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ऋग्वेद मण्डल - 10 के सूक्त 39 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 10/ सूक्त 39/ मन्त्र 11
    ऋषिः - घोषा काक्षीवती देवता - अश्विनौ छन्दः - निचृज्जगती स्वरः - निषादः

    न तं रा॑जानावदिते॒ कुत॑श्च॒न नांहो॑ अश्नोति दुरि॒तं नकि॑र्भ॒यम् । यम॑श्विना सुहवा रुद्रवर्तनी पुरोर॒थं कृ॑णु॒थः पत्न्या॑ स॒ह ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    न । तम् । रा॒जा॒नौ॒ । अ॒दि॒ते॒ । कुतः॑ । च॒न । न । अंहः॑ । अ॒श्नो॒ति॒ । दुः॒ऽइ॒तम् । नकिः॑ । भ॒यम् । यम् । अ॒श्वि॒ना॒ । सु॒ऽह॒वा॒ । रु॒द्र॒व॒र्त॒नी॒ इति॑ रुद्रऽवर्तनी । पु॒रः॒ऽर॒थम् । कृ॒णु॒थः । पत्न्या॑ । स॒ह ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    न तं राजानावदिते कुतश्चन नांहो अश्नोति दुरितं नकिर्भयम् । यमश्विना सुहवा रुद्रवर्तनी पुरोरथं कृणुथः पत्न्या सह ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    न । तम् । राजानौ । अदिते । कुतः । चन । न । अंहः । अश्नोति । दुःऽइतम् । नकिः । भयम् । यम् । अश्विना । सुऽहवा । रुद्रवर्तनी इति रुद्रऽवर्तनी । पुरःऽरथम् । कृणुथः । पत्न्या । सह ॥ १०.३९.११

    ऋग्वेद - मण्डल » 10; सूक्त » 39; मन्त्र » 11
    अष्टक » 7; अध्याय » 8; वर्ग » 17; मन्त्र » 1
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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (राजानौ-अश्विना) हे सर्वत्र राजमान अध्यापक-उपदेशको ! (अदिते) अखण्डनीय (सुहवा) शोभनकल्याणार्थ आमन्त्रण करने योग्य (रुद्रवर्तनी) क्रूर कष्ट को निवृत्त करनेवाले तुम दोनों (न) नहीं (तं कुतः-चन-न-अंहः-अश्नोति) उसको कहीं से भी पाप प्राप्त नहीं होता है (नकिः-दुरितं भयम्) न ही दुःखद भय प्राप्त होता है (यं पत्न्या सह) जिसको पत्नीसहित (पुरोरथं कृणुथः) बहुत जानेवाले गृहस्थ रथवाला बनाते हो ॥११॥

    भावार्थ

    उत्तम अध्यापक और उपदेशक अपने ज्ञान में अखण्डित सर्वत्र बुलाने योग्य-आमन्त्रण करने योग्य कष्ट को निवृत्त करनेवाले जिसे ज्ञान देते हैं, उसे कोई पाप और भय प्राप्त नहीं होता और पत्नी के साथ ऊँचे गृहस्थ रथ पर आरूढ़ होता है ॥११॥

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    विषय

    अंहः - दुरितम् - भयम्

    पदार्थ

    [१] हे (अश्विनो) = प्राणापानो! आप (राजानौ) = [राज् दीप्तौ] शरीर को दीप्त बनानेवाले हो । (अदिते) = [अदीतौ सा० ] इस शरीर को खण्डित न होने देनेवाले हो । (सुहवा) = उत्तमता से आराधना करने के योग्य हो और (रुद्रवर्तनी) = [रुद्र=driving away evil] सब बुराइयों को दूर करनेवाले मार्गवाले हो, आप पहुँचे और बुराई भागी । [२] हे प्राणापाणो! आप (यम्) = जिस भी व्यक्ति को (पल्या सह) = पत्नी के साथ (पुरोरथं कृणुथः) = अग्रगामी रथवाला करते हो, अर्थात् जिसे भी आप उन्नतिपथ पर आगे ले चलते हो (तम्) = उस पुरुष को (कुतश्चन) = कहीं से भी (अंह) = पाप व कष्ट न अनोति = नहीं प्राप्त होता । (न दुरितम्) = न किसी प्रकार का दुराचरण प्राप्त होता है (नकिः भयम्) = और ना ही भय प्राप्त होता है । [३] घर में पति-पत्नी दोनों ही प्राणसाधना करनेवाले हों तो उस घर में उन्नति ही उन्नति होती है। वहाँ पाप दुराचरण व किसी भय के लिये स्थान नहीं होता ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्राणसाधना से अंहः = दुरित- भय से सब भाग जाते हैं ।

