिवी को पहुँचाता है और (दिवः) प्रकाशों को प्रकट करता है, वैसे अधर्मियों को दण्ड दे धर्माचार का प्रकाश कर (स्वराज्यम्) अपने राज्य का (अन्वर्चन्) यथायोग्य सत्कार करता हुआ प्रजाशासन किया कर और नाना प्रकार के सुखों को (निरवसृज) निरन्तर सिद्ध कर ॥ ४ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राज्य करने की इच्छा करे, वह विद्या, धर्म और विशेष नीति का प्रचार करके आप धर्म्मात्मा होकर, सब प्रजाओं में पिता के समान वर्त्ते ॥ ४ ॥

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    विषय

    प्राणशक्ति व उत्तम जीवन

    पदार्थ

    १. शरीर में वृत्र ‘इन्द्रियों, मन व बुद्धि’ में अपना अधिष्ठान बनाता है । (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष से प्रभु कहते हैं कि हे (इन्द्र) = शत्रुओं का संहार करनेवाले ! तू (भूम्याः अधि) = इस शरीररूप पृथिवी में से (वृत्रम्) = इस वासना को (निर्जघन्थ) = निकाल भगा । इन्द्रियों में जो इसके दुर्ग बने हुए हैं, उन्हें तू नष्ट कर डाल और इसी प्रकार (दिवः) = मस्तिष्करूप द्युलोक से भी (निः) = [जघन्थ] इसे निकाल ही दे । इसके इन सब दुर्गों का भंग हो जाए और यह तेरे जीवन में से बहिष्कृत हो जाए । २. वृत्र को नष्ट करके तू (इमाः अपः) = इन रेतः कणों को (अवसृज) = वासना के पञ्जे से मुक्त कर ले । ये रेतः कण ही तो (मरुत्वतीः) = प्राणशक्तिवाले हैं अथवा प्राणायाम द्वारा इन्हीं की ऊर्ध्वगति की जाती है और (जीवधन्याः) = ऊर्ध्वगतिवाले होकर ये हमारे जीवन को धन्य बनाया करते हैं । ३. ऐसा तू कर तभी सकेगा जब (अर्चन अनु स्वराज्यम्) = तू आत्मशासन की भावना का आदर करनेवाला होगा । संयम से ही यह सब साध्य होता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - हम शरीर व मस्तिष्क में से वासना को भगा दें, तभी सुरक्षित हुआ - हुआ सोम हमारी प्राणशक्ति को बढ़ाएगा और हमारे जीवनों को धन्य करनेवाला होगा ।

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    विषय

    स्वराज्य की वृद्धि, और उनके उपायों का उपदेश ।

    भावार्थ

    हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् राजन् ! तू ( स्वराज्यम् अनु अर्चन् ) नित्यप्रति अपने ही राज्य या राजशासन के महत्व को बढ़ाता हुआ, ( वृत्रं ) मेघ को जिस प्रकार सूर्य ( निर्जघन्थ ) अपने किरणों से छिन्न भिन्न करता है। और ( मरुत्वतीः ) वायुओं में विद्यमान ( जीवधन्याः ) जीवों को तृप्त करने वाला ( इमाः अपः ) इन जलधाराओं को ( दिवः अव ) आकाश से नीचे गिराता है उसी प्रकार हे ( इन्द्र ) ऐश्वर्यवन् राजन् ! तू भी ( भूम्या अधि) भूमि पर अधिकार करने के लिये ( वृत्रं निर् जघन्थ ) अपने बढ़ते हुए शत्रु को मार । और ( मरुत्वतीः ) मनुष्य आदि प्रजाओं को या वीर भटों की बनी ( इमाः ) इन ( जीवधन्याः ) जीवन को ही धन के समान जानने वाली ( अपः ) प्रजाओं को ( अव सृज ) अपने अधीन कर ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गोतमो राहूगण ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः—१, ११ निचृदास्तारपंक्तिः । ५, ६, ९, १०, १३, १४ विराट् पंक्तिः । २—४, ७,१२, १५ भुरिग् बृहती । ८, १६ बृहती ॥ षोडशर्चं सूक्तम् ॥

