ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 48/ मन्त्र 3
ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः
देवता - अग्निः
छन्दः - विराड्बृहती
स्वरः - मध्यमः
वृषा॒ ह्य॑ग्ने अ॒जरो॑ म॒हान्वि॒भास्य॒र्चिषा॑। अज॑स्रेण शो॒चिषा॒ शोशु॑चच्छुचे सुदी॒तिभिः॒ सु दी॑दिहि ॥३॥
स्वर सहित पद पाठवृषा॑ । हि । अ॒ग्ने॒ । अ॒जरः॑ । म॒हान् । वि॒ऽभासि॑ । अ॒र्चिषा॑ । अज॑स्रेण । शो॒चिषा॑ । शोशु॑चत् । शु॒चे॒ । सु॒दी॒तिऽभिः॑ । सु । दी॒दि॒हि॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
वृषा ह्यग्ने अजरो महान्विभास्यर्चिषा। अजस्रेण शोचिषा शोशुचच्छुचे सुदीतिभिः सु दीदिहि ॥३॥
स्वर रहित पद पाठवृषा। हि। अग्ने। अजरः। महान्। विऽभासि। अर्चिषा। अजस्रेण। शोचिषा। शोशुचत्। शुचे। सुदीतिऽभिः। सु। दीदिहि ॥३॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 48; मन्त्र » 3
अष्टक » 4; अध्याय » 8; वर्ग » 1; मन्त्र » 3
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अष्टक » 4; अध्याय » 8; वर्ग » 1; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनः स राजा किं कुर्य्यादित्याह ॥
अन्वयः
हे शुचेऽग्ने ! हि यतो वृषाऽजरो महांस्त्वमजस्रेणार्चिषा शोचिषा सुदीतिभिः सर्वान् विभासि तस्मादस्मान् सु दीदिहि ॥३॥
पदार्थः
(वृषा) बलिष्ठः (हि) यतः (अग्ने) पावक इव वर्त्तमान (अजरः) जरारहितः (महान्) (विभासि) (अर्चिषा) सत्कारेण दीप्त्या वा (अजस्रेण) निरन्तरेण (शोचिषा) प्रकाशेन (शोशुचत्) भृशं पवित्रयन् (शुचे) विद्याविनयाभ्यां प्रकाशित (सुदीतिभिः) सुष्ठु दीप्तिभिः (सु) (दीदिहि) प्रकाशय ॥३॥
भावार्थः
हे राजंस्त्वया सततं विद्याविनयप्रकाशेन दुर्व्यसनक्षयेण प्रजाः सततं पालनीयाः ॥३॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (शुचे) विद्या और विनय से प्रकाशित (अग्ने) पावक के समान वर्त्तमान ! (हि) जिससे (वृषा) अत्यन्त बलवान् (अजरः) जरा अवस्था से रहित (महान्) बड़े आप (अजस्रेण) निरन्तर (अर्चिषा) सत्कार वा दीप्ति से (शोचिषा) वा प्रकाश से (शोशुचत्) निरन्तर पवित्र करते हुए (सुदीतिभिः) उत्तम दीप्तियों से सबको (विभासि) विशेषता से प्रकाशित करते हैं, इससे हम लोगों को (सु, दीदिहि) प्रकाशित कीजिये ॥३॥
भावार्थ
हे राजन् ! आपको चाहिये कि निरन्तर विद्या और विनय के प्रकाश से और दुष्ट व्यसनों के नाश से प्रजा की निरन्तर पालना करो ॥३॥
विषय
missing
भावार्थ
( अग्ने ) अग्नि के समान चमकने हारे तेजस्विन् ! तू ( हि ) क्योंकि (वृषा ) सुखों का मेघवत् वर्षण करने हारा और (अर्चिषा) विद्युत्वत् कान्ति से (वि भासि) प्रकाशित होता है तू (अजरः) कभी जीर्ण न होने वाला, अविनाशी, ( महान् ) महान् ( अजस्रेण ) निरन्तर, अविनाशी, ( शोचिषा ) तेज से ( शोशुचत् ) चमकता हुआ हे ( शुचे ) शुद्ध स्वभाव ! तू ( सु-दीतिभिः) उत्तम कान्तियों से हमें भी (सु दीदिहि ) अच्छी प्रकार प्रकाशित कर ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः। तृणपाणिकं पृश्निसूक्तं ॥ १–१० अग्निः। ११, १२, २०, २१ मरुतः । १३ – १५ मरुतो लिंगोत्का देवता वा । १६ – १९ पूषा । २२ पृश्निर्धावाभूमी वा देवताः ॥ छन्दः – १, ४, ४, १४ बृहती । ३,१९ विराड्बृहती । १०, १२, १७ भुरिग्बृहती । २ आर्ची जगती। १५ निचृदतिजगती । ६, २१ त्रिष्टुप् । ७ निचृत् त्रिष्टुप् । ८ भुरिक् त्रिष्टुप् । ६ भुरिग् नुष्टुप् । २० स्वरराडनुष्टुप् । २२ अनुष्टुप् । ११, १६ उष्णिक् । १३, १८ निचृदुष्णिक् ।। द्वाविंशत्यृचं सूक्तम् ॥
विषय
शक्ति व दीप्ति की प्राप्ति
पदार्थ
[१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! आप (हि) = निश्चय से (वृषा) = हमारे में शक्ति का सेचन करनेवाले हैं। (अजरः) = कभी जीर्ण होनेवाले नहीं, अपने उपासकों को भी आप अजर बनाते हैं। (महान्) = आप पूज्य हैं, (अर्चिषा) = ज्ञान ज्वाला से (विभासि) = आप विशेषरूप से दीप्त होते हैं। [२] (अजस्त्रेण) = अविच्छिन्न (शोचिषा) = दीप्ति से (शोशुचत्) = दीप्त होते हुए हे (शुचे) = दीप्त प्रभो! (सुदीतिभिः) = उत्तम दीप्तियों से (सुदीदिहि) = आप हमें दीप्त करिये। एक उपासक अपने जीवन को आपकी दीप्ति से दीप्त करनेवाला बनता ही है ।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु हमारे में शक्ति का सेचन करते हुए हमें अजर बनाते हैं। वे दीप्त प्रभु हमें ज्ञानदीप्ति से दीप्त करते हैं।
मराठी (1)
भावार्थ
हे राजा ! तू सतत विद्या व विनयाने दुर्व्यसनाचा नाश करून प्रजेचे निरंतर पालन कर. ॥ ३ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Agni, generous lord giver of showers of light and energy, wealth and power, you are great, unaging and immortal. You shine with lustre and purity. O lord pure and purifying, blazing with universal light and glory, enlighten us blissfully with the divine rays of eternal light, knowledge and purity.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
What should a king do-is further told.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O enlightened leader ! you are shining with knowledge and humility. You are mighty, free from old age (energetic), purifying, with constant luster and light with good radiance illumine all, illumine us also well with them.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
O king ! you should nourish and protect your subjects constantly with the light of knowledge and humility.
Foot Notes
(अर्चिषा) सत्कारेण दीप्त्या वा । वर्ष-पूजायाम् (भ्वा.) अर्चि: इति ज्वलतोनाम (NG 1, 17)। = With honor or luster. । = (शोचिषा) प्रकाशेन । शौचति-ज्वलतिकर्मा (NG 1, 16 ) शोचिः इति ज्वलतोनाम (NG 1, 17)। = With light. (शोशुचत्) भूशं पवित्रयन्। = Purifying much. (दीदिहि) प्रकाशय । = Illumine.
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