ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 33/ मन्त्र 9
ऋषिः - गृत्समदः शौनकः
देवता - रुद्रः
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
स्थि॒रेभि॒रङ्गैः॑ पुरु॒रूप॑ उ॒ग्रो ब॒भ्रुः शु॒क्रेभिः॑ पिपिशे॒ हिर॑ण्यैः। ईशा॑नाद॒स्य भुव॑नस्य॒ भूरे॒र्न वा उ॑ योषद्रु॒द्राद॑सु॒र्य॑म्॥
स्वर सहित पद पाठस्थि॒रेभिः॑ । अङ्गैः॑ । पु॒रु॒ऽरूपः॑ । उ॒ग्रः । ब॒भ्रुः । शु॒क्रेभिः॑ । पि॒पि॒शे॒ । हिर॑ण्यैः । ईशा॑नात् । अ॒स्य । भुव॑नस्य । भूरेः॑ । न । वै । ऊँ॒ इति॑ । यो॒ष॒त् । रु॒द्रात् । अ॒सु॒र्य॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
स्थिरेभिरङ्गैः पुरुरूप उग्रो बभ्रुः शुक्रेभिः पिपिशे हिरण्यैः। ईशानादस्य भुवनस्य भूरेर्न वा उ योषद्रुद्रादसुर्यम्॥
स्वर रहित पद पाठस्थिरेभिः। अङ्गैः। पुरुऽरूपः। उग्रः। बभ्रुः। शुक्रेभिः। पिपिशे। हिरण्यैः। ईशानात्। अस्य। भुवनस्य। भूरेः। न। वै। ऊँ इति। योषत्। रुद्रात्। असुर्यम्॥
ऋग्वेद - मण्डल » 2; सूक्त » 33; मन्त्र » 9
अष्टक » 2; अध्याय » 7; वर्ग » 17; मन्त्र » 4
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अष्टक » 2; अध्याय » 7; वर्ग » 17; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
अथ राजपुरुषविषयमाह।
अन्वयः
हे पुरुष पुरुरूप उग्रो बभ्रुर्भवान् स्थिरेभिरङ्गैः शुक्रेभिर्हरण्यैरीशानाद्रुदादस्य भुवनस्य भूरेर्न इव शत्रुदलं पिपिशे स उ वा असुर्य्यं योषत् ॥९॥
पदार्थः
(स्थिरेभिः) दृढैः (अङ्गैः) अवयवैः (पुरुरूपः) बहुरूपयुक्तः (उग्रः) क्रूरस्वभावः (बभ्रुः) धर्त्ता (शुक्रेभिः) शुद्धैर्वीर्य्यैः (पिपिशे) पिंश्यात् (हिरण्यैः) किरणैरिव तेजोभिः (ईशानात्) जगदीश्वरात् (अस्य) (भुवनस्य) सर्वाधिकरणस्य लोकस्य (भूरेः) बहुरूपस्य (न) इव (वै) निश्चये (उ) वितर्के (योषत्) वियोजयेः (रुद्रात्) जगदीश्वरात् (असुर्यम्) असुरस्य स्वम् ॥९॥
भावार्थः
अत्रोपमालङ्कारः। ये तीव्रमृदुस्वभावास्ते यथा जगदीश्वरनिर्मितानि भूम्यादीनि वस्तूनि दृढानि सुन्दराणि सन्ति तथा बलिष्ठैः प्रशस्यैः सेनाङ्गैः दुष्टानां विजयं कृत्वाऽसुरभावं निवारयेयुः ॥९॥
हिन्दी (3)
विषय
अब राजपुरुष के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदार्थ
हे पुरुष (पुरुरूपः) बहुत रूपों से युक्त (उग्रः) क्रूरस्वभावी (बभ्रुः) उत्तम व्यवहारों को धारण करनेवाले आप (स्थिरेभिः) दृढ़ (अङ्गैः) अवयवों से (शुक्रेभिः) शुद्ध वीर्य (हिरण्यैः) और किरणों के समान तेजों से (अस्य) इस (भुवनस्य) सर्वाधिकरण लोक के (भूरेः) बहुरूपिये के (न) जैसे-वैसे शत्रुदल को (पिपिशे) पीसते हुए (उ,वै) वही आप (असुर्यम्) असुर के स्वत्व का (योषत्) वियोग कीजिये ॥९॥
भावार्थ
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो तीव्र और मृदु स्वभाववाले हैं, वे जैसे जगदीश्वर के बनाये हुए भूमि आदि पदार्थ दृढ़ और सुन्दर हैं, वैसे बलिष्ठ प्रशंसनीय सेनाङ्गों से दुष्टों को विजय कर असुरभाव का निवारण करें ॥९॥
विषय
'स्वास्थ्य व ज्ञान' प्राप्ति द्वारा उपासन
पदार्थ
१. वह (पुरुरूपः) = एक रूप को अनेक रूप कर देनेवाला प्रभु 'एकं रूपं बहुधा यः करोति', (उग्रः) = अत्यन्त तेजस्वी है । (बभ्रुः) = वह सबका भरण करनेवाला है। वह प्रभु (स्थिरेभिः अङ्गैः) = दृढ़ अङ्गों से तथा (शुक्रेभिः) = दीप्त (हिरण्यैः) = ज्ञानज्योतियों से [हिरण्यं वै ज्योतिः] (पिपिशे) = [पिश अवयवे] अपना अङ्ग बनाया जाता है, अर्थात् शरीर के अङ्गों को स्वस्थ व दृढ़ बनाने से तथा ज्ञान प्राप्त करने से हम अपने जीवनों को प्रभु द्वारा अलंकृत करते हैं। प्रभु का सच्चा उपासक वही है जो कि [क] शरीर को स्वस्थ रखता है और [ख] स्वाध्याय द्वारा ज्ञान को बढ़ाता है। २. (अस्य) = इस (भुवनस्य ईशानात्) = भुवन के स्वामी, (भूरेः) = सबका भरण करनेवाले (रुद्रात्) = दुःखद्रावक प्रभु से (असुर्यम्) = शक्ति (न वा उ) = नहीं ही (योषत्) = पृथक् होती है वे प्रभु सदा शक्ति के आधार हैं। उपासक भी अपने जीवन को इस शक्ति से शक्तिसम्पन्न करता है।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु की उपासना स्वास्थ्य व ज्ञान की प्राप्ति से होती है। उपासक प्रभु की शक्ति से शक्तिसम्पन्न होता है ।
