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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 108 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 108/ मन्त्र 10
    ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः देवता - इन्द्राग्नी छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    यदि॑न्द्राग्नी पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्यां म॑ध्य॒मस्या॑मव॒मस्या॑मु॒त स्थः। अत॒: परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । प॒र॒मस्या॑म् । पृ॒थि॒व्याम् । म॒ध्य॒मस्या॑म् । अ॒व॒मस्या॑म् । उ॒त । स्थः । अतः॑ । परि॑ । वृ॒ष॒णौ॒ । आ । हि । या॒तम् । अथ॑ । सोम॑स्य । पि॒ब॒त॒म् । सु॒तस्य॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यदिन्द्राग्नी परमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यामवमस्यामुत स्थः। अत: परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत्। इन्द्राग्नी इति। परमस्याम्। पृथिव्याम्। मध्यमस्याम्। अवमस्याम्। उत। स्थः। अतः। परि। वृषणौ। आ। हि। यातम्। अथ। सोमस्य। पिबतम्। सुतस्य ॥ १.१०८.१०

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 108; मन्त्र » 10
    अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 27; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते ।

    अन्वयः

    अन्वयोऽपि पूर्ववद्विज्ञेयः ॥ १० ॥

    पदार्थः

    (यत्) यौ (इन्द्राग्नी) (परमस्याम्) (पृथिव्याम्) (मध्यमस्याम्) (अवमस्याम्) (उत) (स्थः) पूर्ववदर्थः (अतः०) इत्यपि पूर्ववत् ॥ १० ॥

    भावार्थः

    द्विविधाविन्द्राग्नी स्तः। एकावुत्तमगुणकर्मस्वभावेषु स्थितौ पवित्रभूमौ वा तावुत्तमौ यावपवित्रगुणकर्मस्वभावेष्वशुद्धभूम्यादिपदार्थेषु वा तिष्ठतस्ताववरौ इमौ द्विधा पवनाग्नी उपरिष्टादधोऽधस्तादुपर्य्यागच्छतस्तस्मादुभाभ्यां मन्त्राभ्यामवमपरमशब्दाभ्यां पूर्वप्रयुक्ताभ्यां विज्ञापितोऽयमर्थ इति वेद्यम् ॥ १० ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    इस मन्त्र का अर्थ पिछले मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥ १० ॥

    भावार्थ

    इन्द्र और अग्नि दो प्रकार के हैं। एक तो वे कि जो उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव में स्थिर वा पवित्र भूमि में स्थिर हैं वे उत्तम और जो अपवित्र गुण, कर्म, स्वभाव में वा अपवित्र भूमि आदि पदार्थों में स्थिर होते हैं वे निकृष्ट, ये दोनों प्रकार के पवन और अग्नि ऊपर-नीचे सर्वत्र चलते हैं। इससे दोनों मन्त्रों से (अवम) और (परम) शब्द जो पहिले प्रयोग किये हुए हैं, उनसे दो प्रकार के (इन्द्र) और (अग्नि) के अर्थ को समझाया है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १० ॥

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    विषय

    त्रिलोकी के तीन रत्न

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्राग्नी) = इन्द्र व अग्निदेवो ! (यत्) = जो आप (परमस्यां पृथिव्याम्) = सर्वोत्कृष्ट पृथिवी , अर्थात् द्युलोक में हो , (मध्यमस्याम्) = मध्यम पृथिवी , अर्थात् अन्तरिक्षलोक में हो (उत) = और (अवमस्याम्) = सबसे निचली पृथिवी में (स्थः) = हो , (अतः) = इसलिए (वृषणौ) = शक्तिशाली होते हुए तुम (हि) = निश्चय से हमें (परि आयातम्) = सर्वथा प्राप्त होओ (अथ) = और (सुतस्य सोमस्य) = उत्पन्न हुए हुए सोम का (पिबतम्) = पान करो । 

