ऋग्वेद - मण्डल 9/ सूक्त 109/ मन्त्र 8
ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - भुरिगार्चीगायत्री
स्वरः - षड्जः
नृभि॑र्येमा॒नो ज॑ज्ञा॒नः पू॒तः क्षर॒द्विश्वा॑नि म॒न्द्रः स्व॒र्वित् ॥
स्वर सहित पद पाठनृऽभिः॑ । ये॒मा॒नः । ज॒ज्ञा॒नः । पू॒तः । क्षर॑त् । विश्वा॑नि । म॒न्द्रः । स्वः॒ऽवित् ॥
स्वर रहित मन्त्र
नृभिर्येमानो जज्ञानः पूतः क्षरद्विश्वानि मन्द्रः स्वर्वित् ॥
स्वर रहित पद पाठनृऽभिः । येमानः । जज्ञानः । पूतः । क्षरत् । विश्वानि । मन्द्रः । स्वःऽवित् ॥ ९.१०९.८
ऋग्वेद - मण्डल » 9; सूक्त » 109; मन्त्र » 8
अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 20; मन्त्र » 8
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अष्टक » 7; अध्याय » 5; वर्ग » 20; मन्त्र » 8
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
पदार्थः
(नृभिः, येमानः) संयमिभिः साक्षात्कृतः (जज्ञानः) सर्वत्राविर्भूतः (पूतः) पवित्रः (मन्द्रः) आनन्दस्वरूपः (स्वर्वित्) सर्वज्ञो भवान् (विश्वानि) सर्वाणि ऐश्वर्याणि (क्षरत्) मह्यं ददातु ॥८॥
हिन्दी (3)
पदार्थ
(नृभिः, येमानः) संयमी पुरुषों द्वारा साक्षात्कार किये हुए (जज्ञानः) सर्वत्र आविर्भाव को प्राप्त (पूतः) पवित्र (मन्द्रः) आनन्दस्वरूप (स्वर्वित्) सर्वज्ञ आप (विश्वानि) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य (क्षरत्) हमको देवें ॥८॥
भावार्थ
परमात्मा का साक्षात्कार संयमी पुरुषों को ही होता है अर्थात् जप, तप, संयम तथा अनुष्ठान द्वारा वही लोग साक्षात्कार करते हैं। वह परमात्मा अपनी दिव्य ज्योतियों से सर्वत्र आविर्भाव को प्राप्त और नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव है, वह पिता हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करे ॥८॥
विषय
मन्द्रः स्वर्वित्
पदार्थ
(नृभिः) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले मनुष्यों से (येमानः) = [नियम्यमानः] संयत किया जाता हुआ, (जज्ञान) = शक्तियों का प्रादुर्भाव करता हुआ, (पूतः) = यह पवित्र सोम (विश्वानि) = सब अन्नमय आदि कोशों के तेजस्वता आदि ऐश्वर्यों को (क्षरत्) = प्राप्त कराता है। यह सोम (मन्द्र) = सुख का जनक है तथा (स्वर्वित्) = उस स्वयं देदीप्यमान ज्योति प्रभु को प्राप्त करानेवाला है ।
भावार्थ
भावार्थ- उन्नतिपथ पर चलनेवाले मनुष्य ही सोम का संयम कर पाते हैं। यह संयत पवित्र सोम सब कोशों को ऐश्वर्य सम्पन्न बनाता है तथा उस ज्योतिर्मय प्रभु को प्राप्त कराता है।
विषय
सर्वसुखपद प्रभु।
भावार्थ
(नृभिः) मनुष्यों द्वारा (येमानः) यमनियमादि द्वारा साधित, (जज्ञानः) जाना गया वा प्रकट किया गया, (पूतः) पवित्र, (मन्द्रः) अति हर्षदायक, (स्व:-वित्) सर्वज्ञ, एवं प्रकाश और सुख का देने वाला है। वह प्रभु (विश्वानि क्षरत्) समस्त सुख प्रदान करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा ऋषयः॥ पवमानः सोमो देवता॥ छन्दः- १, ७, ८, १०, १३, १४, १५, १७, १८ आर्ची भुरिग्गायत्री। २–६, ९, ११, १२, १९, २२ आर्ची स्वराड् गायत्री। २०, २१ आर्ची गायत्री। १६ पादनिचृद् गायत्री॥ द्वाविंशत्यृचं सूक्तम्॥
इंग्लिश (1)
Meaning
Realised by leading lights, manifestive in the world and consciousness, presence consecrated in the heart core, blessing the world with divinity, ecstatic, the presence of heaven itself, that’s what you are, Soma.
मराठी (1)
भावार्थ
परमेश्वराचा साक्षात्कार संयमी पुरुषांनाच होतो. अर्थात्, जप, तप, संयम व अनुष्ठानाद्वारे ते साक्षात्कार करतात. तो परमात्मा आपल्या दिव्य ज्योतींनी प्रकट होतो. तो नित्य, शुद्ध, बुद्ध मुक्त स्वभाव आहे. त्या पित्याने आम्हाला सर्व प्रकारचे सुख प्रदान करावे. ॥८॥
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