विषय
रुद्र, दुष्ट-दमनकारी, पितावत् पालक राजा सेनापति और विद्वान् आचार्य, के कर्त्तव्य ।
भावार्थ
जिस प्रकार ( उग्रः ) वेगवान् वायु (शुक्रः ) जलों और विद्युतों से युक्त होता है उस जगत् के स्वामी सर्वपोषक वायु से (असुर्यम्) मेघ का जल भी पृथक् नहीं रहता उसी प्रकार वह ( पुरुरूपः ) नाना रूपवान्, रुचिकर पदार्थों का स्वामी, ( उग्रः ) बलवान् भयानक, ( बभ्रुः ) उज्ज्वल रक्तवर्ण, सबका पालक पोषक होकर ( शुक्रेभिः ) शुद्ध तेजोजनक सुरक्षित वीर्यों से ब्रह्मचारी के समान, और ( शुक्रैः ) तेजो युक्त सूर्यों से और ( हिरण्यैः ) सुवर्ण के बने आभूषणों से सुसज्जित ऐश्वर्यवान् पुरुष के समान, ( हिरण्यैः ) हित और रमणीय रूपों से और ( स्थिरेभिः ) स्थायी (अङ्गैः) दृढ़ शरीरावयवों वा प्रकाशक गुणों से (पिपिशे) अंग प्रत्यंगों में सुशोभित बना है। ( अस्य भुवनस्य ) इस संसार के ( ईशानात् ) वशकर्त्ता महान् प्रभु, ( भूरेः ) सबके भरण पोषणकारी ( रुद्रात् ) दुष्टों के रुलाने और दुःखहारी उस परमेश्वर से ( असुर्य्यम् ) प्राणों में रमण करने वाला, परमानन्द स्वरूप तथा महान् विश्व सञ्चालन बल ( न वा उ योषात् ) कभी भी नहीं पृथक् ) होता । ( २ ) इसी प्रकार ( भुवनस्य ईशानात् ) ईश्वरवत् राजा से ( असुर्यम् ) असुरों के बधयोग्य बल कभी पृथक् न हो । ( ३ ) यह देहवान् आत्मा उत्तम वीर्यों तेजों और स्थिर अंगों से रूपवान् हो, इस ( भुवनस्य ) उत्पन्न देह का स्वामी प्राणों के बल से कभी वियुक्त न हो ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
गृत्समद ऋषिः॥ रुद्रो देवता ॥ छन्दः– १, ५, ९, १३, १४, १५ निचृत् त्रिष्टुप् । ३, ५, ६, १०, ११ विराट् त्रिष्टुप् । ४,८ त्रिष्टुप् । २, ७ पङ्क्तिः । १२, भुरिक् पङ्क्तिः ॥ पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात उपमालंकार आहे. जे तीव्र व मृदू स्वभावाचे आहेत. त्यांनी जगदीश्वर निर्मित भूमी इत्यादी पदार्थ जसे दृढ व सुंदर आहेत, तसे बलवान व प्रशंसनीय सेनेद्वारे दुष्टांवर विजय प्राप्त करून राक्षसी वृत्तीचे निवारण करावे. ॥ ९ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Rudra, divine physician, brilliant sustainer of versatile form and character, shines forth with his sturdy constitution and purest golden virtues. May his essential vitality and life-giving power never part from this Rudra, universal and versatile ruler of this world.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
The duties of the State officials are mentioned.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
As God severely punishes the sinners and wickeds, the same way O State officials! you should also punish your criminals with your supreme authority and power and various steps, because by nature you treat the various criminal sections with firm hands. Wiping out the enemies of the State who roam in varying positions, you should segregate the anti-social elements from the society.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
The State officials should firmly deal with antisocial elements and segregate them like God whose dealings are just and balanced.
Foot Notes
(स्थिरेभिः अङ्गैः ) दृढैः अवयवैः । = With firm hands. (पिपिशे) पिंश्यात् = Wipe out. (योषत् ) वियोजये: = Segregate. (रुद्रात्) जगदीक्ष्वरात् । = From the Almighty God. (असुर्यम्) असुरस्य स्वम्। = Anti-social sections.
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