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यजुर्वेद अध्याय - 16

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  • यजुर्वेद - अध्याय 16/ मन्त्र 19
    ऋषिः - कुत्स ऋषिः देवता - रुद्रो देवता छन्दः - विराडतिधृतिः स्वरः - षड्जः
    214

    नमो॒ रोहि॑ताय स्थ॒पत॑ये वृ॒क्षाणां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ भुव॒न्तये॑ वारिवस्कृ॒तायौष॑धीनां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ म॒न्त्रिणे॑ वाणि॒जाय॒ कक्षा॑णां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नम॑ऽउ॒च्चैर्घो॑षायाक्र॒न्दय॑ते पत्ती॒नां पत॑ये॒ नमः॑॥१९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नमः॑। रोहि॑ताय। स्थ॒पत॑ये। वृ॒क्षाणा॑म्। पत॑ये। नमः॑। नमः॑। भु॒व॒न्तये॑। वा॒रि॒व॒स्कृ॒ताय॑। वा॒रि॒वः॒कृ॒तायेति॑ वारिवःऽकृ॒ताय॑। ओष॑धीनाम्। पत॑ये। नमः॑। नमः॑। म॒न्त्रिणे॑। वा॒णि॒जाय॑। कक्षा॑णाम्। पत॑ये। नमः॑। नमः॑। उ॒च्चैर्घो॑षा॒येत्यु॒च्चैःऽघो॑षाय। आ॒क्र॒न्दय॑त॒ इत्या॑ऽक्र॒न्दय॑ते। प॒त्ती॒नाम्। पत॑ये। नमः॑ ॥१९ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नमो रोहिताय स्थपतये वृक्षाणाम्पतये नमो नमो भुवन्तये वारिवस्कृतायौषधीनाम्पतये नमो नमो मन्त्रिणे वाणिजाय कक्षाणाम्पतये नमो नमऽउच्चौर्घाषायाक्रन्दयते पत्तीनाम्पतये नमो नमः कृत्स्नायतया ॥


    स्वर रहित पद पाठ

    नमः। रोहिताय। स्थपतये। वृक्षाणाम्। पतये। नमः। नमः। भुवन्तये। वारिवस्कृताय। वारिवःकृतायेति वारिवःऽकृताय। ओषधीनाम्। पतये। नमः। नमः। मन्त्रिणे। वाणिजाय। कक्षाणाम्। पतये। नमः। नमः। उच्चैर्घोषायेत्युच्चैःऽघोषाय। आक्रन्दयत इत्याऽक्रन्दयते। पत्तीनाम्। पतये। नमः॥१९॥

    यजुर्वेद - अध्याय » 16; मन्त्र » 19
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह॥

    अन्वयः

    राजप्रजाजनै रोहिताय स्थपतये नमो वृक्षाणां पतये नमो भुवन्तये वारिवस्कृताय नम ओषधीनां पतये नमो मन्त्रिणे वाणिजाय नमः कक्षाणां पतये नम उच्चैर्घोषायाक्रन्दयते नमः पत्तीनां पतये नमश्च देयं कार्यं च॥१९॥

    पदार्थः

    (नमः) अन्नम् (रोहिताय) वृद्धिकराय (स्थपतये) तिष्ठन्ति यस्मिन्निति स्थं तस्य पतये पालकाय (वृक्षाणाम्) आम्रादीनाम् (पतये) स्वामिने (नमः) अन्नम् (नमः) अन्नम् (भुवन्तये) यो भवत्याचारवांस्तस्मै (वारिवस्कृताय) वारिवस्सेवनं कृतं येन तस्मै, अत्र स्वार्थेऽण्। (ओषधीनाम्) सोमादीनाम् (पतये) पालकाय वैद्याय (नमः) अन्नम् (नमः) सत्कारः (मन्त्रिणे) विचारकर्त्रे राजपुरुषाय (वाणिजाय) वणिजां व्यवहारेषु कुशलाय (कक्षाणाम्) गृहप्रान्तावयवेषु स्थितानाम् (पतये) रक्षकाय (नमः) अन्नम् (नमः) सत्कारः (उच्चैर्घोषाय) उच्चैर्घोषो यस्य तस्मै (आक्रन्दयते) यो दुष्टानाक्रन्दयतेरोदयति तस्मै न्यायाधीशाय (पत्तीनाम्) सेनाङ्गानाम् (पतये) रक्षकाय सेनाध्यक्षाय (नमः) सत्कारः॥१९॥

