ऋग्वेद मण्डल - 8 के सूक्त 69 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 8/ सूक्त 69/ मन्त्र 1
    ऋषि: - प्रियमेधः देवता - इन्द्र: छन्दः - विराडनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः
    पदार्थ -

    पुनः उसी अर्थ को कहते हैं−(आतिथिग्वे) इस शरीर में नयन आदि (षड्) छः घोड़ों को (सचा+सनम्) साथ ही मैं प्राप्त करता हूँ। इसी प्रकार (इन्द्रोते) ईश्वरव्याप्त शरीर में (वधूमतः) बुद्धिरूप नारी सहित और (पूतक्रतौ) शुद्धकर्म शरीर में इन्द्रियगण प्राप्त हैं ॥१७॥

    भावार्थ -

    वारंवार इसलिये इस प्रकार का वर्णन आता है कि उपासक अपने इन्द्रियगणों को वश में करके इनसे पवित्र काम लेवे ॥१७॥

    पदार्थ -

    पुनस्तमर्थमाह−आतिथिग्वे। षड्+अश्वान्=इन्द्रियरूपान्। सचा=सह। सनम्। प्राप्तवानस्मि। इन्द्रोते। वधूमतः=बुद्धिमतः। पूतक्रतौ=शुद्धकर्म्मणि ॥१७॥

    Meanings -

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