यजुर्वेद - अध्याय 28/ मन्त्र 2
ऋषिः - बृहदुक्थो वामदेव ऋषिः
देवता - इन्द्रो देवता
छन्दः - निचृदतिजगती
स्वरः - निषादः
130
होता॑ यक्ष॒त् तनू॒नपा॑तमू॒तिभि॒र्जेता॑र॒मप॑राजितम्। इन्द्रं॑ दे॒वस्व॒र्विदं॑ प॒थिभि॒र्मधु॑मत्तमै॒र्नरा॒शꣳसे॑न॒ तेज॑सा॒ वेत्वाज्य॑स्य॒ होत॒र्यज॑॥२॥
स्वर सहित पद पाठहोता॑। य॒क्ष॒त्। तनू॒नपा॑त॒मिति तनू॒ऽनपा॑तम्। ऊ॒तिभि॒रित्यू॒तिऽभिः॑। जेता॑रम्। अप॑राजित॒मित्यप॑राऽजितम्। इन्द्र॑म्। दे॒वम्। स्व॒र्विद॒मिति॑ स्वः॒ऽविद॑म्। प॒थिभि॒रिति॑ प॒थिऽभिः॑। मधु॑मत्तमै॒रिति॒ मधु॑मत्ऽतमैः। नरा॒शꣳसे॑न। तेज॑सा। वेतु॑। आज्य॑स्य। होतः॑। यज॑ ॥२ ॥
स्वर रहित मन्त्र
होता यक्षत्तनूनपातमूतिभिर्जेतारमपराजितम् । इन्द्रन्देवँ स्वर्विदम्पथिभिर्मधुमत्तमैर्नराशँसेन तेजसा वेत्वाज्यस्य होतर्यज ॥
स्वर रहित पद पाठ
होता। यक्षत्। तनूनपातमिति तनूऽनपातम्। ऊतिभिरित्यूतिऽभिः। जेतारम्। अपराजितमित्यपराऽजितम्। इन्द्रम्। देवम्। स्वर्विदमिति स्वःऽविदम्। पथिभिरिति पथिऽभिः। मधुमत्तमैरिति मधुमत्ऽतमैः। नराशꣳसेन। तेजसा। वेतु। आज्यस्य। होतः। यज॥२॥
भाष्य भाग
संस्कृत (1)
विषयः
राजपुरुषाः कीदृशाः स्युरित्याह॥
अन्वयः
हे होतर्भवान् यथा होतोतिभिर्मधुमत्तमैः पथिभिस्तनूनपातं जेतारमपराजितं स्वर्विदं देवमिन्द्रं यक्षत् नराशंसेन तेजसाऽऽज्यस्य वेतु तथा यज॥२॥
पदार्थः
(होता) सुखस्य प्रदाता (यक्षत्) संगच्छेत् (तनूनपातम्) यः शरीराणि पाति तम् (ऊतिभिः) रक्षादिभिः (जेतारम्) जयशीलम् (अपराजितम्) अन्यैः पराजेतुमशक्यम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यकारकं राजानम् (देवम्) विद्याविनयाभ्यां सुशोभितम् (स्वर्विदम्) प्राप्तसुखम् (पथिभिः) धर्म्यैर्मार्गैः (मधुमत्तमैः) अतिशयेन मधुरजलादियुक्तैः (नराशंसेन) नरैराशंसितेन (तेजसा) प्रागल्भ्येन (वेतु) प्राप्नोतु (आज्यस्य) विज्ञेयम्। अत्र कर्मणि षष्ठी। (होतः) (यज) ॥२॥
भावार्थः
अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यदि राजानः स्वयं न्यायमार्गेषु गच्छन्तः प्रजानां रक्षा विदध्युस्तेऽपराजितारः सन्तः शत्रूणां विजेतारः स्युः॥२॥
हिन्दी (3)
विषय
राजपुरुष कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
पदार्थ
हे (होतः) ग्रहण करने वाले पुरुष! आप जैसे (होता) सुख का दाता (ऊतिभिः) रक्षाओं तथा (मधुमत्तमैः) अतिमीठे जल आदि से युक्त (पथिभिः) धर्मयुक्त मार्गों से (तनूनपातम्) शरीरों के रक्षक (जेतारम्) जयशील (अपराजितम्) शत्रुओं से न जीतने योग्य (स्वर्विदम्) सुख को प्राप्त (देवम्) विद्या और विनय से सुशोभित (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्यकारक राजा का (यक्षत्) सङ्ग करे (नराशंसेन) मनुष्यों से प्रशंसा की गई (तेजसा) प्रगल्भता से (आज्यस्य) जानने योग्य विषय को (वेतु) प्राप्त हो, वैसे (यज) सङ्ग कीजिये॥२॥
