ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 109/ मन्त्र 12
ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - स्वराडार्चीगायत्री
स्वरः - षड्जः
शिशुं॑ जज्ञा॒नं हरिं॑ मृजन्ति प॒वित्रे॒ सोमं॑ दे॒वेभ्य॒ इन्दु॑म् ॥
स्वर सहित पद पाठशिशु॑म् । ज॒ज्ञा॒नम् । हरि॑म् । मृ॒ज॒न्ति॒ । प॒वित्रे॑ । सोम॑म् । दे॒वेभ्यः॑ । इन्दु॑म् ॥
स्वर रहित मन्त्र
शिशुं जज्ञानं हरिं मृजन्ति पवित्रे सोमं देवेभ्य इन्दुम् ॥
स्वर रहित पद पाठशिशुम् । जज्ञानम् । हरिम् । मृजन्ति । पवित्रे । सोमम् । देवेभ्यः । इन्दुम् ॥ ९.१०९.१२
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 109; मन्त्र » 12
अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 21; मन्त्र » 2
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अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 21; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(शिशुम्) सर्वोपरि प्रशंसनीयं (जज्ञानं) सर्वत्र विद्यमानं (हरिं) सर्वदुःखहर्तारं (इन्दुम्) प्रकाशस्वरूपं (सोमम्) सौम्यस्वभावं परमात्मानं (पवित्रे) पवित्रान्तःकरणे (देवेभ्यः) दिव्यगुणप्राप्तये (मृजन्ति) ऋत्विग्जनाः साक्षात्कुर्वन्ति ॥१२॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(शिशुं) सर्वोपरि प्रशंसनीय (जज्ञानं) सर्वत्र विद्यमान (हरिं) सब दुःखों को हरण करनेवाला (इन्दुं) प्रकाशस्वरूप (सोमं) सौम्यस्वरूप परमात्मा को (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में (देवेभ्यः) दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिये (मृजन्ति) ऋत्विग् लोग साक्षात्कार करते हैं ॥१२॥
भावार्थ
जो ऋतु-ऋतु में यज्ञों द्वारा परमात्मा का यजन करते हैं, उनका नाम “ऋत्विग्” है अर्थात् इस विराट् स्वरूप की महिमा को देखकर जो आध्यात्मिक यज्ञादि द्वारा परमात्मा की उपासना करते हैं, उन्हीं को परमात्मा का साक्षात्कार होता है ॥१२॥
विषय
'शिशु - इन्दु'
पदार्थ
(शिशुम्) = बुद्धियों को तीव्र करनेवाले [शो तनूकरणे] (जज्ञानम्) = शक्तियों का प्रादुर्भाव करनेवाले (हरिम्) = सब रोग आदि का हरण करनेवाले इस सोम को (मृजन्ति) = साधक लोग शुद्ध करते हैं, इसे वासनाओं से मलिन नहीं होने देते । (पवित्रे) = पवित्र हृदय में, जिस हृदय क्षेत्र से वासनाओं के झाड़ी- झंकाड़ों को उखाड़ दिया गया है, उस हृदय में (सोमम्) = सोम को पवित्र करते हैं। यह सोम (देवेभ्यः) = देववृत्ति वाले पुरुषों के लिये (इन्दुम्) = शक्ति को देनेवाला होता है। यह सोमरक्षण ही वस्तुतः उन्हें देव बनाता है।
भावार्थ
भावार्थ- वासनाओं से मलिन न होने दिया जाता हुआ सोम बुद्धि को तीव्र करता है, शक्तियों को प्रादुर्भूत करता है, सब रोगकृमियों का अपहरण करता है, हमें देववृत्ति का बनाता है।
विषय
उसका ध्यानाभ्यास।
भावार्थ
वे (शिशुम् जज्ञानम्) उत्पन्न होते बालक के तुल्य, सर्वत्र देहों और हृदयों में व्यापक (सोमं) सर्वोत्पादक और (हरिं) सर्व दुःखहारी (इन्दुम्) तेजोमय प्रभु को (देवेभ्यः) सब मनुष्यों के कल्याण के लिये (पवित्रे) पवित्र हृदय में, पवित्र कार्य में (मृजन्ति) पवित्र (अभिषेक) करते, उसका ध्यान, अभ्यास और उत्तम स्तुति करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा ऋषयः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ७, ८, १०, १३, १४, १५, १७, १८ आर्ची भुरिग्गायत्री। २–६, ९, ११, १२, १९, २२ आर्ची स्वराड् गायत्री। २०, २१ आर्ची गायत्री। १६ पादनिचृद् गायत्री॥ द्वाविंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
They adore and exalt that Soma spirit of divine beauty, peace and glory in their pure heart core, the spirit that is creative and lovable, manifestive, saviour and inspirer, for the achievement of noble virtues worthy of the noble and generous people.
मराठी (1)
भावार्थ
जे ऋतु ऋतु मध्ये यज्ञाद्वारे परमेश्वराचे यजन करतात त्यांचे नाव ‘‘ऋत्विग्’’ आहे. अर्थात्, या विराटस्वरूपाचा महिमा पाहून जे आध्यात्मिक यज्ञ इत्यादीद्वारे परमेश्वराची उपासना करतात त्यांनाच परमेश्वराचा साक्षात्कार होतो. ॥१२॥
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