ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 101/ मन्त्र 7
ऋषिः - बुधः सौम्यः
देवता - विश्वे देवा ऋत्विजो वा
छन्दः - पादनिचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
प्री॒णी॒ताश्वा॑न्हि॒तं ज॑याथ स्वस्ति॒वाहं॒ रथ॒मित्कृ॑णुध्वम् । द्रोणा॑हावमव॒तमश्म॑चक्र॒मंस॑त्रकोशं सिञ्चता नृ॒पाण॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठप्री॒णी॒त । अश्वा॑न् । हि॒तम् । ज॒या॒थ॒ । स्व॒स्ति॒ऽवाह॑म् । रथ॑म् । इत् । कृ॒णु॒ध्व॒म् । द्रोण॑ऽआहावम् । अ॒व॒तम् । अश्म॑ऽचक्रम् । अंस॑त्रऽकोशम् । सि॒ञ्च॒त॒ । नृ॒ऽपान॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं रथमित्कृणुध्वम् । द्रोणाहावमवतमश्मचक्रमंसत्रकोशं सिञ्चता नृपाणम् ॥
स्वर रहित पद पाठप्रीणीत । अश्वान् । हितम् । जयाथ । स्वस्तिऽवाहम् । रथम् । इत् । कृणुध्वम् । द्रोणऽआहावम् । अवतम् । अश्मऽचक्रम् । अंसत्रऽकोशम् । सिञ्चत । नृऽपानम् ॥ १०.१०१.७
ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 101; मन्त्र » 7
अष्टक » 8; अध्याय » 5; वर्ग » 19; मन्त्र » 1
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अष्टक » 8; अध्याय » 5; वर्ग » 19; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
पदार्थ
(अश्वान्) इस प्रकार घास आदि की उत्पत्ति हो जाने पर घोड़े आदि को (प्रीणीत) तृप्त करो (हितं जयाथ) हित अन्न को प्राप्त करो (स्वस्तिवाहम्) इस प्रकार घास अन्न से समृद्ध होते हुए कल्याणवाहक (रथम्-इत्) रथ को अवश्य (कृणुध्वम्) करो-बनाओ (द्रोणाहावम्) काष्ठमय जलपात्रवाले (अश्मचक्रम्) व्याप्त चक्रवाले-घूमते हुए चक्र से युक्त (अवतम्) कुएँ को (अंसत्रम्) गति करते हुए यन्त्रों के रक्षक (कोशम्) गुप्त घर को बनाओ (नृपानम्) कृषि के नेताओं-कृषकजनों की रक्षा जिससे हो, ऐसे खेत को (सिञ्चत) सींचो-प्रवृद्ध करो ॥७॥
भावार्थ
घास आदि से घोड़े आदि पशुओं को तृप्त करना-काष्ठमय पात्रवाले चक्र या व्याप्त गतिवाले चक्र से युक्त कुएँ को बनाना, गतिमय चक्रयन्त्रों से गुप्त स्थान को बनाना खेत सींचना चाहिये ॥७॥
विषय
स्वस्मिवाट् रथ
पदार्थ
[१] (अश्वान् प्रीणीत) = इन्द्रियाश्वों को प्रीणित करो। नैर्मल्य के द्वारा इन्हें प्रसन्नतायुक्त करो । (हितं जयाथ) = इन प्रसन्न इन्द्रियों के द्वारा हितकर वस्तु का विजय करो। (रथम्) = इस शरीर - रथ को (इत्) = निश्चय से (स्वस्तिवाहम्) = कल्याण की ओर ले जानेवाला (कृणुध्वम्) = करो। इन्द्रियाँ निर्मल व सबल हों, शरीर स्वस्थ हो । स्वस्थ इन्द्रियों व स्वस्थ शरीर से हम हित व कल्याण को सिद्ध करें। [२] हे उपासको ! तुम उस प्रभु को (सिञ्चता) = अपने हृदयक्षेत्र में सिक्त करो जो प्रभु (द्रोणाहावम्) = प्रेरणा [द्रु गतौ] देनेवाली पुकारवाले हैं, जिनके नामों का स्मरण हमें अपने कर्त्तव्यों का स्मरण कराता है । (अवतम्) = जो रक्षण करनेवाले हैं। वस्तुतः निरन्तर कर्त्तव्यों का स्मरण कराते हुए वे प्रभु हमारा रक्षण करते हैं । [२] (अश्मचक्रम्) = प्रभु स्मरण से हमारा यह शरीर चक्र पत्थर के समान दृढ़ बनता है। (अंसत्र कोशम्) = [अंसत्राणां कोशा] वे प्रभु कवचों के कोश हैं। अर्था प्रभु प्रत्येक प्राणी के लिए कवच बनते हैं और उसे रक्षित करनेवाले होते हैं। (नृपाणम्) = इस प्रकार वे प्रभु नरों के रक्षक हैं, आगे बढ़ने की वृत्तिवाले पुरुष प्रभु से रक्षणीय होते हैं। आलसियों को प्रभु-रक्षण नहीं प्राप्त होता ।
