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ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 47 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 47/ मन्त्र 14
    ऋषिः - त्रित आप्त्यः देवता - आदित्या उषाश्च छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    यच्च॒ गोषु॑ दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ यच्चा॒स्मे दु॑हितर्दिवः । त्रि॒ताय॒ तद्वि॑भावर्या॒प्त्याय॒ परा॑ वहाने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒तयो॑ व ऊ॒तय॑: ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यत् । च॒ । गोषु॑ । दुः॒ऽस्वप्न्य॑म् । यत् । च॒ । अ॒स्मे इति॑ । दु॒हि॒तः॒ । दि॒वः॒ । त्रि॒ताय॑ । तत् । वि॒भा॒ऽव॒रि॒ । आ॒प्त्याय॑ । परा॑ । व॒ह॒ । अ॒ने॒हसः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ । सु॒ऽऊ॒तयः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यच्च गोषु दुष्ष्वप्न्यं यच्चास्मे दुहितर्दिवः । त्रिताय तद्विभावर्याप्त्याय परा वहानेहसो व ऊतय: सुतयो व ऊतय: ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    यत् । च । गोषु । दुःऽस्वप्न्यम् । यत् । च । अस्मे इति । दुहितः । दिवः । त्रिताय । तत् । विभाऽवरि । आप्त्याय । परा । वह । अनेहसः । वः । ऊतयः । सुऽऊतयः । वः । ऊतयः ॥ ८.४७.१४

    ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 47; मन्त्र » 14
    अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 9; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    इंग्लिश (1)

    Meaning

    O daughter of the light of heaven, holy dawn, noble intelligence, holy wisdom, whatever evil thought, dream or ambition there be in or in relation to our mind and senses or in relation to anything else of our life, O light of the dawn, take away far off from us for the good of the self and the world of threefold virtue of body, mind and soul. Sinless are your protections, holy your safeguards.

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जागृत अवस्थेतील अनुभूत पदार्थ स्वप्नावस्थेत दृढ होतात. प्रात:काळी लोक अधिक स्वप्ने पाहतात. त्यासाठी उषादेवीचे संबोधन आहे. यद्वा (दिव: दुहिता) प्रकाशाची कन्या बुद्धी आहे. कारण हिच्या द्वारे आत्म्याला प्रकाश मिळतो. त्यासाठीच बुद्धीला संबोधित केलेले आहे. स्वप्नाचे कोणत्या प्रकारे भय वाटता कामा नये. यासाठी बुद्धीला म्हटले जाते की, स्वप्न दूर करा. ॥१४॥

    टिप्पणी

    यच्च गोषुं दु:ष्वप्न्यं यच्चास्मे दुहितर्दिव: । त्रिताय तद्विभावर्याप्त्याय परा वहानेहसो व ऊतय: सुऊतयो व ऊतय: ॥१४॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    N/A

    पदार्थः

    हे दिवो दुहितः=दिवः प्रकाशस्य दुहितः कन्ये बुद्धे ! यद्वा उषः । गोषु अस्माकमिन्द्रियेषु । यच्च दुःस्वप्न्यं=अमङ्गलसूचकः स्वप्नो भवति । अस्मे=अस्मासु अस्माकमन्यावयवेषु । यच्च दुःखं स्वप्न्यं विद्यते । हे विभावरि=हे प्रकाशमयि देवि बुद्धे ! तत्सर्वं दुःस्वप्न्यम् । आप्त्याय । त्रिताय । परावह=दूरे परिहर ॥१४ ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    N/A

    पदार्थ

    (दिवः+दुहितः) हे दिवः कन्ये ! बुद्धे ! यद्वा हे उषो देवि ! (यद्+दुःस्वप्न्यम्) जो दुःस्वप्न=अनिष्टसूचक स्वप्न (गोषु) इन्द्रियों में होता है अर्थात् इन्द्रियों के सम्बन्ध में होता है (यत्+च) और जो दुष्ट स्वप्न (अस्मे) हमारे अन्यान्य अवयवों के सम्बन्ध में होता है (विभावरि) हे प्रकाशमय देवि मते ! (तत्) उस सब दुःस्वप्न को (आप्त्याय+त्रिताय) व्यापक जगत् के लिये (परा+वह) कहीं दूर फेंक देवें ॥१४ ॥

    भावार्थ

    जाग्रदवस्था में अनुभूत पदार्थ स्वप्नावस्था में दृष्ट होते हैं । प्रातःकाल लोग अधिक स्वप्न देखते हैं । अतः उषा देवी का सम्बोधन किया गया है । यद्वा (दिवः+दुहिता) प्रकाश की कन्या बुद्धि है, क्योंकि इसी से आत्मा को प्रकाश मिलता है । अतः बुद्धि सम्बोधित हुई है । स्वप्न से किसी प्रकार का भय करना उचित नहीं, अतः बुद्धि से कहा जाता है कि स्वप्न को दूर करो ॥१४ ॥

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    विषय

    उन के निष्पाप सुखदायी रक्षा कार्यों का विवरण।

    भावार्थ

    हे ( दिवः दुहितः ) उषाकालवत् ज्ञानप्रकाश का दोहन पूरण, एवं प्रदान करने वाली ! ( विभावरि ) विशेष ज्ञान प्रकाश से वरण करने योग्य श्रेष्ठ ज्ञान को देने वाली ( यत् च गोषु ) जो भी हमारी वाणियों और इन्द्रियों में ( दुःष्वप्न्यं ) दुःस्वप्नों का बुरा प्रभाव हो। और ( यत् च अस्मे ) जो हममें बुरे स्वप्नों का दुष्परिणाम हो उसको (आप्त्याय त्रिताय) आप्त जनों , तीनों दुःखों से मुक्त जन के हितार्थ ( परा वह ) के हितकारीदूर कर।

    टिप्पणी

    ( अने० इत्यादि पूर्ववत् )

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    त्रित आप्त्य ऋषिः॥ १-१३ आदित्यः। १४-१८ आदित्या उषाश्च देवताः॥ छन्द:—१ जगती। ४, ६—८, १२ निचृज्जगती। २, ३, ५, ९, १३, १६, १८ भुरिक् त्रिष्टुप्। १०, ११, १७ स्वराट् त्रिष्टुप्। १४ त्रिष्टुप्। अष्टादशर्चं सूक्तम्।

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    विषय

    दुःष्वप्न्य दूरीकरण

    पदार्थ

    हे (दिवः दुहितः) = ज्ञान का प्रपूरण करनेवाली उषे ! (यत् च) = जो भी (गोषु) = इन्द्रियों के विषय में (दुःष्वप्न्यं) = अशुभ स्वप्न आता है, (च) = और (यत्) = जो (अस्मे) = हमारे विषय में अशुभ स्वप्न होता है, (तत्) = उसे हे (विभावरि) = प्रकाशमयी उषे ! (त्रिताय) = 'काम-क्रोध-लोभ' को तैरनेवाले (आप्त्याय) = प्रभुप्राप्ति में उत्तम मेरे लिए (परावह) = दूर करनेवाली हो। वस्तुत: हम उषाकाल में प्रबुद्ध ही हो जाएँ, ताकि इन अशुभ स्वप्नों का शिकार न हों। [२] (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (अनेहसः) = निष्पाप हैं। (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (सु ऊतयः) = उत्तम रक्षण हैं।

    भावार्थ

    भावार्थ- हम काम-क्रोध-लोभ को तैरनेवाले प्रभुप्राप्ति परायण बनकर अशुभ स्वप्नों से ऊपर उठें।

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