    भावार्थः

    मनुष्यैर्वनादिपालकेभ्योऽन्नादिकं दत्त्वा वृक्षौषध्याद्युन्नतिर्विधेया॥१९॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वही विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

    पदार्थ

    राजा और प्रजा के पुरुषों को चाहिये कि (रोहिताय) सुखों की वृद्धि के कर्त्ता और (स्थपतये) स्थानों के स्वामी रक्षक सेनापति के लिये (नमः) अन्न (वृक्षाणाम्) आम्रादि वृक्षों के (पतये) अधिष्ठाता को (नमः) अन्न (भुवन्तये) आचारवान् (वारिवस्कृताय) सेवन करने हारे भृत्य को (नमः) अन्न और (ओषधीनाम्) सोमलतादि ओषधियों के (पतये) रक्षक वैद्य को (नमः) अन्न देवें (मन्त्रिणे) विचार करने हारे राजमन्त्री और (वाणिजाय) वैश्यों के व्यवहार में कुशल पुरुष का (नमः) सत्कार करें (कक्षाणाम्) घरों में रहने वालों के (पतये) रक्षक को (नमः) अन्न और (उच्चैर्घोषाय) ऊंचे स्वर से बोलने तथा (आक्रन्दयते) दुष्टों को रुलाने वाले न्यायाधीश का (नमः) सत्कार और (पत्तीनाम्) सेना के अवयवों की (पतये) रक्षा करने हारे पुरुष का (नमः) सत्कार करें॥१९॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को चाहिये कि वन आदि के रक्षक मनुष्यों को अन्नादि पदार्थ देके वृक्षों और ओषधि आदि पदार्थों की उन्नति करें॥१९॥

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    विषय

    नाना रुद्र की नियुक्ति । उनका मानपद, अधिकार एवं नियन्त्रण ।

    भावार्थ

    ( रोहिताय नमः ) लाल वर्ण की पोशाक पहनने वाले अधिकारी को ( नमः ) शस्त्र बल प्राप्त हो । ( स्थपतये नमः ) स्थानों के पालक के लिये अथवा गृहादि निर्माण करने वाले तक्षक आदि शिल्पी लोगों को ( नमः ) शस्त्र प्राप्त हों। ( वृक्षाणां पतये नमः ) वृक्षों के पालक को शस्त्र प्राप्त हो । ( सुवन्तये नमः ) भूमियों के विस्तार करने वाले अर्थात् जंगल पहाड़ी आदि की भूमि को ठीक करके खेत बनाने वाले अथवा आचारवान् पुरुष को (नमः) शस्त्र और अन्न प्राप्त हो । ( वारिवस्कृताय नमः ) सेवा करने वाले अथवा धन ऐश्वर्य पैदा करने वाले पुरुष को ( नमः ) बल और आदर प्राप्त हो । ( मन्त्रिणे नमः ) राजा के मन्त्री को बल, आदर, और पद प्राप्त हो । ( वाणिजाय ) वणिग् व्यापार कुशल पुरुष को ( नमः ) अन्न, आदर, अधिकार प्राप्त हो । ( कक्षाणां पतये नमः ) वन के झाड़ी, लता, वास आदि के पालन करने वाले अधिकारी पुरुष को अथवा राज-गृह के प्रान्तों के रक्षक को ( नमः ) शस्त्र प्राप्त हों। ( उच्चैर्घोषाय ) राष्ट्रों में राजा की आज्ञा को ऊंचे स्वर से अघोषित करने वाले अधिकारी को, ( आक्रन्दयते ) शत्रुओं को रुलाने वाले या पाछे के आक्रमण से बचाने वाले को ( नमः ) बल आदि प्राप्त हो । ( पत्तीनां पतये नमः ) पैदल सेना के पति को ( नमः) शस्त्र बल प्राप्त हो ।