भावार्थ
भावार्थ- हम इन्द्रियों को शक्तिशाली बनाएँ, शरीर-रथ को कल्याण के मार्ग पर ले चलें । प्रभु को हृदयक्षेत्र में सिक्त करने का प्रयत्न करें।
विषय
अश्व-रथादि निर्माण तथा उत्तम सुदृढ़ कूप आदि बनाने का उपदेश। पक्षान्तर में—इन्द्रियजय, ईश्वरोपासना और आत्म-साधना का उपदेश।
भावार्थ
(अश्वान् प्रीणीत) हे विद्वान् पुरुषो ! अश्वों को, देह में, इन्द्रियों को तृप्त, प्रसन्न, सन्तुष्ट, हृष्ट-पुष्ट रक्खो। (हितं जयाथ) अपना हित कारक अन्न प्राप्त करा। (स्वस्ति-वाहं रथम्) सुखपूर्वक दूर तक लेजाने वाले उत्तम अश्व, वृषभादि से युक्त रथ को (इत् कृणुध्वम्) अवश्य बनाओ, वा अपने (रथं) रमण साधन देह को (स्वस्ति-वाहं कृणुध्वम्) सुखदायक कल्याण, कर्म फल प्राप्त करने वाला बनाओ। हे मनुष्यो ! आप लोग (नृपाणं) मनुष्यों का पालन करने वाले, (अंसत्रं-कोशम्) कवच के समान कोष या आवरण को धारण करने वाले, (अश्म-चक्रम्) पत्थर के घेरे वाले,वा सदा गतिशील दृढ़ चक्र से युक्त, (द्रोण-आहावम्) काष्ठ के बने जलपान पात्र से युक्त (अवतम्) कूप को प्राप्त कर (सिञ्चत) उससे खेत आदि को सींचो। (२) उसी प्रकार अध्यात्म में (नृ-पाणम्) सबप्राणों के रक्षक, (द्रोण-आहावम्) रसयुक्त स्तुति वाले, (अश्म-चक्रम्) भोक्ता या व्यापक कर्म साधनों वाले, कवचवत् पञ्च कोशों को धारण करने वाले आत्मा को (सिञ्चत) प्राप्त कर उससे रस प्राप्त करो। उसके आनन्द रस से क्षेत्रवत् देह को युक्त करो।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिर्बुधः सौम्यः॥ देवता—विश्वेदेवा ऋत्विजो वा॥ छन्दः– १, ११ निचृत् त्रिष्टुप्। २, ८ त्रिष्टुप्। ३, १० विराट् त्रिष्टुप्। ७ पादनिचृत् त्रिष्टुप्। ४, ६ गायत्री। ५ बृहती। ९ विराड् जगती। १२ निचृज्जगती॥ द्वादशर्चं सूक्तम्॥
संस्कृत (1)
पदार्थः
(अश्वान् प्रीणीत) एवं घासादीनामुत्पत्तौ सत्यामश्वादीन् तर्पयत (हितं जयाथ) हितकरमन्नं लभध्वम् (स्वस्तिवाहं रथम्-इत्-कृणुध्वम्) एवं यवसान्नसमृद्धाः सन्तः कल्याणवाहकं रथमपि कुरुत (द्रोणाहावम्-अवतम्-अश्मचक्रम्) काष्ठमयं जलपात्रवन्तं तथा व्याप्तचक्रं भ्रमच्चक्रवन्तं कूपम् (अंसत्र-कोशम्) “अंसान् गत्यादीन् रक्षतस्तौ” [ऋ० ४।३४।९ दयानन्दः] रक्षति यस्मिन् तथाभूतं कोशगृहं (नृपानम्) नॄणां नराणां कृषिनेतॄणां रक्षणस्थानञ्च तथाभूतं क्षेत्रं (सिञ्चत) जलं दत्त्वा सम्पन्नं कुरुत-प्रवर्धयत ॥७॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Keep the horses well fed. Realise your common interests. Design, make and maintain the chariot that brings you comfort, peace, prosperity and well being. Protect and maintain the big water vessel. Maintain the rain cycle and keep the supply line on by drinking water tanks and wells for human consumption and irrigation.
मराठी (1)
भावार्थ
घोडे इत्यादी पशूंना तृणाद्वारे तृप्त करणे, गतिमान चक्राच्या काष्ठमय पात्राने युक्त विहिरी बनविणे, तसेच गतिमान चक्रयंत्रानी गुप्त स्थान बनवून शेत सिंचित केले पाहिजे. ॥७॥
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