Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 108 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 108/ मन्त्र 5
    ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः देवता - इन्द्राग्नी छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः

    यानी॑न्द्राग्नी च॒क्रथु॑र्वी॒र्या॑णि॒ यानि॑ रू॒पाण्यु॒त वृष्ण्या॑नि। या वां॑ प्र॒त्नानि॑ स॒ख्या शि॒वानि॒ तेभि॒: सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑ ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यानि॑ । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । च॒क्रथुः॑ । वी॒र्या॑णि । यानि॑ । रू॒पाणि॑ । उ॒त । वृष्ण्या॑नि । या । वा॒म् । प्र॒त्नानि॑ । स॒ख्या । शि॒वानि॑ । तेभिः॑ । सोम॑स्य । पि॒ब॒त॒म् । सु॒तस्य॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यानीन्द्राग्नी चक्रथुर्वीर्याणि यानि रूपाण्युत वृष्ण्यानि। या वां प्रत्नानि सख्या शिवानि तेभि: सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यानि। इन्द्राग्नी इति। चक्रथुः। वीर्याणि। यानि। रूपाणि। उत। वृष्ण्यानि। या। वाम्। प्रत्नानि। सख्या। शिवानि। तेभिः। सोमस्य। पिबतम्। सुतस्य ॥ १.१०८.५

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 108; मन्त्र » 5
    अष्टक » 1; अध्याय » 7; वर्ग » 26; मन्त्र » 5
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथैश्वर्ययुक्तस्य स्वामिनः शिल्पविद्याक्रियाकुशलस्य शिल्पिनश्च कर्माण्युपदिश्यन्ते ।

    अन्वयः

    हे इन्द्राग्नी यो वां यानि वीर्याणि यानि रूपाणि वृष्ण्यानि कर्माणि या प्रत्नानि शिवानि सख्या सन्ति तेभिस्तैः सुतस्य सोमस्य रसं पिबतमुतास्मभ्यं सुखं चक्रथुः कुर्यातम् ॥ ५ ॥

    पदार्थः

    (यानि) (इन्द्राग्नी) स्वामिभृत्यौ (चक्रथुः) कुर्य्यातम् (वीर्याणि) पराक्रमयुक्तानि कर्माणि (यानि) (रूपाणि) शिल्पसिद्धानि चित्ररूपाणि यानादीनि वस्तूनि (उत) अपि (वृष्ण्यानि) पुरुषार्थयुक्तानि कर्माणि (या) यानि (वाम्) युवयोः (प्रत्नानि) प्राक्तनानि (सख्या) सख्यानि सख्युः कर्माणि (शिवानि) मङ्गलमयानि (तेभिः) तैः (सोमस्य) संसारस्थपदार्थसमूहस्य रसम् (पिबतम्) (सुतस्य) निष्पादितस्य ॥ ५ ॥

    भावार्थः

    अत्रेन्द्रशब्देन धनाढ्योऽग्निशब्देन विद्यावान् शिल्पी गृह्यते विद्यापुरुषार्थाभ्यां विना कार्यसिद्धिः कदापि जायते न च मित्रभावेन विना सर्वदा व्यवहारः सिद्धो भवितुं शक्यस्तस्मादेतत्सर्वदाऽनुष्ठेयम् ॥ ५ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    अब ऐश्वर्य्ययुक्त स्वामी और शिल्पविद्या की क्रियाओं में कुशल शिल्पीजन के कामों को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (इन्द्राग्नी) स्वामि और सेवक (वाम्) तुम्हारे (यानि) जो (वीर्याणि) पराक्रमयुक्त काम (यानि) जो (रूपाणि) शिल्पविद्या से सिद्ध, चित्र, विचित्र, अद्भुत जिनका रूप वे विमान आदि यान और (वृष्ण्यानि) पुरुषार्थयुक्त काम (या) वा जो तुम दोनों के (प्रत्नानि) प्राचीन (शिवानि) मङ्गलयुक्त (सख्या) मित्रों के काम हैं (तेभिः) उनसे (सुतस्य) निकाले हुए (सोमस्य) संसारी वस्तुओं के रस को (पिबतम्) पिओ (उत) और हम लोगों के लिये (चक्रथुः) उनसे सुख करो ॥ ५ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में इन्द्र शब्द से धनाढ्य और अग्नि शब्द से विद्यावान् शिल्पी का ग्रहण किया जाता है, विद्या और पुरुषार्थ के विना कामों की सिद्धि कभी नहीं होती और न मित्रभाव के विना सर्वदा व्यवहार सिद्ध हो सकता है, इससे उक्त काम सर्वदा करने योग्य हैं ॥ ५ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    सोमपान का महत्त्व