    २. परमपृथिवी , अर्थात् मस्तिष्करूप द्युलोक में इन्द्र और अग्नि की कृपा से ज्ञान के सूर्य का उदय होता है । मध्यमपृथिवी , अर्थात् हृदयान्तरिक्ष सब आसुरवृत्तियों के संहार के कारण निर्मल बनता है । अवमपृथिवी , अर्थात् शरीर शक्ति व दृढ़तावाला होता है । 

    ३. वस्तुतः शरीर में सोम के पान व रक्षण से हमें “ज्ञान , नैर्मल्य व स्वास्थ्य” तीनों का लाभ प्राप्त होता है और हमारी यह अध्यात्म की त्रिलोकी इन तीन रत्नों से दीप्त हो उठती है । 
     

    भावार्थ


    भावार्थ - हम स्वास्थ्य , नैर्मल्य व ज्ञान को प्राप्त करें । यह ज्ञान , नैर्मल्य व स्वास्थ्य हमारे जीवन को दीप्त करनेवाले हों । 
     

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    विषय

    सभाध्यक्ष, न्यायाध्यक्षों का वर्णन ।

    भावार्थ

    ( यदिन्द्राग्नी० ) इत्यादि पूर्ववत् । पूर्व मन्त्र में अवम, मध्यम, परम इस क्रम से पृथिवी के विशेषण हैं दूसरे मन्त्र में परम, मध्यम और अवम इस क्रमसे विशेषण हैं। वायु और अग्नियों की स्थिति और क्रम दोनों प्रकार की जाननी चाहिये, एक भूमिसे अन्तरिक्ष और अन्तरिक्ष से आकाश में जाने वाले और दूसरे आकाश से मध्यम अन्तरिक्ष और अन्तरिक्ष से पृथिवी को आने वाले ये दो प्रकार के वायु और अग्नियों का वर्णन है। उसी प्रकार चढ़ते और उतरते क्रम से योग्य विद्वान् अधिकारियों का भी वर्णन समझना चाहिये । अर्थात् छोटे अधिकार वाले अपने से बड़े अधिकारी से निवेदन करते हैं और बड़े छोटे अधिकारियों को आज्ञा करते हैं। दोनों ही प्रकारों से वे प्रजा को सुखकारी हों ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स आङ्गिरस ऋषिः ॥ इन्द्राग्नी देवते ॥ छन्दः- १, ८, १२ निचृत् त्रिष्टुप् । २, ३, ६, ११ विराट् त्रिष्टुप् । ७, ९, १०, १३ त्रिष्टुप् । ४ भुरिक् पंक्तिः । ५ पंक्तिः । त्रयोदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    इंद्र व अग्नी दोन प्रकारचे आहेत. एक ते जे उत्तम गुण, कर्म, स्वभावात स्थिर आहेत किंवा पवित्र भूमीत स्थिर आहेत ते उत्तम व जे अपवित्र गुण, कर्म, स्वभावात किंवा अपवित्र भूमी इत्यादी पदार्थात स्थिर होतात ते निकृष्ट वायू व अग्नी सर्वत्र चलायमान असतात त्यामुळे दोन्ही मंत्रातून (अवम) व (परम) शब्द प्रथम प्रयोगात आणलेले आहेत. त्यांच्याकडून दोन प्रकारचे (इंद्र) व (अग्नी) अर्थ समजाविले आहेत, हे जाणले पाहिजेत. ॥ १० ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra and Agni, whether you are in the highest regions of the heaven of light, or in the middle region of the skies of wind and lightning, or in the lowest region of the earth, from there come, powers generous and heroic, and then drink of the soma joy of life distilled.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The same subject is continued.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    As given above with this difference that here by परमस्याम्, मध्यमस्याम् and अवमस्याम् पृथिव्यां may be taken the upper, the middle and the lower regions of the earth.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    India and Agni are of two kinds. Those who are of good virtues, actions and temperament and residing in pure and clean places are called or the best. Those who are of impure attributes, actions and temperaments and residing in impure or un-clean places are called or low. Air and electricity go from below to up-wards and from above to below. The word and used in the Mantras denote this.

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