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ऋग्वेद मण्डल - 2 के सूक्त 33 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 33/ मन्त्र 8
    ऋषिः - गृत्समदः शौनकः देवता - रुद्रः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    प्र ब॒भ्रवे॑ वृष॒भाय॑ श्विती॒चे म॒हो म॒हीं सु॑ष्टु॒तिमी॑रयामि। न॒म॒स्या क॑ल्मली॒किनं॒ नमो॑भिर्गृणी॒मसि॑ त्वे॒षं रु॒द्रस्य॒ नाम॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । ब॒भ्रवे॑ । वृ॒ष॒भाय॑ । श्वि॒ती॒चे । म॒हः । म॒हीम् । सु॒ऽस्तु॒तिम् । ई॒र॒या॒मि॒ । न॒म॒स्य । क॒ल्म॒ली॒किन॑म् । नमः॑ऽभिः । गृ॒णी॒मसि॑ । त्वे॒षम् । रु॒द्रस्य॑ । नाम॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र बभ्रवे वृषभाय श्वितीचे महो महीं सुष्टुतिमीरयामि। नमस्या कल्मलीकिनं नमोभिर्गृणीमसि त्वेषं रुद्रस्य नाम॥

    स्वर रहित पद पाठ

    प्र। बभ्रवे। वृषभाय। श्वितीचे। महः। महीम्। सुऽस्तुतिम्। ईरयामि। नमस्य। कल्मलीकिनम्। नमःऽभिः। गृणीमसि। त्वेषम्। रुद्रस्य। नाम॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 2; सूक्त » 33; मन्त्र » 8
    अष्टक » 2; अध्याय » 7; वर्ग » 17; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह।

    अन्वयः

    हे वैद्य यस्मै वृषभाय बभ्रवे महः श्वितीचे वैद्याय महीं सुष्टुतिं प्रेरयामि स त्वं मां नमस्य यस्य रुद्रस्य कल्मलीकिनं त्वेषं नामास्ति तं वयं नमोभिर्गृणीमसि ॥८॥

    पदार्थः

    (प्र) (बभ्रवे) धारकाय (वृषभाय) श्रेष्ठाय (श्वितीचे) यः श्वितिमावरणमञ्चति तस्मै (महः) महते (महीम्) महतीम् (सुष्टुतिम्) शोभनां स्तुतिम् (ईरयामि) प्रेरयामि (नमस्य) नम्रो भव। अत्र संहितायामिति दीर्घः (कल्मलीकिनम्) देदीप्यमानम्। कल्मलीकिनमिति ज्वलतोनाम। निघं० १। १७ (नमोभिः) नमस्कारैः (गृणीमसि) प्रशंसामः (त्वेषम्) प्रकाशमानम् (रुद्रस्य) सद्वैद्यस्य (नाम) ॥८॥

    भावार्थः

    विद्यार्थिनां योग्यताऽस्ति यो विद्या ग्राहयेत्तं सदा सत्कुर्युः, यस्य वैद्यकशास्त्रे प्रसिद्धिरस्ति तस्मादेव वैद्यकविद्याऽध्येतव्या ॥८॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषयको अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    हे वैद्य जिस (वृषभाय) श्रेष्ठ (बभ्रवे) धारण करनेवाले (महः) बड़े (श्वितीचे) आवरण को प्राप्त होते हुए वैद्य के लिये (महीम्) बड़ी (सुष्टुतिम्) सुन्दर स्तुति की (प्र,ईरयामि) प्रेरणा देता हूँ, सो आप मुझे (नमस्य) नमिये जिस (रुद्रस्य) अच्छे वैद्य का (कल्मलीकिनम्) देदीप्यमान (त्वेषम्) प्रकाशमान (नाम) नाम है उसकी हम लोग (नमोभिः) सत्कारों से (गृणीमसि) प्रशंसा करते हैं ॥८॥

    भावार्थ

    विद्यार्थियों की योग्यता है जो कि विद्या ग्रहण करावे, उसका सदा सत्कार करें, जिसकी वैद्यकशास्त्र में प्रसिद्धि है, उसी से वैद्यविद्या का अध्ययन करना चाहिये ॥८॥