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    विषय

    शिल्पी कृषक-व्यापारी

    पदार्थ

    १. (रोहिताय) = [वृद्धिकराय - द०] राष्ट्र की सम्पत्ति को बढ़ानेवाले (स्थपतये) = गृहादि के बनानेवाले शिल्पियों का (नमः) = हम आदर करते हैं। इसी शिल्प की उन्नति के लिए वृक्षाणां पतये शिल्पोपयोगी काष्ठों को प्राप्त करानेवाले वृक्षों के रक्षकों का (नमः) = हम आदर करते हैं। घर आदि के निर्माण में लकड़ी का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, घर का सारा परिच्छद [Furniture] लगभग इसी पर आश्रित है। २. (भुवन्तये) = भुवं तनोति - कृषि योग्य भूमि का विस्तार करनेवाले के लिए भूमि जोतनेवाले के लिए, और इस प्रकार (वारिवस्कृताय) = [वरिवः = धनं वरिवस्कृदेव वारिवस्कृत: स्वार्थे अण्] धन के उत्पादक के लिए (नमः) = हम नमस्कार करते हैं। इस कृषि के द्वारा (ओषधीनां पतये) = विविध ओषधियों के रक्षक व स्वामी के लिए हम (नमः) = आदर देते हैं। यहाँ 'भुवन्तये' शब्द से साम्राज्य - वृद्धि की भावना लेना उपयुक्त नहीं। ३. अब शिल्प व कृषि से उत्पन्न पदार्थों को विचारपूर्वक मण्डियों (Market) में ले-जानेवाले (मन्त्रिणे) = विचारशील (वाणिजाय) = व्यापारी के लिए (नमः) = हम नमस्कार करते हैं और व्यापार की रक्षा के लिए (कक्षाणां पतये) [कक्ष = Gate] = सब द्वारों के रक्षकों का हम (नमः) = आदर करते हैं। इन द्वारों की रक्षा न होने पर तस्कर - व्यापार [Smuggling] बढ़ जाता है। इसके रोकने के लिए देश में प्रविष्ट होने के साधनभूत सब द्वारों की रक्षा होनी चाहिए। कक्ष शब्द का अर्थ 'वनलतागुल्मवीरुध आदि' भी है। इनसे नाना प्रकार की ओषधियों का निर्माण होता है, अतः इनके रक्षक का हम आदर करते हैं। ४. ' कक्ष' का अर्थ सामन्त [border] प्रदेश भी है। व्यापार की रक्षा के लिए और विशेषत: तस्कर व्यापार को रोकने के लिए सामन्त देश में नियुक्त सेना का जो सेनापति है जो (उच्चैः घोषाम्) = खूब गर्जती हुई आवाज़वाला है और (आक्रन्दयते) = युद्ध में शत्रुओं का सामना करनेवाला है तथा (पत्तीनां पतये) = जो पत्तियों का स्वामी है उसका हम आदर करते हैं। 'एको रथो गजश्चाश्वस्त्रयः पंच पदातयः । एष सेनाविशेषोऽयं पत्तिरित्यभिधीयते ' = एक रथ, एक हाथी, तीन घोड़े, पाँच प्यादे - ये मिलकर 'पत्ति' कहलाती है। सामन्त प्रदेश में स्थान-स्थान पर इस प्रकार की पत्ति की व्यवस्था होती है। इन पत्तियों के स्वामी को हम आदर देते हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ - राष्ट्र में 'शिल्पी, कृषक या व्यापारी' ये सब उचित आदर पाएँ तथा प्रान्तभाग पर रक्षा के लिए नियत पत्तियों के पति का भी हमें आदर करना है।

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    माणसांनी वनरक्षकांना अन्न वगैरे पदार्थ देऊन वृक्ष व औषध इत्यादी पदार्थ प्राप्त करावेत व त्यांची वृद्धी करावी.

