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ऋग्वेद मण्डल - 1 के सूक्त 165 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 1/ सूक्त 165/ मन्त्र 11
    ऋषिः - अगस्त्यः देवता - इन्द्र: छन्दः - विराट्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    अम॑न्दन्मा मरुत॒: स्तोमो॒ अत्र॒ यन्मे॑ नर॒: श्रुत्यं॒ ब्रह्म॑ च॒क्र। इन्द्रा॑य॒ वृष्णे॒ सुम॑खाय॒ मह्यं॒ सख्ये॒ सखा॑यस्त॒न्वे॑ त॒नूभि॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अम॑न्दत् । मा॒ । म॒रु॒तः॒ । स्तोमः॑ । अत्र॑ । यत् । मे॒ । न॒रः॒ । श्रुत्य॑म् । ब्रह्म॑ । च॒क्र । इन्द्रा॑य । वृष्णे॑ । सुऽम॑खाय । मह्य॑म् । सख्ये॑ । सखा॑यः । त॒न्वे॑ । त॒नूभिः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अमन्दन्मा मरुत: स्तोमो अत्र यन्मे नर: श्रुत्यं ब्रह्म चक्र। इन्द्राय वृष्णे सुमखाय मह्यं सख्ये सखायस्तन्वे तनूभि: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    अमन्दत्। मा। मरुतः। स्तोमः। अत्र। यत्। मे। नरः। श्रुत्यम्। ब्रह्म। चक्र। इन्द्राय। वृष्णे। सुऽमखाय। मह्यम्। सख्ये। सखायः। तन्वे। तनूभिः ॥ १.१६५.११

    ऋग्वेद - मण्डल » 1; सूक्त » 165; मन्त्र » 11
    अष्टक » 2; अध्याय » 3; वर्ग » 26; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ।

    अन्वयः

    हे मरुतो यथा मे यत् श्रुत्यं ब्रह्म स्तोमश्चाऽत्र माऽमन्दत्तथा युष्मानप्यानन्दयतु। हे नरो यथा यूयं सुमखाय वृष्ण इन्द्राय सख्ये मह्यं सखायस्सन्तस्तनूभिर्मे तन्वे सुखं चक्र तथाऽहमपि युष्मभ्यमेतत्करोमि ॥ ११ ॥

    पदार्थः

    (अमन्दत्) आनन्दयतु (मा) माम् (मरुतः) विद्वांसः (स्तोमः) स्तुतिसमूहः (अत्र) (यत्) (मे) मह्यम् (नरः) नायकाः (श्रुत्यम्) श्रुतिषु साधु (ब्रह्म) वेदः (चक्र) कुर्वन्तु (इन्द्राय) विद्याप्रकाशिताय (वृष्णे) बलवते (सुमखाय) उत्तमयज्ञानुष्ठात्रे (मह्यम्) (सख्ये) सर्वमित्राय (सखायः) सर्वसुहृदः (तन्वे) शरीराय (तनूभिः) शरीरैः ॥ ११ ॥

    भावार्थः

    अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। विद्वांसो यथाऽधीताः शब्दार्थसम्बन्धतो विज्ञाता वेदाः स्वात्मनः सुखयन्ति तथैवापरान् सुखयिष्यन्तीति मत्वा ते शिष्यमध्यापयेयुः। यथा स्वयं ब्रह्मचर्येणारोग्यवीर्यवन्तो भूत्वा दीर्घायुषस्स्युस्तथैवान्यानपि कुर्युः ॥ ११ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

    पदार्थ

    हे (मरुतः) विद्वानो ! जैसे (मे) मेरे लिये (यत्) जो (श्रुत्यम्) सुनने योग्य (ब्रह्म) वेद और (स्तोमः) स्तुतिसमूह है वह (अत्र) यहाँ (मा) मुझे (अमन्दत्) आनन्दित करे वैसे तुमको भी आनन्दित करावे। हे (नरः) अग्रगामी मुखिया जनो ! जैसे तुम (सुमखाय) उत्तम यज्ञानुष्ठान करनेवाले (वृष्णे) बलवान् (इन्द्राय) विद्या से प्रकाशित (सख्ये) सबके मित्र (मह्यम्) मेरे लिये (सखायः) सबके सुहृद् होते हुए (तनूभिः) शरीरों के साथ मेरे (तन्वे) शरीर के लिये सुख (चक्र) करो वैसे मैं भी आपके लिये इसको करूँ ॥ ११ ॥

    भावार्थ

    इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् जन जैसे पढ़े और शब्दार्थ सम्बन्ध से जाने हुए वेद पढ़नेवाले के आत्मा को सुख देते हैं, वैसे ही औरों को भी सुखी करेंगे, ऐसा मान के वे अध्यापक शिष्य को पढ़ावें। जैसे आप ब्रह्मचर्य से रोगरहित बलवान् होकर दीर्घजीवी हों, वैसे औरों को भी करें ॥ ११ ॥