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    विषय

    कल्मलीकी का उपासन

    पदार्थ

    १. (बभ्रवे) = सबका पोषण करनेवाले, (वृषभाय) = सब पर सुखों का वर्षण करनेवाले, (श्वितीचे) = [श्वैत्यमञ्चते] शुद्ध पवित्र जीवन प्राप्त करानेवाले प्रभु के लिए (महः महीम्) = महान् से = भी महान् (सुष्टुतिम्) = उत्तम स्तुति को प्र ईरयामि प्रेरित करता हूँ। इस प्रभु के स्तवन से मैं भी धारण करनेवाला-सुखों का वर्षण करनेवाला व पवित्र जीवनवाला बनता हूँ । २. 'कलयति अपगमयति मलं इति कल्मलीकं तेज: ' (कल्मलीकिनम्) = इस तेजस्वी प्रभु को (नमस्य) = तू पूजा करनेवाला हो। (नमोभिः) = नमस्कारों के साथ हम (रुद्रस्य) = उस दुःख द्रावक प्रभु (त्वेषम्) = दीप्त (नाम) = नाम का (गृणीमसि) = उच्चारण करते हैं। इस नामोच्चारण से प्रेरणा को प्राप्त होते हुए हम अपने जीवन में दीप्त बनने का प्रयत्न करते हैं ।

    भावार्थ

    भावार्थ - प्रभु का स्तवन हमें तेजस्वी-निर्मल व दीप्त बनाता है।

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    विषय

    रुद्र, दुष्ट-दमनकारी, पितावत् पालक राजा सेनापति और विद्वान् आचार्य, के कर्त्तव्य ।

    भावार्थ

    ( बभ्रवे ) सबको पालने पोषने वाले, ( वृषभाय ) मेघ के समान काम्य सुखों और ऐश्वर्यों की वृष्टि करने वाले, पापों के प्रतिबन्धक और सर्वश्रेष्ठ, बलवान् बलीवर्द के समान समस्त विश्वरूप रथ को सञ्चालन करने वाले, और संसार के उत्पादक वीजों को वपन करने वाले, सर्वनिषेचक ( श्वितीचे ) शुद्ध, स्वच्छ उज्ज्वल वेष, कान्ति रूप को धारने वाले, उस ( महः ) महान् परमेश्वर की मैं ( महीम् ) बड़ी भारी ( सुस्तुतिम् ) उत्तम स्तुति ( ईस्यामि ) करूं । हे विद्वान् पुरुष ! तू भी ( नमोभिः ) नमस्कारों से उस ( कल्मलीकिनं ) मलों को शोधने वाले, उज्ज्वल, अग्नि के समान परम पावन की ( नमस्य ) नमस्या, वन्दना कर । हम उसी ( रुद्रस्य ) दुःखहारी, दुष्टदलनकारी के ( त्वेषं ) अति तेजस्वी ( नाम ) स्वरूप की ( गृणीमसि ) स्तुति करते हैं । ( २ ) इसी प्रकार रोग-पीड़ा-हारी वैद्य भी ‘बभ्रु’ पुष्टिकारक, सर्वश्रेष्ठ, स्वच्छ, श्वेत वस्त्र धरने वाला हो, वह देह के मलों को दूर करने वाला हो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गृत्समद ऋषिः॥ रुद्रो देवता ॥ छन्दः– १, ५, ९, १३, १४, १५ निचृत् त्रिष्टुप् । ३, ५, ६, १०, ११ विराट् त्रिष्टुप् । ४,८ त्रिष्टुप् । २, ७ पङ्क्तिः । १२, भुरिक् पङ्क्तिः ॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जो विद्या देतो त्याचा विद्यार्थ्यांनी सत्कार करावा. ज्याची वैद्यकशास्त्रात प्रसिद्धी आहे त्याच्याद्वारे वैद्यक विद्येचे अध्ययन करावे. ॥ ८ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    I offer the highest of the high songs of praise in honour of Rudra, potent, generous and brilliant sustainer of health and life. Celebrate and serve this illustrious Rudra with salutations and presentations. We invoke and praise the name and splendour of Rudra with honour and reverence.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The theme of physicians takes a further step.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O physician ! I adore and approach to seek a nice efficient and mysterious Vaidya (physician and surgeon). So you accept my request. A good Vaidya has a glorious reputation and we all praise him with our regards.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The students should always respect their teachers. They should also seek studies from a reputed physician.

    Foot Notes

    (श्वितीचे ) यः शिवतिमावरणामञ्चति तस्मै। = For mysterious. (सुष्टुतिम् ) शोभनां स्तुतिम् । = Lovely praises. (ईरयामि ) प्रेरयामि । = Approach ( कल्मलीकिनम्) देदीप्यमानम् कल्मलीकिनमिति ज्वलतो नाम । = Shining. (गुणीमसि ) प्रशंसामः । ='We praise.

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