ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 48/ मन्त्र 7
ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः
देवता - अग्निः
छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
बृ॒हद्भि॑रग्ने अ॒र्चिभिः॑ शु॒क्रेण॑ देव शो॒चिषा॑। भ॒रद्वा॑जे समिधा॒नो य॑विष्ठ्य रे॒वन्नः॑ शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि ॥७॥
स्वर सहित पद पाठबृ॒हत्ऽभिः॑ । अ॒ग्ने॒ । अ॒र्चिऽभिः॑ । शु॒क्रेण॑ । दे॒व॒ । शो॒चिषा॑ । भ॒रत्ऽवा॑जे । स॒म्ऽइ॒धा॒नः । य॒वि॒ष्ठ्य॒ । रे॒वत् । नः॒ । शु॒क्र॒ । दी॒दि॒हि॒ । द्यु॒ऽमत् । पा॒व॒क॒ । दी॒दि॒हि॒ ॥
स्वर रहित मन्त्र
बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा। भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि ॥७॥
स्वर रहित पद पाठबृहत्ऽभिः। अग्ने। अर्चिऽभिः। शुक्रेण। देव। शोचिषा। भरत्ऽवाजे। सम्ऽइधानः। यविष्ठ्य। रेवत्। नः। शुक्र। दीदिहि। द्युऽमत्। पावक। दीदिहि ॥७॥
ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 48; मन्त्र » 7
अष्टक » 4; अध्याय » 8; वर्ग » 2; मन्त्र » 2
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अष्टक » 4; अध्याय » 8; वर्ग » 2; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
पुनर्मनुष्यैः कथं वर्त्तितव्यमित्याह ॥
अन्वयः
हे शुक्र पावक यविष्ठ्य देवाग्ने ! यथा वह्निर्बृहद्भिरर्चिभिर्भरद्वाजे समिधानो नो द्युमद्रेवद्ददाति तथा शुक्रेण शोचिषैतद्दीदिहि, विद्याविनये च दीदिहि ॥७॥
पदार्थः
(बृहद्भिः) महद्भिः (अग्ने) अग्निरिव वर्त्तमान (अर्चिभिः) तेजोभिः (शुक्रेण) शुद्धेन (देव) दातः (शोचिषा) न्यायप्रकाशेन (भरद्वाजे) विज्ञानादिधारके (समिधानः) देदीप्यमानः (यविष्ठ्य) अतिशयेन युवन् (रेवत्) प्रशस्तैश्वर्ययुक्तं धनम् (नः) अस्मभ्यम् (शुक्र) आशुकर्त्तः (दीदिहि) प्रकाशय (द्युमत्) प्रशस्तप्रकाशयुक्तम् (पावक) पवित्रकर्त्तः (दीदिहि) देहि ॥७॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। ये विद्वांसस्सूर्यवच्छुभेषु गुणेषु बलेन सुशीलत्वेन वा श्रियं प्राप्य प्रकाशन्ते ते सत्कर्त्तव्या भवन्ति ॥७॥
हिन्दी (3)
विषय
फिर मनुष्यों को कैसा वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
पदार्थ
हे (शुक्र) शीघ्र कर्म करने (पावक) वा पवित्र करने (यविष्ठ्य) वा अतीव युवा अवस्था रखने वा (देव) देनेवाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वन् ! जैसे अग्नि (बृहद्भिः) महान् (अर्चिभिः) तेजों से (भरद्वाजे) विज्ञानादि के धारण करनेवाले व्यवहार में (समिधानः) अच्छे प्रकार देदीप्यमान (नः) हमारे लिये (द्युमत्) प्रशस्त प्रकाश वा (रेवत्) प्रशस्त ऐश्वर्य्य से युक्त धन को देता है, वैसे (शुक्रेण) शुद्ध (शोचिषा) न्याय के प्रकाश से उसे (दीदिहि) प्रकाशित कीजिये, तथा विद्या और नम्रता (दीदिहि) दीजिये ॥७॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन सूर्य के समान शुभ गुणों में बल वा सुशीलता से लक्ष्मी को प्राप्त होकर प्रकाशित होते हैं, वे सत्कार करने योग्य हैं ॥७॥
विषय
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भावार्थ
है ( अग्ने ) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् ! जिस प्रजाकर अग्नि ( बृहद्भिः अर्चिभिः ) बड़ी ज्वालाओं से और ( शुक्रेण शोचिषा ) शुद्ध निर्मल प्रकाश से ( समिधानः ) प्रकाशमान होता है उसी प्रकार हे ( देव ) तेजस्विन् ! दानशील विद्वन् ! राजन् ! प्रभो ! तू ( बृहद्भिः ) बड़े भारी (अर्चिभिः ) अर्चना करने योग्य गुणों और सहायकों से और (शुक्रेण ) शुद्ध, निर्मल ( शोचिषा ) तेज से ( भरद्वाजे ) बल, ऐश्वर्य, ज्ञान आदि को धारण करते हुए राष्ट्र वा शिष्यादि में ( समिधानः ) अच्छी प्रकार प्रकाशित होता हुआ विराज । हे ( यविष्ठ्य ) अति बलशालिन् ! हे ( शुक्र ) शुद्ध कान्तिमन् ! सदाचारिन् ! तू ( रेवत् ) अन्नादि सम्पन्न होकर ( नः दीदिहि ) हमें भी प्रकाशित कर । हे (पावक ) अग्निवत् पवित्र करनेहारे ! तू ( द्युमत् ) ज्ञान प्रकाश से युक्त होकर (नः दीदिहि) हमें भी प्रकाशित कर, हमें भी तेजस्वी और ज्ञानवान् कर ।