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    विषय

    विषय (भाषा)- फिर वह राजा कैसा है, इस विषय का उपदेश इस मन्त्र में किया है ॥

    सन्धिविच्छेदसहितोऽन्वयः

    सन्धिच्छेदसहितोऽन्वयः- हे इन्द्रः ! त्वं यथा सूर्य्यः वृत्रं हत्वा भूम्याः अधि इमाः जीवधन्याः मरुत्त्वतीः अपः निः जघन्थ {निः} दिवः अवसृजति तथा दुष्टाचारान् हत्वा धर्माचारं प्रचार्य स्वराज्यम् अनु अर्चन् राज्यं शाधि विविधं वस्तु सृज ॥४॥

    पदार्थ

    पदार्थः- हे (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रद=परम ऐश्वर्य के देनेवाले राजन् ! (त्वम्)=तुम, (यथा)=जैसे, (सूर्य्यः)=सूर्य, (वृत्रम्) मेघम्=बादल को, (हत्वा)=छिन्न-भिन्न करके, (भूम्याः) पृथिव्याः=भूमि के, (अधि) उपरि= ऊपर, (इमाः) प्रत्यक्षाः= प्रत्यक्ष, (जीवधन्याः) या जीवेषु धन्या धनाय हिताः=जो जीवों में धन्य हैं, उनके धन की उपयोगिता लिये, (मरुत्वतीः) मनुष्यादिप्रजासम्बन्धिनीः=मनुष्य आदि सन्तानों से सम्बन्धित (अपः) जलानि=जल हैं, [उनसे] (निः) नितराम्=अच्छे प्रकार से, [सूर्यकी] (दिवः) किरणान्=किरणों से, (अवसृजति)=निर्माण करता है, (तथा)=वैसे ही, (दुष्टाचारान्)=दुष्ट व्यवहार से, (हत्वा)=मार करके, (धर्माचारम्)=धर्म के व्यवहार का, (प्रचार्य)=प्रचार करके, (स्वराज्यम्)= अपने राज्य की, (अनु) आनुकूल्ये=भलाई के लिये, (अर्चन्) सत्कुर्वन्=उत्तम कार्य करते हुए, (राज्यम्)= राज्य का, (शाधि)=शासन करो और (विविधम्) सूर्य विविध, (वस्तु)= वस्तुओं का, (सृज)=निर्माण करो ॥४॥

    महर्षिकृत भावार्थ का भाषानुवाद

    महर्षिकृत भावार्थ का अनुवादक-कृत भाषानुवाद- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राज्य का प्रशासन करने की इच्छा करे, वह विद्या, धर्म और विनय से प्रचार करके, स्वयं धार्मिक होकर, प्रजाओं में पिता के समान व्यवहार करे ॥४॥

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)

    पदार्थान्वयः(म.द.स.)- हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्य के देनेवाले राजन् ! (यथा) जैसे (सूर्य्यः) सूर्य (वृत्रम्) बादल को (हत्वा) छिन्न-भिन्न करके (भूम्याः) भूमि के (अधि) ऊपर (इमाः) प्रत्यक्ष (जीवधन्याः) जीवन को ही धन के समान माननेवाली (मरुत्वतीः) मनुष्य आदि सन्तानों से सम्बन्धित (अपः) जल हैं। [उनसे] (निः) अच्छे प्रकार से [सूर्यकी] (दिवः) किरणों से (अवसृजति) निर्माण करता है, (तथा) वैसे ही (दुष्टाचारान्) दुष्ट व्यवहार से (हत्वा) मार करके, (धर्माचारम्) धर्म के व्यवहार का (प्रचार्य) प्रचार करके, (स्वराज्यम्) अपने राज्य की (अनु) भलाई के लिये, (अर्चन्) उत्तम कार्य करते हुए, (राज्यम्) राज्य का (शाधि) शासन करो और विविध (वस्तु) वस्तुओं का (सृज) निर्माण करो ॥४॥