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    विषय

    पुनश्च, पुढील मंत्रात तोच विषय (राजधर्म) प्रतिपादित आहे -

    शब्दार्थ

    शब्दार्थ - राजपुरुषांनी तसेच प्रजाजनांनी (रोहिताय) सुखांची वृद्धी करणार्‍या आणि (स्थपतये) स्थानांच्या रक्षकाला (दुर्ग, सैनिक छावणी आदी स्थानांच्या रक्षण करणार्‍या सेनापतीसाठी (नम:) अन्न-धान्यादीची व्यवस्था केली पाहिजे. तसेच (वृक्षाणाम्) ओम आदी वृक्षांच्या (पतये) धनिष्ठाय त्याला (उद्यान, बाग आदींचा रक्षकाला) (नम:) अन्न द्यावे. (भुवन्तये) आचरवान आणि (वारिवस्कृताय) सेवा करणार्‍या भृत्याला (नम:) अन्न द्यावे. (ओषधीनाम्) सोमलता आदी औषधींचे (पतवे) रक्षक असलेल्या वैद्याला (नम:) अन्न द्यावे (शासनाने तसेच प्रजेने दुर्गरक्षक सेनापती, वृक्षरक्षक, सेवक आणि वैद्य, त्यांच्यासाठी भोजन-व्यवस्था केली पाहिजे. याना आपल्या चरितार्थाची काळजी असता कामा नये) (मंत्रिणे) विचारशील व शुभ यंत्रणा देणार्‍या राजमंत्र्यांच्या आणि (वाणिजाय) वैश्यकर्मात कुशल असलेल्या व्यापार्‍यांचा (नम:) सत्कार केला पाहिजे. तसेच (पत्तीनाम्) सैन्याच्या विविधा विभागाच्या (पतमे) प्रमुखाचा (स्थल, जल, वायुसेना आदीच्या मुख्याधिकार्‍यांचा) (नम:) सत्कार अवश्य करावा. ॥19॥

    भावार्थ

    भावार्थ - मनुष्यांचे कर्तव्य आहे की त्यांनी वन आदी विभागांच्या रक्षकांना अन्न आदी आवश्यक वस्तू घ्याव्यात. अशा प्रकारे वृक्ष आणि औषधी आदी पदार्थांची वृद्धी करावी. ॥19॥

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    इंग्लिश (3)

    Meaning

    Let the officials and the people give food to the commander of the army, the enhancer of delights. Let them give food to the lord of trees. Let them give food to servants of good character. Let them give food to the physician, the guardian of medicinal herbs. Let them pay homage to the thoughtful minister, and the expert in trade. Let them give food to the protector of the householders. Homage to the shouting lord of justice who makes the wicked weep. Homage to the guardian of different parts of the army.

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    Meaning

    Salutations to Rudra, red-haired lover and promoter of art and architecture. All hail to the lord protector of trees. Salutations to the lord of the expanding world and creator of wealth. Salutations to the lord of herbs and medicine. Salutations to the thoughtful planner, and the powers of commerce and industry. Salutations to the lord of woods and plantations. Salutations to the mighty roar against the enemies of life. Salutations to the lord protector of the pedestrians, wayfarers and the foot-soldiers.

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    Translation

    Our homage be to the red-skinned mason. (1) To the lord of trees our homage bе. (2) Our homage be to the granter of riches, who spreads out this world. (3) To the lord of plants our homage be. (4) Our bomage be to the prudent merchant. (5) To the lord of bushes our homage be. (6) Our homage be to the loud roarer. (7) To the foot-soldiers lord, who makes his enemies weep, our homage be. (8)

