ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 47/ मन्त्र 9
ऋषिः - त्रित आप्त्यः
देवता - आदित्याः
छन्दः - भुरिक्त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
अदि॑तिर्न उरुष्य॒त्वदि॑ति॒: शर्म॑ यच्छतु । मा॒ता मि॒त्रस्य॑ रे॒वतो॑ऽर्य॒म्णो वरु॑णस्य चाने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒तयो॑ व ऊ॒तय॑: ॥
स्वर सहित पद पाठअदि॑तिः । नः॒ । उ॒रु॒ष्य॒तु॒ । अदि॑तिः । शर्म॑ । य॒च्छ॒तु॒ । मा॒ता । मि॒त्रस्य॑ । रे॒वतः॑ । अ॒र्य॒म्णः । वरु॑णस्य । च॒ । अ॒ने॒हसः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ । सु॒ऽऊ॒तयः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ ॥
स्वर रहित मन्त्र
अदितिर्न उरुष्यत्वदिति: शर्म यच्छतु । माता मित्रस्य रेवतोऽर्यम्णो वरुणस्य चानेहसो व ऊतय: सुतयो व ऊतय: ॥
स्वर रहित पद पाठअदितिः । नः । उरुष्यतु । अदितिः । शर्म । यच्छतु । माता । मित्रस्य । रेवतः । अर्यम्णः । वरुणस्य । च । अनेहसः । वः । ऊतयः । सुऽऊतयः । वः । ऊतयः ॥ ८.४७.९
ऋग्वेद - मण्डल » 8; सूक्त » 47; मन्त्र » 9
अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 8; मन्त्र » 4
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अष्टक » 6; अध्याय » 4; वर्ग » 8; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
इंग्लिश (1)
Meaning
May Aditi, Mother Nature, save us. May Aditi, mother earth, provide us a restful home. May Aditi, mother of Mitra, prosperous Aryama and Varuna provide us peace and happiness. Sinless are your protections, holy your safeguards, holily protected.
मराठी (1)
भावार्थ
संपूर्ण प्रजेने मिळून सुदृढ सभा स्थापना करावी. तेथे देशाच्या बुद्धिमान, विद्वान, शूरवीर व प्रत्येक दलाच्या मुख्य मुख्य पुरुषांना व स्त्रियांना सभासद बनवावे. जे देशाचे सर्व प्रकारे हित करतील. ॥९॥
संस्कृत (1)
विषयः
N/A
पदार्थः
अदितिः=प्रजास्थापिता अखण्डनीया सभा । मित्रस्य=ब्राह्मणस्य । रेवतः=धनवतोऽर्यम्णो=वैश्यदलस्य । च पुनः । वरुणस्य=राजदलस्य । माता=निर्मात्री वर्तते । सा नोऽस्मान् । उरुष्यतु । रक्षतु । साऽदितिः । शर्म=सुखम् । यच्छतु=ददातु ॥९ ॥
हिन्दी (3)
विषय
N/A
पदार्थ
(अदितिः) जो प्रजास्थापित अखण्डनीया राजसभा (मित्रस्य) ब्राह्मण-दल की (रेवतः) धनवान् (अर्य्यम्णः) वैश्य-दल की (च) तथा (वरुणस्य) राज-दल की (माता) निर्मात्री है । वह (नः) हमारी (उरुष्यतु) रक्षा करे, पुनः (अदितिः) वह सभा (शर्म) कल्याण, शरण, सुख और आनन्द (यच्छतु) देवे ॥९ ॥
भावार्थ
समस्त प्रजाएँ मिलकर सुदृढ़तर सभा स्थापित करें । वहाँ देश के बुद्धिमान्, विद्वान्, शूरवीर और प्रत्येक दल के मुख्य-२ पुरुष और नारियाँ सभासद् बनाए जायँ, जो देश का सर्वप्रकार से हित किया करें ॥९ ॥
विषय
रक्षा शान्तिप्रद हो।
भावार्थ
( अदितिः ) अखण्ड ब्रह्मचारिणी, वा माता, जो ( रेवतः ) ऐश्वर्यसम्पन्न ( मित्रस्य ) न्यायाधीश, ब्राह्मण वर्ग, ( अर्यम्णः ) न्यायकारी, शत्रुनियन्ता, और (वरुणस्य) सर्वश्रेष्ठ राजा की भी (माता) उत्पन्न करने वाली माता के तुल्य जननी, भूमि, वा प्रकृति है वह ( नःऋष्यतु ) हमारी रक्षा करे और वह ( अदितिः ) अदीन व्रत की पालक, अखण्ड शक्ति ( नः शर्म यच्छतु ) हमें सुख शान्ति प्रदान करे।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
त्रित आप्त्य ऋषिः॥ १-१३ आदित्यः। १४-१८ आदित्या उषाश्च देवताः॥ छन्द:—१ जगती। ४, ६—८, १२ निचृज्जगती। २, ३, ५, ९, १३, १६, १८ भुरिक् त्रिष्टुप्। १०, ११, १७ स्वराट् त्रिष्टुप्। १४ त्रिष्टुप्। अष्टादशर्चं सूक्तम्।
विषय
अदिति
पदार्थ
[१] (अदिति:) = अदीना देवमाता-हमें दीनता से ऊपर उठानेवाली और दिव्यगुणों को जन्म देनेवाली स्वास्थ्य की देवता (नः) = हमें (उरुष्यतु) = रक्षित करे। यह (अदितिः) = स्वास्थ्य की देवता (शर्म) = सुख को (यच्छतु) = दे। [२] यह स्वास्थ्य की देवता (मित्रस्य) = मित्र की (रेवतः) = रेवान् की (अर्यम्णः) = अर्यमा की (च वरुणस्य) = और वरुण की माता - निर्माण करनेवाली है। यह हमें स्नेहवाला [मित्र] धनवान् [रेवान्] संयमी [अर्यमा] व निर्दोष [वरुण] बनाती है। हे देवो ! (वः) = आपके (ऊतयः) = रक्षण (अनेहसः) = हमें निष्पाप बनाते हैं। (वः) = आपके (ऊतयः) = रक्षण (सु ऊतयः) = उत्तम रक्षण हैं।
भावार्थ
भावार्थ- स्वास्थ्य हमें रक्षित करता है - सुखी बनाता है। यह हमें स्नेहवाला, धनी, संयमी व निर्देष बनाता है।
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