    संस्कृत भाग

    निः । इ॒न्द्र॒ । भूम्याः॑ । अधि॑ । वृ॒त्रम् । ज॒घ॒न्थ॒ । निः । दि॒वः । सृ॒ज । म॒रुत्व॑तीः । अव॑ । जी॒वऽध॑न्याः । इ॒माः । अ॒पः । अर्च॑न् । अनु॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् ॥ विषयः- पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ॥ भावार्थः(महर्षिकृतः)- अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यो राज्यं कर्त्तुमिच्छेत् स विद्याधर्मविनयान् प्रचार्य्य स्वयं धार्मिको भूत्वा प्रजासु पितृवद्वर्तेत॥४॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. ज्याला राज्य करण्याची इच्छा असेल त्याने विद्या, धर्म व विशेषनीतीचा प्रचार करून स्वतः धार्मिक बनून सर्व प्रजेशी पित्याप्रमाणे वागावे. ॥ ४ ॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Indra, all-ruling creative power of enlighten ment and freedom, eliminate evil, darkness and ignorance from the face of the earth, bring the light of knowledge and vision of spirit from heaven and, reverentially advancing the republic of human freedom and self-governance, create and release these life-giving and energising waters to vitalise the nation of humanity to the speed and vibrancy of the winds.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How is Indra is taught further in the fourth Mantra.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O Indra (Powerful king) even as the sun shatters the clouds, diffuses his light-giving rays and lets flow waters that help human beings and other creatures to live in peace, so do thou destroy the wicked, give wide encouragement to righteous conduct and thus making thy administration acceptable and respected, rule over it, so that thou and thy subjects may ever enjoy all happiness.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (दिव:) किरणान् = Rays. (मरुत्वतीः) मनुष्यादि प्रजा सम्बन्धिनी: = Beneficial to human beings and other creatures.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    He who desires to rule should preach or diffuse knowledge, righteousness and humility and being himself a righteous person should behave towards his subjects as their father.

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    Subject of the mantra

    Then, what kind of that king is, this subject has been preached in this mantra.

    Etymology and English translation based on Anvaya (logical connection of words) of Maharshi Dayanad Saraswati (M.D.S)-

    He=O! (indra)= king who bestows supreme opulence, (yathā) =like, (sūryyaḥ) =Sun, (vṛtram) =of cloud, (hatvā) =by disintegrating, (bhūmyāḥ) =of earth, (adhi) =above, (imāḥ) =present, (jīvadhanyāḥ) =one who considers life as wealth, (marutvatīḥ) =related to human beings, (apaḥ) =waters are, [unase]=by them, (niḥ) =in a good way, [sūryakī]=of Sun, (divaḥ) =by rays, (avasṛjati) =prduces,, (tathā) =similarly, (duṣṭācārān) =by wicked behaviour, (hatvā) =by killing, (dharmācāram) =behaviour of righteousness, (pracārya)=by propagating, (svarājyam) =of own kingdom, (anu) =for welfare, (arcan)= by doing good work, (rājyam) =of kingdom, (śādhi) =rule and, vividha (vastu) =of goods, (sṛja) =produce.

    English Translation (K.K.V.)

    O king who bestows supreme opulence! Just as the Sun disintegrates the clouds and considers the direct life above the land as wealth, the waters are related to human beings and their children. For the benefit of those who are blessed among the present living beings above the earth,. builds them in a good way with the rays of the Sun, in the same way, by killing evil behaviour, by propagating righteous behaviour, by doing good work for the welfare of your kingdom, rule the kingdom and produce various things.

    TranslaTranslation of gist of the mantra by Maharshi Dayanandtion of gist of the mantra by Maharshi Dayanand

    There is silent vocal simile as a figurative in this mantra. One, who wishes to administer the state, should preach with knowledge, righteousness and modesty, be righteous himself and behave like a father among the subjects.

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