    Notes

    Rohitaya, लोहिताय, red-skinned. Also, वृद्धिकराय, to him who makes us prosper. Sthapataye, स्थपतिः गृहादीनां चेता, तस्मै, to the mason; faqqft, who is the builder of this universe as supreme Archi tect. Bhuvantaye, भुवं पृथिवीं तनोति यः, तस्मै, to one who spreads out the Earth at the time of creation. Vārivaskrtāya, वरिवः धनं, तत् करोति यः, तस्मै, to him, who grants riches (to us). Oşadhīnām, of plants and herbs. Also, ग्राम्यारण्यानां, of rural forests. Mantrine, आलोचनाकुशलाय, विचारशीलाय, to one who is prudent; one who thinks over every aspect of a problem. Vanijaya, to the merchant or trader. Kaksānām, of rooms. Or, bushes of the forests, (from which the word 'ambush' is derived); a lonely part of forest, or river side or mountain. Uccairghoṣāya akrandayate, to one who roars loudly, and one who makes enemies cry. Pattīnām, पदातीनां, of foot soldiers. Also, पत्तिः सेनाविशेषः, a particular unit of army, each unit consisting one chariot, one elephant, three horses and five foot soldiers. 'एको रथो गजश्चाश्वा स्त्रयः पञ्च पदातयः । एष सेनाविशेषोऽयं पत्तिरित्यभिधीयते' (महा भारत I. 2. 19).

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    बंगाली (1)

    विषय

    পুনস্তমেব বিষয়মাহ ॥
    পুনঃ সেই বিষয় পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ।

    पदार्थ

    পদার্থঃ–রাজা ও প্রজাদিগের উচিত যে, (রোহিতায়) সুখ বৃদ্ধির কর্ত্তা এবং (স্থপতয়ে) স্থানগুলির স্বামী রক্ষক সেনাপতির জন্য (নমঃ) অন্ন, (বৃক্ষাণাম্) আম্রাদি বৃক্ষের (পতয়ে) অধিষ্ঠাতাকে (নমঃ) অন্ন, (ভুবন্তয়ে) আচারবান্ (বারি বস্কৃতায়) সেবনকারী ভৃত্যকে (নমঃ) অন্ন এবং (ওষধীনাম্) সোমলতাদি ওষধি সকলের (পতয়ে) রক্ষক বৈদ্যকে (নমঃ) অন্ন দিবে । (মন্ত্রিণে) মন্ত্রণাকারী রাজমন্ত্রী এবং (বাণিজায়) বৈশ্যদের ব্যবহারে কুশল পুরুষের (নমঃ) সৎকার করিবে । (কক্ষাণাম্) গৃহসকল মধ্যে নিবাসকারীদের (পতয়ে) রক্ষককে (নমঃ) অন্ন এবং (উচ্চের্ঘোষায়) উচ্চ স্বরে বলিবার তথা (আক্রন্দয়তে) দুষ্টদিগের রোদন করাইবার ন্যায়াধীশের (নমঃ) সৎকার এবং (পত্তীনাং) সেনার অবয়বের (পতয়ে) রক্ষাকারী পুরুষের (নমঃ) সৎকার করিবে ॥ ১ঌ ॥

    भावार्थ

    ভাবার্থঃ–মনুষ্যদিগের উচিত যে, বনাদির রক্ষক মনুষ্যগণকে অন্নাদি পদার্থ প্রদান করিয়া বৃক্ষ ও ওষধি আদি পদার্থের উন্নতি করিবে ॥ ১ঌ ॥

    मन्त्र (बांग्ला)

    নমো॒ রোহি॑তায় স্থ॒পত॑য়ে বৃ॒ক্ষাণাং॒ পত॑য়ে॒ নমো॒ নমো॑ ভুব॒ন্তয়ে॑ বারিবস্কৃ॒তায়ৌষ॑ধীনাং॒ পত॑য়ে॒ নমো॒ নমো॑ ম॒ন্ত্রিণে॑ বাণি॒জায়॒ কক্ষা॑ণাং॒ পত॑য়ে॒ নমো॒ নম॑ऽউ॒চ্চৈর্ঘো॑ষায়াক্র॒ন্দয়॑তে পত্তী॒নাং পত॑য়ে॒ নমঃ॑ ॥ ১ঌ ॥

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    নমো রোহিতায়েত্যস্য কুৎস ঋষিঃ । রুদ্রো দেবতা । বিরাডতিধৃতিশ্ছন্দঃ ।
    ষড্জঃ স্বরঃ ॥

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