ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 47/ मन्त्र 16
ऋषिः - त्रित आप्त्यः
देवता - आदित्या उषाश्च
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
तद॑न्नाय॒ तद॑पसे॒ तं भा॒गमु॑पसे॒दुषे॑ । त्रि॒ताय॑ च द्वि॒ताय॒ चोषो॑ दु॒ष्ष्वप्न्यं॑ वहाने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒तयो॑ व ऊ॒तय॑: ॥
स्वर सहित पद पाठतत्ऽअ॑न्नाय । तत्ऽअ॑पसे । तम् । भा॒गम् । उ॒प॒ऽसे॒दुषे॑ । त्रि॒ताय॑ । च॒ । द्वि॒ताय॑ । च॒ । उषः॑ । दुः॒ऽस्वप्न्य॑म् । व॒ह॒ । अ॒ने॒हसः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ । सु॒ऽऊ॒तयः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
तदन्नाय तदपसे तं भागमुपसेदुषे । त्रिताय च द्विताय चोषो दुष्ष्वप्न्यं वहानेहसो व ऊतय: सुतयो व ऊतय: ॥
स्वर रहित पद पाठतत्ऽअन्नाय । तत्ऽअपसे । तम् । भागम् । उपऽसेदुषे । त्रिताय । च । द्विताय । च । उषः । दुःऽस्वप्न्यम् । वह । अनेहसः । वः । ऊतयः । सुऽऊतयः । वः । ऊतयः ॥ ८.४७.१६
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 47; मन्त्र » 16
अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 10; मन्त्र » 1
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अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 10; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
For the sake of the man whose food is bad dreams, whose karma it is, whose entire share of life is this, for the sake of the man of threefold world of body, mind and soul, and for the good of the twice born humanity, O dawn of divine light, take away the bad dreams far off. Sinless are your protections, holy your safeguards.
मराठी (1)
भावार्थ
तीनही लोकांचे एक नाव त्रित आहे, कारण खाली, वर व मध्य या तीन स्थानी जो तत=व्याप्त आहे तो त्रित=त्रितत । द्वित = हे नाव जीवाचे यासाठी आहे की, या लोकांशी व परलोकाशी संबंध ठेवतो किंवा या शरीरातही राहतो व त्याला सोडून इतरत्रही राहतो. यासाठी त्याला द्वित म्हणतात. कर्मेन्द्रिये व ज्ञानेन्द्रियांद्वारे याचे कार्य होते. त्यासाठी त्याला द्वित म्हणतात.
टिप्पणी
मंत्राचा आशय हा आहे की, दु:स्वप्नाने मानसिक व शारीरिक हानी होते. त्यासाठी शरीराला असे निरोगी ठेवावे की, त्याने स्वप्न पाहू नये. प्रात:कालचे संबोधन यासाठीही वारंवार केले गेले आहे की, त्यावेळी शयन करणे योग्य नाही. स्वप्नही एक आश्चर्यजनक मानसिक व्यापार आहे. त्यासाठी त्याचे वर्णन वेदातही लिहिलेले आहे. बाकी सर्व पूर्वीप्रमाणे... ॥१६॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
हे उषः ! तदन्नाय=तदेवान्नं यस्य तस्मै । जागरावस्थायां यदेवान्नमोदनादिकं भुक्तं पीतं तदेव स्वप्नेऽपि प्राप्तं यस्य स तदन्नः । पुनः । तदपसे=तदेव अपः कर्म यस्य स तदपाः । तस्मै तदपसे=तत्कर्मणे । पुनः । तं भागम् । ते तं भागमंशम् । स्वप्ने । उपसेदुषे=प्राप्तवते । त्रिताय च=संसाराय च समुदाय । द्विताय च=जीवाय च एकैकस्मै । यद् दुःस्वप्न्यं तत् सर्वमन्यत्र । वह=प्रापय ॥१६ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
