ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 109/ मन्त्र 7
ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - भुरिगार्चीगायत्री
स्वरः - षड्जः
पव॑स्व सोम द्यु॒म्नी सु॑धा॒रो म॒हामवी॑ना॒मनु॑ पू॒र्व्यः ॥
स्वर सहित पद पाठपव॑स्व । सो॒म॒ । द्यु॒म्नी । सु॒ऽधा॒रः । म॒हाम् । अवी॑नाम् । अनु॑ । पू॒र्व्यः ॥
स्वर रहित मन्त्र
पवस्व सोम द्युम्नी सुधारो महामवीनामनु पूर्व्यः ॥
स्वर रहित पद पाठपवस्व । सोम । द्युम्नी । सुऽधारः । महाम् । अवीनाम् । अनु । पूर्व्यः ॥ ९.१०९.७
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 109; मन्त्र » 7
अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 20; मन्त्र » 7
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अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 20; मन्त्र » 7
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(सोम) हे परमात्मन् ! (द्युम्नी) यशःस्वरूपो भवान् (सुधारः) अमृतधारारूपः (महाम्, अवीनाम्) महतां रक्षकानां मध्ये (अनु, पूर्व्यः) मुख्योऽस्ति, इत्थम्भूतो भवान् (पवस्व) मां पुनातु ॥७॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(सोम) हे सोमगुणसम्पन्न तथा सर्वोत्पादक परमात्मन् ! आप (द्युम्नी) यशःस्वरूप (सुधारः) अमृतस्वरूप, तथा (महाम्, अवीनाम्) बड़े-बड़े रक्षकों में (अनु, पूर्व्यः) सबसे मुख्य रक्षक होने से आप (पवस्व) हमको पवित्र करें ॥७॥
भावार्थ
सर्वोपरि परमात्मा, जिसका यश महान्=सबसे बड़ा है, वही हमारा रक्षक और वही एकमात्र उपास्य देव है ॥७॥
विषय
द्युम्नी, सुधार:
पदार्थ
हे (सोम) = वीर्य ! तू (पवस्व) = हमें प्राप्त हो । (द्युम्नी) = तू ज्योतिर्मय है, हमारे मस्तिष्क को ज्ञानज्योति से भरनेवाला है। (सुधारः) = बहुत अच्छी प्रकार हमारा धारण करनेवाला है। (महाम्) = प्रभु पूजन की वृत्तिवालों का [मह पूजायाम्] तथा प्रभु पूजन द्वारा (अवीनाम् अनु) = रक्षकों का, सोम का रक्षण करने वालों का अनुकूलता से (पूर्व्यः) = पालन व पूरण करनेवाला है। शरीर को तू रोगाक्रान्त नहीं होने देता और मन में आसुरभावों को नहीं आने देता।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु पूजक इस सोम का रक्षण करते हैं। यह उन्हें ज्योति व धारणशक्ति प्राप्त कराता हुआ उनका पालन व पूरण करता है ।
विषय
विश्वकर्ता प्रभु।
भावार्थ
हे (सोम) सर्वोत्पादक, सर्वसञ्चालक (पूर्व्यः) तू सब से पूर्व एवं पूर्ण, अन्यों को पालन करने वाला, (द्युम्नी) तेजस्वी, यशस्वी, ऐश्वर्य का स्वामी (महान्) बड़े २ (अवीनाम्) सूर्यो को भी (सु-धारः) सुख से धारण करने वाला है। वह तू (पवस्व) हमें प्राप्त हो, (अनु-पवस्व) हमपर अनुग्रह कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा ऋषयः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ७, ८, १०, १३, १४, १५, १७, १८ आर्ची भुरिग्गायत्री। २–६, ९, ११, १२, १९, २२ आर्ची स्वराड् गायत्री। २०, २१ आर्ची गायत्री। १६ पादनिचृद् गायत्री॥ द्वाविंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
O Soma, you are the glory and the grandeur, holy stream and shower, the first and eternal of the greatest of the great, pray flow forth in presence, radiate and purify as ever before.
मराठी (1)
भावार्थ
सर्वश्रेष्ठ परमात्म्याचे महान यश सर्वत्र दिसून येते. तोच आमचा रक्षक व तोच एकमेव उपास्य देव आहे. ॥७॥
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