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ऋग्वेद मण्डल - 9 के सूक्त 109 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 109/ मन्त्र 19
    ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - स्वराडार्चीगायत्री स्वरः - षड्जः

    अस॑र्जि वा॒जी ति॒रः प॒वित्र॒मिन्द्रा॑य॒ सोम॑: स॒हस्र॑धारः ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अस॑र्जि । वा॒जी । ति॒रः । प॒वित्र॑म् । इन्द्रा॑य । सोमः॑ । स॒हस्र॑ऽधारः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    असर्जि वाजी तिरः पवित्रमिन्द्राय सोम: सहस्रधारः ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    असर्जि । वाजी । तिरः । पवित्रम् । इन्द्राय । सोमः । सहस्रऽधारः ॥ ९.१०९.१९

    ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 109; मन्त्र » 19
    अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 21; मन्त्र » 9
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    पदार्थः

    (सहस्रधारः) अनन्तसामर्थ्यवान् (सोमः) सर्वोत्पादकः परमात्मा (इन्द्राय) कर्मयोगिने (असर्जि) उपदिष्टः (वाजी) बलस्वरूपः सः (तिरः) अज्ञानं तिरस्कृत्य (पवित्रम्) अन्तःकरणं पवित्रयति ॥१९॥

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    हिन्दी (3)

    पदार्थ

    (सहस्रधारः) अनन्तसामर्थ्ययुक्त (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिये (असर्जि) उपदेश द्वारा प्राप्त होते हैं। (वाजी) वह बलस्वरूप परमात्मा (तिरः) अज्ञान को तिरस्कार करके (पवित्रं) अन्तःकरण को पवित्र बनाते हैं ॥१९॥

    भावार्थ

    परमपिता परमात्मा जो इस चराचर ब्रह्माण्ड का अधिपति है, वह अनन्त सामर्थ्ययुक्त है, उसके सामर्थ्य को उपदेशों द्वारा कर्मयोगी लाभ करता है ॥१९॥

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    विषय

    इन्द्राय सोमः सहस्त्राधारः

    पदार्थ

    (वाजी) = यह शक्तिशाली सोम (पवित्रम्) = पवित्र हृदय वाले पुरुष में (तिरः असर्जि) = तिरोहित रूप से सृष्ट किया जाता है। पवित्र हृदय पुरुष में यह रुधिर में व्याप्त रहता है । (सोमः) = यह सोम (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (सहस्त्रधारः) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाला है । शरीर के अन्दर शक्ति व ज्ञान का यह सोम ही स्रोत बनता है। हृदय में दिव्यता को भी यही उत्पन्न करता है ।

    भावार्थ

    भावार्थ-जितेन्द्रिय पुरुष से धारित यह सोम सहस्रों प्रकार से उसका धारण करता है ।

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    विषय

    साधना का मार्ग।

    भावार्थ

    (सहस्र-धारः) सहस्रों, शक्तियों वा दृढ़ वाणी वाला, (वाजी) ज्ञानी, बलवान्, (सोमः) विद्वान् पुरुष, (इन्द्राय) इन्द्र, प्रभु, परमेश्वर को प्राप्त करने के लिये (पवित्रम्) अपने अन्तःकरण को पवित्र करने के साधन-कलाप को (तिरः असर्जि) प्राप्त करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा ऋषयः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ७, ८, १०, १३, १४, १५, १७, १८ आर्ची भुरिग्गायत्री। २–६, ९, ११, १२, १९, २२ आर्ची स्वराड् गायत्री। २०, २१ आर्ची गायत्री। १६ पादनिचृद् गायत्री॥ द्वाविंशत्यृचं सूक्तम्॥

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    इंग्लिश (1)

    Meaning

    Soma, the vibrant victor spirit of divinity of infinite streams of joy, manifests through the purity of heart for the soul’s experience.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमपिता परमात्मा या चराचर ब्रह्मांडाचा अधिपती असून, अनंत सामर्थ्ययुक्त आहे. कर्मयोग्याला त्याच्या सामर्थ्याचा उपदेशाद्वारे लाभ होतो. ॥१९॥

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