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    विषय

    वे रथी सारथिवत् जिसको बड़ी पालक शक्ति सौंपे वह पाप से दूर रहे।

    भावार्थ

    हे (अश्विना) विद्यादि शुभ गुणों में व्याप्त, प्राण अपानवत् देह और राष्ट्र में व्याप्त एवं आशुगामी प्राणों के तुल्य यानों पर वश करने वाले रथी सारथिवत् जनो ! (सु-हवा) सुख देने वाले, शुभ नाम से पुकारने योग्य, सुगृहीत नाम वाले (रुद्र-वर्त्तनी) दुष्टों को रुलाने वा दुःखों को दूर करने वाले व्यवहारों वाले होकर (यम्) जिसको (पत्न्या सह) सब पालक शक्ति से सहित (पुरः-रथम्) अग्रगामी रथ वाला, वीर (कृणुथः) कर देते हो। हे (राजाना) राजा रानी, शुभगुणों से चमकने वालो ! हे (अदिते) माता पितावत् सूर्यवत् तेजस्वियो ! (तं) उसका (अंहः) पाप (कुतः चन) कहीं से भी (न अश्नोति) नहीं प्राप्त होता। (न दुरितं) न कोई दुष्ट कर्म उसको प्राप्त होता और (नकिः भयम्) न कोई भय उसे लगता है।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    घोषा काक्षीवती ऋषिः॥ अश्विनौ देवते॥ छन्द:–१,६,७,११,१३ निचृज्जगती २, ८, ९, १२, जगती। ३ विराड् जगती। ४, ५ पादनिचृज्जगती। १० आर्ची स्वराड् जगती १४ निचृत् त्रिष्टुप्। चतुर्दशर्चं सूक्तम्॥

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    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (राजानौ-अश्विना) हे सर्वत्र राजमानौ ! अध्यापकोपदेशकौ ! (अदिते) अखण्डनीयौ (सुहवा) शुभाय कल्याणाय ह्वातव्यौ (रुद्रवर्तनी) रुद्रवर्तनिर्ययोः-रुद्रं क्रूरं कष्टं वर्त्तयतो निवर्त्तयतो यौ तौ युवाम् (न) नहि (तं कुतः-चन न अंहः अश्नोति) तं जनं कुतोऽपि विघ्नो वा पापं वा नैव प्राप्नोति (नकिः-दुरितं भयम्) नैव दुःखदं भयं प्राप्नोति (यं पत्न्या सह) यं खलु पत्न्या सह (पुरोरथं कृणुथः) पुरोगन्तृगृहस्थरथवन्तं कुरुथः ॥११॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O brilliant, independent and inviolable twin divine powers, nothing from any where, no sin, no evil, no hate, no fear touches him whom, O Ashvins, easily invoked and approachable, moving by paths free from the pain and suffering of ailments, you join in wedlock and lead forth to a happy home.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    उत्तम अध्यापक व उपदेशक आपल्या ज्ञानात अखंडित असतात, सर्वत्र आमंत्रित करण्यायोग्य असून, कष्ट नाहीसे करणारे ज्ञान ज्याला देतात त्याला कोणते भय, शोक इत्यादी नसते. तो पत्नीबरोबर उच्च गृहस्थ रथावर आरूढ होतो. ॥११॥

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