    पदार्थ

    १. हे (इन्द्राग्नी) = शक्ति व प्रकाश के तत्त्वों ! आप (यानि वीर्याणि चक्रथुः) = जिन शक्तिशाली कर्मों को हमारे जीवनों में करते हो (उत) = और (यानि) = जिन (वृष्ण्यानि) = शक्तिसम्पन्न (रूपाणि) = रूपों को करते हो , (या) = जो (वाम्) = आपकी (प्रत्नानि) = सनातन (शिवानि) = कल्याणकर (सख्या)= मित्रताएँ हैं , (तेभिः) = उनके हेतु से (सुतस्य सोमस्य) = उत्पन्न हुए - हुए सोम [वीर्य] का (पिबतम्) = शरीर में ही पान करनेवाले होओ । 

    २. जिस समय हमारे जीवनों में इन्द्र व अग्नि का प्रतिष्ठापन होता है , उस समय [क] हमारे कर्म शक्तिशाली होते हैं , [ख] हमारा रूप तेजस्वी व शक्तिसम्पन्न प्रतीत होता है और [ग] इन दोनों तत्त्वों का समन्वय हमारे लिए कल्याणकर होता है । 

    ३. इन सब परिणामों को अपने जीवन में सिद्ध करने के लिए सोम का पान आवश्यक है - सोमशक्ति को शरीर में ही सुरक्षित रखना - यही सोमपान है । 
     

    भावार्थ


    भावार्थ - शरीर में सोम का रक्षण होने पर हमारे जीवन में शक्ति व प्रकाश का मेल होगा । उससे हमारे कर्म शक्तिशाली होंगे , रूप तेजस्वी होगा और सब प्रकार से कल्याण - ही कल्याण होगा । 
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    क्षत्र, ब्रह्म, और स्त्री पुरुषों के परस्पर कर्तव्य ।

    भावार्थ

    हे ( इन्द्राग्नी ) वायु और अग्नि के समान परस्पर उपकारक स्वामी, भृत्य और राजा और मन्त्री, क्षत्र ब्रह्म एवं स्त्री पुरुषो ! आप दोनों ( यानि वीर्याणि ) जिन वीर्यों, बलों और सामर्थ्यो को ( यानि रूपाणि ) जिन नाना प्रकार के पदार्थों को या रुचिकर कार्यों को ( उत ) और ( यानि वृष्ण्यानि ) पुरुषार्थ युक्त और सुखवर्षक कार्यों को ( चक्रथुः ) प्रकट करें और ( वां ) आप दोनों ( या ) जो ( प्रत्नानि ) चिरस्थायी ( शिवानि ) शुभ, मङ्गल जनक, कल्याणकारी ( सख्यानि ) मित्रता के कार्य हैं ( तेभिः ) उन सबके साथ युक्त होकर ( सुतस्य ) तैयार किये हुए ( सोमस्य ) सांसारिक ऐश्वर्य तथा राज्य और ओषधि-रसों तथा अन्न और शारीरिक बल आदि का ( पिबतम् ) उपभोग करो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    कुत्स आङ्गिरस ऋषिः ॥ इन्द्राग्नी देवते ॥ छन्दः- १, ८, १२ निचृत् त्रिष्टुप् । २, ३, ६, ११ विराट् त्रिष्टुप् । ७, ९, १०, १३ त्रिष्टुप् । ४ भुरिक् पंक्तिः । ५ पंक्तिः । त्रयोदशर्चं सूक्तम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    या मंत्रात इंद्र शब्दाने धनाढ्य व अग्नी शब्दाने कारागिराचे ग्रहण केलेले आहे. विद्या व पुुरुषार्थाशिवाय कामाची सिद्धी कधी होऊ शकत नाही किंवा मैत्रीशिवाय नेहमी व्यवहार सिद्ध होऊ शकत नाही. त्यामुळे वरील काम सदैव करण्यायोग्य असते. ॥ ५ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra and Agni, whatever great success you have inspired and achieved, whatever forms of abundant generosity you have assumed, whatever ancient and auspicious actions you have performed as friends of humanity, with all these drink of the soma distilled in celebration of your power and glory.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The duties of a wealthy master and an expert artist or technician are taught.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O Indra and Agni (Wealthy master and learned artist) whatever heroic deeds you have done, whatever beautiful and wonderful things of art like the air craft you have made and whatever mighty works of Laboure you have done, whatever benefits you have poured down, whatever ancient auspicious friendships you have contracted, come with them all and drink of the effused juice of the various articles in the world.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    (इन्द्राग्नी) स्वामिभृत्यौ = A wealthy Master and a learned artist or technician. (सोमस्य) संसारस्थपदार्थसमूहस्य = Of the various things of the world.

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Without knowledge and industriousness no work can be accomplished Without friendship also, it is not possible to complete a good dealing. Therefore these things must be done.

    Translator's Notes

    The word इन्द्र is derived from इदि-परमैश्वेयै hence the meaning of a wealthy master. धनाढ्य: स्वामी The word अग्नि is derived from अगि-गतौ गतेस्त्रयोऽर्था: ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्च taking the first meaning of or knowledge. Rishi Dayananda Sarasvati has interpreted it (अग्नि:) here as विद्यावान् शिल्पी a learned artisan or technician, The word सोम पु-प्रसवैश्वर्ययो: hence the meaning of संसारस्थ-पदार्थसमूह: = of things of the world created by God.

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top