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ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 48 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 48/ मन्त्र 13
    ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - मरुतो लिङ्गोक्ता वा छन्दः - निचृदुष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    भ॒रद्वा॑जा॒याव॑ धुक्षत द्वि॒ता। धे॒नुं च॑ वि॒श्वदो॑हस॒मिषं॑ च वि॒श्वभो॑जसम् ॥१३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    भ॒रत्ऽवा॑जाय । अव॑ । धु॒क्ष॒त॒ । द्वि॒ता । धे॒नुम् । च॒ । वि॒श्वऽदो॑हसम् । इष॑म् । च॒ । वि॒श्वऽभो॑जसम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    भरद्वाजायाव धुक्षत द्विता। धेनुं च विश्वदोहसमिषं च विश्वभोजसम् ॥१३॥

    स्वर रहित पद पाठ

    भरत्ऽवाजाय। अव। धुक्षत। द्विता। धेनुम्। च। विश्वऽदोहसम्। इषम्। च। विश्वऽभोजसम् ॥१३॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 48; मन्त्र » 13
    अष्टक » 4; अध्याय » 8; वर्ग » 3; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    पुनस्तमेव विषयमाह ॥

    अन्वयः

    या विदुषी माता भरद्वाजाय विश्वदोहसं धेनुमवधुक्षत विश्वभोजसमिषं चावधुक्षत सा द्विता चानया प्रचारिण्या क्रियया भवति ॥१३॥

    पदार्थः

    (भरद्वाजाय) धृतविज्ञानाय (अव) (धुक्षत) अलङ्कुरुते (द्विता) द्वयोर्भावः (धेनुम्) विद्यायुक्तां वाचम् (च) (विश्वदोहसम्) विश्वं सर्वविज्ञानान् दोग्धियया ताम् (इषम्) अन्नं विज्ञानं वा (च) (विश्वभोजसम्) विश्वस्य समग्रस्य जनस्य पालकम् ॥१३॥

    भावार्थः

    याः स्त्रियः सत्यभाषणान्वितां वाचं सर्वोत्तमां सत्यां विद्यां च सन्तानेभ्यः प्रयच्छन्ति ता एव देव्यो बहुमान्या भवन्ति ॥१३॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    जो विदुषी माता (भरद्वाजाय) जिसने विज्ञान धारण किया उसके लिये (विश्वदोहसम्) जिससे समस्त विज्ञान को पूर्ण करती उस (धेनुम्) विद्या युक्त वाणी को (अव, धुक्षत) परिपूर्ण करती है और (विश्वभोजसम्) समस्त मनुष्यमात्र के पालक (इषम्) अन्न वा विज्ञान को (च) भी परिपूर्ण करती है वह (द्विता) दोनों विज्ञान वा अन्न की चेष्टावाली (च) भी इस प्रचारिणी क्रिया से होती है ॥१३॥

    भावार्थ

    जो स्त्रीजन सत्यभाषणयुक्त वाणी और सर्वोत्तम सत्य विद्या को सन्तानों के लिये देती हैं, वे ही देवी विदुषी स्त्रियाँ बहुत मान करने के योग्य होती हैं ॥१३॥

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    विषय

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    भावार्थ

    हे विद्वान् जनो ! वह पूर्व कही वेदवाणी, विदुषी स्त्री और पृथ्वी रूप गौ, ( भरद्-वाजाय ) ज्ञान और ऐश्वर्य को धारण करने वाले के लिये ( द्विता ) दोनों ही पदार्थ ( अव धुक्षत ) प्रेमपूर्वक नम्र होकर देती है, एक तो ( विश्वदोहसं धेनुं च ) वह समस्त सुख देने वाली वाणी का उपदेश करती है और ( विश्वभोजसम् इषं च ) समस्त विश्व का पालन करने और सबके भोजन करने योग्य अन्न भी प्रदान करती है । हे विद्वान् पुरुषों ! आप लोग भी उस समस्त सुखों के देने वाली और सुख का पालन करने वाली दोनों प्रकार की ( धेनुं ) वाणी और गोवत् भूमि का और ( इषं च ) इष्टतम अन्न और सेनादि का ( अव धुक्षत ) दोहन करो और ऐश्वर्यादि प्राप्त करो ।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः। तृणपाणिकं पृश्निसूक्तं ॥ १–१० अग्निः। ११, १२, २०, २१ मरुतः । १३ – १५ मरुतो लिंगोत्का देवता वा । १६ – १९ पूषा । २२ पृश्निर्धावाभूमी वा देवताः ॥ छन्दः – १, ४, ४, १४ बृहती । ३,१९ विराड्बृहती । १०, १२, १७ भुरिग्बृहती । २ आर्ची जगती। १५ निचृदतिजगती । ६, २१ त्रिष्टुप् । ७ निचृत् त्रिष्टुप् । ८ भुरिक् त्रिष्टुप् । ६ भुरिग् नुष्टुप् । २० स्वरराडनुष्टुप् । २२ अनुष्टुप् । ११, १६ उष्णिक् । १३, १८ निचृदुष्णिक् ।। द्वाविंशत्यृचं सूक्तम् ॥

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    विषय

    विश्वोदहस् धेनु, विश्वभोजस् इष्

    पदार्थ

    [१] हे मरुतो, प्राणो! भरद्वाजाय अपने में शक्ति को भरनेवाले के लिये (द्विता) = दो प्रकार से (अवधुक्षत) = प्रपूरण करने हैं। एक तो (विश्वदोहसं धेनुम्) = सम्पूर्ण ज्ञानों का प्रपूरण करनेवाली वेद धेनु को (च) = और (विश्वभोजसम्) = सब पालन करनेवाली (इषम्) = प्रेरणा को । [२] प्राणसाधना के द्वारा बुद्धि की दीप्ति को प्राप्त करके हम वेद धेनु के दोहन से सब आवश्यक ज्ञान को प्राप्त करें। इस प्राणसाधना से हम मन की निर्मलता के होने पर अन्तः तःस्थित प्रभु की प्रेरणा को सुनें । यह प्रेरणा सब प्रकार से हमारा पालन करनेवाली होगी, हमें मार्गभ्रष्ट होने से बचायेगी ।

    भावार्थ

    भावार्थ- प्राणायाम से बुद्धि की दीप्ति होने पर हम वेद धेनु का दोहन करते हैं, जो सब आवश्यक ज्ञानदुग्धों को प्राप्त कराती है। इस प्राणसाधना से उत्पन्न मन की निर्मलता हमें उस प्रेरणा को सुनने के योग्य बनाती है, जो हमें मार्गभ्रष्ट नहीं होने देती।

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्या स्त्रिया सत्य वाणी व सर्वोत्तम सत्य विद्या संतानांना देतात त्याच देवी असून अत्यंत माननीय असतात. ॥ १३ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O mother, you bear and bring the milk of twofold efficacy for the brilliant celebrant and bearer of science, power and fast action: divine speech yielding universal knowledge and enlightenment for all, and universal food for the body, mind and soul for the nourishment of all without discrimination.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How mothers should teach their children-is continued.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    That highly learned mother gives to (adorns with) a man, who is upholder of true knowledge, a speech endowed with wisdom that milks-all scientific knowledge and food that gives nourishment to all, becomes in this way, doubly blessed.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those women become most venerable, who give their children a speech and the best true knowledge.

    Foot Notes

    (धेनुम्) विद्यायुक्तां वाचम् । धेनुरिति वाङ्नाम (NG 1, 11) = Speech endowed with true knowledge. (इषम्) अन्नं विज्ञानं वा । इषम् इति अन्ननाम (NG 2, 7)। = Food or true knowledge.

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