Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 47 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 47/ मन्त्र 13
    ऋषिः - त्रित आप्त्यः देवता - आदित्याः छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    यदा॒विर्यद॑पी॒च्यं१॒॑ देवा॑सो॒ अस्ति॑ दुष्कृ॒तम् । त्रि॒ते तद्विश्व॑मा॒प्त्य आ॒रे अ॒स्मद्द॑धातनाने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒तयो॑ व ऊ॒तय॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । आ॒विः । यत् । अ॒पी॒च्य॑म् । देवा॑सः । अस्ति॑ । दुः॒ऽकृ॒तम् । त्रि॒ते । तत् । विश्व॑म् । आ॒प्त्ये । आ॒रे । अ॒स्मत् । द॒धा॒त॒न॒ । अ॒ने॒हसः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ । सु॒ऽऊ॒तयः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यदाविर्यदपीच्यं१ देवासो अस्ति दुष्कृतम् । त्रिते तद्विश्वमाप्त्य आरे अस्मद्दधातनानेहसो व ऊतय: सुतयो व ऊतय: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । आविः । यत् । अपीच्यम् । देवासः । अस्ति । दुःऽकृतम् । त्रिते । तत् । विश्वम् । आप्त्ये । आरे । अस्मत् । दधातन । अनेहसः । वः । ऊतयः । सुऽऊतयः । वः । ऊतयः ॥ ८.४७.१३

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 47; मन्त्र » 13
    अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 9; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O brilliant leaders of the world, all evil thoughts, deeds or practices, whether open or covert, which may be prevalent in the three spheres of body, mind and soul of the individual and society, all those, pray, ward off, keep away from us. Sinless are your protections, noble your safeguards.

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    हे भगवान! या जगात नाना विघ्ने, नाना उपद्रव, विविध क्लेश व अनेक प्रलोभने विद्यमान आहेत. त्या सगळ्यापासून आम्हाला दूर ठेव. ॥१३॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे देवासः=देवाः ! यद् दुष्कृतं=पापं दुःखम् । आविः=आविर्भूतं प्रकाशतां गतम् । यद् अपीच्यं=अन्तर्हितमस्ति । यद् विश्वं=दुष्कृतम् । आप्त्ये=व्याप्ते । त्रिते=त्रिषु लोकेषु वर्तते । तत् सर्वम् । अस्मद्+आरे=दूरे । दधातन=स्थापयत । व्याख्यातमन्यत् ॥१३ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (देवासः) हे दिव्यगुणयुक्त सभासदो ! (यद्+दुष्कृतम्) जो दुर्व्यसन पाप और क्लेश आदि आपत्ति (आविः) प्रकाशित हैं और जो (अपीच्यम्) अन्तर्हित=गुप्त हैं और (यद्) जो (विश्वम्) समस्त दुर्व्यसनादि पाप (आप्त्ये+त्रिते) व्याप्त तीन लोक में विद्यमान है, उस सबको (अस्मद्+आरे) हमसे दूर स्थल में (दधातन) रख दो । (अनेहसः) इत्यादि पूर्ववत् ॥१३ ॥

    भावार्थ

    हे भगवन् ! इस संसार में नाना विघ्न, नाना उपद्रव, विविध क्लेश और बहुविध प्रलोभन विद्यमान हैं, इन सबसे हमको दूर करो ॥१३ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    उन के निष्पाप सुखदायी रक्षा कार्यों का विवरण।

    भावार्थ

    हे ( देवासः ) विद्वान् पुरुषो ! ( यद् दुष्कृतं आविः ) जो बुरा काम प्रकट में है और ( यत् दुष्कृतं अपीच्यं अस्ति ) जो बुरा काम छुपा हुआ है, ( त्रिते आप्तये ) तीनों विद्याओं में निष्णात, आप्त जन के अधीन (अस्मत्) हम से ( आरे दधातन ) उस दुष्ट कर्म को दूर करो।

    टिप्पणी

    ( अनेहसः० इत्यादि पूर्ववत् )। सायण प्रोक्त 'मा' पद मन्त्र में नहीं है।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    त्रित आप्त्य ऋषिः॥ १-१३ आदित्यः। १४-१८ आदित्या उषाश्च देवताः॥ छन्द:—१ जगती। ४, ६—८, १२ निचृज्जगती। २, ३, ५, ९, १३, १६, १८ भुरिक् त्रिष्टुप्। १०, ११, १७ स्वराट् त्रिष्टुप्। १४ त्रिष्टुप्। अष्टादशर्चं सूक्तम्।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    यद् आविः, यद् अपीच्यम्

    पदार्थ

    [१] (यद्) = जो भी (आविः) = प्रकट पाप है और (यद् अपीच्यम्) = जो अन्तहत (दुष्कृतं अस्ति) = पाप है, हे (देवासः) = देवो ! (तद्) = उस (विश्वं) = सब पाप को (त्रिते) = काम, क्रोध, लोभ को तैरनेवाले आप्तये प्रभु प्राप्ति में उत्तम पुरुषों की अधीनता में रहनेवाले (अस्मद्) = हम लोगों से (आरे दधातन) = दूर स्थापित करिये। त्रितों व आप्त्यों के सम्पर्क में रहते हुए हम पापों से सदा दूर रहें। [२] हे देवो ! (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (अनेहसः) = निष्पाप हैं। (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (सु ऊतयः) = उत्तम रक्षण हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ:-त्रित आप्त्य लोगों के सम्पर्क में हम अपने जीवनों को निष्पाप बनाएँ।

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top