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    विषय

    जितेन्द्रिय, शक्तिसम्पन्न व यज्ञशील

    पदार्थ

    १. हे (मरुतः) = प्राणसाधको! (अत्र) = इस जीवन में (स्तोमः) = वह स्तुति (मा) = मुझे (अमन्दन्) = हर्षित करती है, (यत्) = जिस (श्रुत्यं ब्रह्म) = श्रवणयोग्य स्तवन को हे (नरः) = उन्नति-पथ पर चलनेवाले लोगो! आप (मे) = मेरे लिए चक्र करते हो। जो भी प्राणसाधक बनकर उन्नति-पथ पर चलता हुआ प्रभु-स्तवन करता है, वह प्रभु का प्रिय बनता ही है। २. (इन्द्राय) = परमैश्वर्यवाले, (वृष्णे) = ऐश्वर्य का वर्षण करनेवाले, (सुमखाय) = उत्तम यज्ञशील (मह्यम्) = मुझ (सख्ये) = सखा के लिए (सखायः) = मित्र बनकर आप लोग (तनूभिः) = शरीरों से (तन्वे) = [तनू विस्तारे] मेरे विस्तार के लिए होओ, अर्थात् तुम्हारे शरीरों से होनेवाली सब क्रियाएँ मेरे गुणों का प्रतिपादन करनेवाली हों। मेरी भाँति ही तुम्हारी क्रियाएँ 'दया, न्याय' आदि गुणों से युक्त हों। मेरी वास्तविक स्तुति तो यही है कि 'तुम मेरे जैसे बनो।' तुम भी इन्द्र, वृषन् व सुमख बनने का यत्न करो ।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम अपने सनातन सखा प्रभु के समान ही 'इन्द्र, वृषन् व सुमख' बनकर प्रभु का सच्चा स्तवन करें। यही सच्चा प्रभु-स्तवन है कि हम 'जितेन्द्रिय, शक्तिसम्पन्न व यज्ञशील' बनें ।

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    विषय

    वीरों का नायक से सम्बन्ध ।

    भावार्थ

    हे ( मरुतः ) वीर पुरुषो ! हे ( नरः ) नायको ! ( अत्र ) इस राष्ट्र में आप लोग जो ( मे ) मेरे लिये ( स्तोमः ) आप लोगों के स्तुति वचन या आदर भाव सदा ( अमन्दत् ) हर्षकारी होते हैं । और ( यत् ) जो ( श्रुत्यं ) श्रवण योग्य, कीर्त्तिजनक ( ब्रह्म ) महान् ऐश्वर्य और प्रभुत्व आप लोग ( चक्र ) बना रहे हो वह सब आप लोगों को भी सुखकारी हो और हे (सखायः) मित्र वर्गो ! आप लोग अपने (तनूभिः) शरीरों से (मे तन्वे) मेरे शरीर की रक्षा और वृद्धि के लिये, ( मे इन्द्राय ) मेरे ऐश्वर्य की वृद्धि के लिये, ( वृष्णे ) सब सुखों के वर्षक मुझ बलवान् (सुमखाय) उत्तम यज्ञशील, ( सख्ये मह्यं ) मुझ मित्र के लिये आप ( चक्र ) करते हैं उसका उत्तम फल आपको भी प्राप्त हो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    अगस्त्य ऋषिः॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्द:– १, ३, ४, ५, ११, १२ विराट् त्रिष्टुप । २, ८,९ त्रिष्टुप्। १३ निचृत् त्रिष्टुप् । ६, ७, १०, १४ भुरिक् पङ्क्तिः । १५ पङ्क्तिः । पञ्चदशर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    विद्वान लोक जसे वाचलेल्या व शब्दार्थ संबंधांना जाणलेल्या, वेद शिकणाऱ्या आत्म्यांना सुखी करतात. तसे इतरांनाही सुखी करतील असे मानून अध्यापकांनी शिष्यांना शिकवावे. जसे स्वतः ब्रह्मचर्य पाळून रोगरहित व बलवान बनून दीर्घजीवी बनतात तसे इतरांनाही करावे. ॥ ११ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Friends, leaders, Maruts, may the hymns of Veda and the song of praise which you have composed for me and offered here give me joy. May the song with its body of words and music be pleasing to me and my body and mind and to Indra, generous friend of all and performer of yajna.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The previous theme is further developed.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O learned persons ! may these Vedic teachings which are worth listening and is the true praise of God delight me. Let it delight you also. O leading men, you make me happy-being my friends-as I am performer of good Yajnas. I am powerful and friendly to all because of my physical assistance and otherwise too. Likewise, let me also make you happy and joyful.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Highly learned persons should teach the Vedas to their pupils with a view that they will cause them joyous and happy. They have also delighted them when studied and well understood. They live long, because of Brahmacharya, health and vitality. Likewise they should make others also happy.

    Foot Notes

    (सुमखाय) उत्तम यज्ञानुष्ठात्ने = For the performer of good Yajnas.

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