(उषः) हे देवि उषे हे प्रकाशप्रदात्रि बुद्धे ! (तदन्नाय) उस अन्नवाले (तदपसे) उस कर्मवाले और (तम् भागम्) उस-उस भाग को (उपसेदुषे) प्राप्त करनेवाले अर्थात् जागरावस्था में जो-जो अन्न, जो जो कर्म और जो-जो भोग विलास करता है, वे ही-२ पदार्थ जिसको स्वप्न में भी प्राप्त हुए हैं, ऐसा जो (त्रिताय) समस्त संसार है और (द्विताय) एक-२ जीव है, उस संसार और उस जीव को (दुःस्वप्न्यम्) जो दुःस्वप्न प्राप्त होता है, उसको (वह) कहीं अन्यत्र लेजा, यह मेरी प्रार्थना है ॥१६ ॥
भावार्थ
त्रित तीनों लोकों का एक नाम त्रित है, क्योंकि यह नीचे ऊपर और मध्य इन तीनों स्थानों में जो तत=व्याप्त हो, वह त्रित=त्रितत ।
टिप्पणी
द्वित=यह नाम जीव का इसलिये है कि इस लोक और परलोक से सम्बन्ध रखता है अथवा इस शरीर में भी रहता है और इसको छोड़ अन्यत्र भी रहता है, अतः उसको द्वित कहते हैं । अथवा कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय द्वारा इसका कार्य्य होता है, अतः इसको द्वित कहते हैं । मन्त्र का आशय यह है कि दुःस्वप्न से मानसिक और शारीरिक हानि होती है । अतः शरीर को ऐसा नीरोग रक्खे कि वह स्वप्न न देखे । प्रातःकाल का सम्बोधन इसलिये भी वारंबार किया गया है कि उस समय शयन करना उचित नहीं । एवं स्वप्न भी एक आश्चर्य्यजनक मानसिक व्यापार है, अतः इसका वर्णन वेद में पाया जाता है । इति ॥१६ ॥
विषय
उन के निष्पाप सुखदायी रक्षा कार्यों का विवरण।
भावार्थ
( तदन्नाय ) नाना प्रकार के भोज्यान्न प्राप्त करने वाले, (तद्अपसे) नाना श्रेष्ठ कर्म करनेवाले, (तं भागम् उपसेदुषे) अपने उस उत्तम २ सेव्य अंश को प्राप्त करने वाले ( त्रिताय ) मन, वाणी, कर्म तीनों पर वशी और (द्विताय च) भीतर और बाहर वश करने वाले पुरुष के भी (दुः-स्वप्न्यं ) बुरे स्वप्न के प्रभाव को हे ( उषः ) प्रभातवेला के समान अन्धकार के तुल्य पापों को दूर करने वाली मातः ! तू ( वह ) दूर कर।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
त्रित आप्त्य ऋषिः॥ १-१३ आदित्यः। १४-१८ आदित्या उषाश्च देवताः॥ छन्द:—१ जगती। ४, ६—८, १२ निचृज्जगती। २, ३, ५, ९, १३, १६, १८ भुरिक् त्रिष्टुप्। १०, ११, १७ स्वराट् त्रिष्टुप्। १४ त्रिष्टुप्। अष्टादशर्चं सूक्तम्।
विषय
त्रित+द्वित
पदार्थ
[१] (तदन्नाय) = उस प्रभु की प्राप्ति के लिए ही अन्नों का सेवन करनेवाले, (तदवसे) = प्रभुप्राप्ति के लिए ही कर्म करनेवाले तथा (तं भागं) = उस भजनीय प्रभु को (उपसेदुषे) = उपासित करनेवाले (त्रिताय) = [त्रीन् तरति ] काम-क्रोध-लोभ को तैर जानेवाले (च) = और (द्विताय) = [द्वौ तनोति ] विद्या व श्रद्धा दोनों का विस्तार करनेवाले के लिए, हे (उषः) = उषा की देवते ! (दुष्वप्न्यं) = अशुभ स्वप्नों को वह दूर करनेवाली हो। [२] हे उषाओ ! (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (अनेहस:) = हमें निष्पाप बनानेवाले हैं। (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (सु ऊतयः) = उत्तम रक्षण हैं।
भावार्थ
भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिए ही अन्नों का सेवन करनेवाला, प्रभु प्राप्त्यर्थ कर्मों को करनेवाला, प्रभु का उपासक, काम-क्रोध-लोभ को तैरनेवाला व विद्या और श्रद्धा व विकास करनेवाला बनता है। यह उषाकाल में प्रबुद्ध होकर उपासना में प्रवृत्त होता है और अशुभ स्वप्नों से बचा रहता है।
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