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः। तृणपाणिकं पृश्निसूक्तं ॥ १–१० अग्निः। ११, १२, २०, २१ मरुतः । १३ – १५ मरुतो लिंगोत्का देवता वा । १६ – १९ पूषा । २२ पृश्निर्धावाभूमी वा देवताः ॥ छन्दः – १, ४, ४, १४ बृहती । ३,१९ विराड्बृहती । १०, १२, १७ भुरिग्बृहती । २ आर्ची जगती। १५ निचृदतिजगती । ६, २१ त्रिष्टुप् । ७ निचृत् त्रिष्टुप् । ८ भुरिक् त्रिष्टुप् । ६ भुरिग् नुष्टुप् । २० स्वरराडनुष्टुप् । २२ अनुष्टुप् । ११, १६ उष्णिक् । १३, १८ निचृदुष्णिक् ।। द्वाविंशत्यृचं सूक्तम् ॥
विषय
रेवत्-द्युमत्
पदार्थ
[१] हे (अग्ने) = अग्रेणी (देव) = दीप्यमान प्रभो ! आप (भरद्वाजे) = अपने में शक्ति का भरण करनेवाले पुरुष में (बृहद्भिः अर्चिभिः) = वृद्धि की कारणभूत ज्ञान ज्वालाओं से तथा (शुक्रेण शोचिषा) = निर्मल दीप्ति से (समिधानः) = दीप्त होइये । अर्थात् आप उपासक को ज्ञान व नैर्मल्य प्राप्त कराके उसके हृदय में प्रकाशित होइये । [२] हे (यविष्ठ्य) = बुराइयों को दूर करके अच्छाइयों को हमारे साथ मिलानेवाले (शुक्र) = दीप्त प्रभो ! (रेवत्) = ऐश्वर्ययुक्त होते हुए (नः) = हमारे लिये (दीदिहि) = दीप्त होइये । हे (पाक) = पवित्र करनेवाले प्रभो ! (द्युमत्) = ज्ञान दीप्ति को प्राप्त कराते हुए आप हमारे लिये (दीदिहि) = दीप्त होइये ।
भावार्थ
भावार्थ- हम भरद्वाज बनें, अपने में संयम द्वारा शक्ति को भरने का यत्न करें। प्रभु हमारे मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त व मन को निर्मल बनाएँगे तथा हमारे जीवनों को आवश्यक धनों से परिपूर्ण करेंगे ।
मराठी (1)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे विद्वान लोक प्रकाशमान सूर्याप्रमाणे शुभ, गुण, बल किंवा सुशीलता याद्वारे लक्ष्मी प्राप्त करून प्रसिद्ध होतात ते सत्कार करण्यायोग्य असतात. ॥ ७ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O resplendent Agni, most youthful unaging power, bright and pure, kindled and rising in the mind and soul of sagely scholars in pursuit of science, energy and progress, shine with mighty flames of light, purity and power, and bring us the wealth of life replete with light and enlightenment. O generous light and fire of life, shine and enlighten us.
Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]
How should men deal with the one another-is further told.
Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]
O liberal donor ! you are purifying, swift-acting, youthful (energetic) and shining like the fire. As the fire with its splendors kindled in (burning within) a man, who is upholder of the scientific knowledge, gives us wealth-endowed with light and prosperity, in the same manner, illuminate this world with pure light of justice and give knowledge and humility.
Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]
N/A
Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]
Those enlightened persons, who shine like the sun in good virtues, attain wealth and beauty with strength and good character and temper; become worthy of respect.
Foot Notes
(अचिर्भिः) तेजोभिः । आचरिति ज्वलतो नाम (NG 1 17 ) = With splendors, lusters. (शुक्र) आशुकर्त: । शुक्रः वाशुकर्ता । सु इति विप्रनाम (NG 2, 15)। = Doer of works swiftly. (भरद्वाजे) विज्ञानादिधारके । वाजः - वजगतौ (भ्वा.) गतेस्त्रिष्वर्थष्यत्र ज्ञानार्थं ग्रहणम (ङ) भूम्-धारणपोषणयो (जु.) दीदयति ज्वलति कर्मा (NG 1, 16)। = In a man who is upholder of the scientific knowledge and other virtues.
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