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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 109 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 109/ मन्त्र 21
    ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - आर्चीगायत्री स्वरः - षड्जः

    दे॒वेभ्य॑स्त्वा॒ वृथा॒ पाज॑से॒ऽपो वसा॑नं॒ हरिं॑ मृजन्ति ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    दे॒वेभ्यः॑ । त्वा॒ । वृथा॑ । पाज॑से । अ॒पः । वसा॑नम् । हरि॑म् । मृ॒ज॒न्ति॒ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    देवेभ्यस्त्वा वृथा पाजसेऽपो वसानं हरिं मृजन्ति ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    देवेभ्यः । त्वा । वृथा । पाजसे । अपः । वसानम् । हरिम् । मृजन्ति ॥ ९.१०९.२१

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 109; मन्त्र » 21
    अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 21; मन्त्र » 11
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (देवभ्यः) विद्वद्भ्यः (पाजसे) बलाय (अपः, वसानम्) प्रकृतिरूपव्याप्यवस्तुनि निवसन्तं (हरिं) अविद्याहर्त्तारं (त्वाम्) भवन्तं (वृथा) कर्मफलमनभिलष्य (मृजन्ति) उपासकाः साक्षात्कुर्वन्ति ॥२१॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (पाजसे) बल के लिये (अपः, वसानं) प्रकृतिरूप व्याप्य वस्तु में निवास करते हुए (हरिं) अविद्या का हरण करनेवाले (त्वां) तुमको (वृथा) कर्मफलों में अनासक्त होकर (मृजन्ति) उपासक लोग साक्षात्कार करते हैं ॥२१॥

    भावार्थ

    विद्याप्राप्ति द्वारा विद्वान् बनना, बलवान् होना तथा नानाविध ऐश्वर्य्य प्राप्त करके ऐश्वर्य्यशाली बनना परमात्मा की उपलब्धि के विना कदापि नहीं हो सकता, इसलिये ऐश्वर्य्य की इच्छा करनेवाले पुरुषों का कर्तव्य है कि वह ज्ञानद्वारा परमात्मा को उपलब्ध करें ॥२१॥

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    विषय

    देवेभ्यः-पाजसे

    पदार्थ

    (अपः वसानम्) = कर्मों को धारण करते हुए (हरिम्) = सब रोगों के (हर्ता त्वा) = तुझ को (मृजन्ति) = शुद्ध करते हैं । वस्तुतः कर्मों में लगे रहना ही सोम शुद्धि का साधन है। तुझे (देवेभ्यः) = दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिये तथा (वृथा पाजसे) = अनायास ही शक्ति को प्राप्त कराने के लिये शुद्ध करते हैं । शुद्ध हुआ हुआ सोम दिव्य गुणों व शक्ति का साधन बनता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ - कर्मों में व्यापृति के द्वारा सोम को शुद्ध करते हैं। यह दिव्य गुणों व शक्ति को प्राप्त करानेवाला होता है ।

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    विषय

    आत्मा का शोधन।

    भावार्थ

    वे साधक जन, हे सोम ! आत्मन् ! (अपः वसानम्) कर्मों के वासनामय लिङ्ग शरीर को धारण करने वाले (हरिम्) कान्तियुक्त (त्वा) तुझ को (देवेभ्यः पाजसे) देवों की बल-सिद्धि के लिये (मृजन्ति) परिष्कृत करते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा ऋषयः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ७, ८, १०, १३, १४, १५, १७, १८ आर्ची भुरिग्गायत्री। २–६, ९, ११, १२, १९, २२ आर्ची स्वराड् गायत्री। २०, २१ आर्ची गायत्री। १६ पादनिचृद् गायत्री॥ द्वाविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    They spontaneously exalt you, Soma, vibrant in Prakrti and in Karma, the saviour spirit, for the sages and for achievement of strength.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    विद्याप्राप्तीद्वारे विद्वान बनणे परमेश्वराच्या उपलब्धीशिवाय कधीच होऊ शकत नाही. त्यासाठी ऐश्वर्याची इच्छा करणाऱ्या पुरुषांचे कर्तव्य आहे की त्यांनी ज्ञानाद्वारे परमेश्वराला प्राप्त करावे. ॥२१॥

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