भावार्थ
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा लोग स्वयं राज्य के न्याय मार्ग में चलते हुए प्रजाओं की रक्षा करें, वे पराजय को न प्राप्त होते हुए शत्रुओं के जीतने वाले हों॥२॥
विषय
होता द्वारा भिन्न-भिन्न अधिकारियों की नियुक्ति और उनके विशेष आवश्यक लक्षण, अधिकार और शक्तियों का वर्णन ।
भावार्थ
(होता) अधिकारों को प्रदान करने हारा विद्वान् 'होता' ( तनूनपातम् ) समस्त राष्ट्रवासियों के शरीरों की रक्षा करने हारे, उनको क्षति न पहुँचाने वाले ( अपराजितम् ) कभी भी न हारे हुए, (जेतारम् ) विजेता, ( स्वविदम् ) सुख समृद्धि का लाभ करने और कराने वाले, ( देवम् ) विद्वान्, दानशील, राष्ट्र के द्रष्टा पुरुष को ( इन्द्रम् ) इन्द्र, ऐश्वर्यवान् पद पर ( यक्षत् ) स्थापित करे, वह (मधुमत्तमैः) अत्यन्त मधु, ज्ञान और मनोहर (पथिभिः) उपायों, मार्गों और व्यवस्था - मर्यादाओं से ( नराशंसेन तेजसा ) समस्त नेता पुरुषों को आदेश करने में समर्थ, एवं सर्व स्तुति योग्य तेज से, पराक्रम से (आज्यस्य) राष्ट्र के ऐश्वर्य को (वेतु) प्राप्त करे । हे (होतः) विद्वन् ! ऐसे पुरुष को (यज) तू अधिकार प्रदान कर | देखो अ० २१ | ३०, ३१ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
तनूनपादिन्द्रो देवता । निचृज्जगती । निषादः ॥
विषय
मधुमत्तम मार्ग
पदार्थ
१. (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला (यक्षत्) = उस प्रभु का अपने साथ सम्पर्क करता है जो (तनूनपातम्) = शरीर को न गिरने देनेवाले हैं, (ऊतिभिः) = रक्षणों के द्वारा शरीर को व्याधियों से बचानेवाले हैं, (जेतारम्) = सदा हमारे काम-क्रोधादि शत्रुओं को जीतनेवाले हैं और (अपराजितम्) = कभी पराजित नहीं होते। (इन्द्रम्) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले व परमैश्वर्य को प्राप्त करानेवाले हैं, (देवम्) = सब दिव्य गुणों के पुञ्ज, ज्ञान से देदीप्यमान व सब ऐश्वर्यों के देनेवाले हैं [देवः दीव्यति, द्योतनाद् दानाद्वा], (स्वर्विदम्) = प्रकाश व सुख को प्राप्त करानेवाले हैं। २. वे प्रभु 'स्वर्विद्' हैं- सुख प्राप्त कराते हैं, परन्तु कब ? जबकि हम [क] (मधुमत्तमैः पथिभिः) = अत्यन्त मधुर मार्गों से जीवनयात्रा में गति करते हैं। जब हमारे सब कर्मों में माधुर्य होता है तथा [ख] (नराशंसेन) = [नरैः आशंसनीयेन] मनुष्यों से प्रशंसा करने योग्य तेजसा तेज के द्वारा। जब हम तेजस्वी बनते हैं, और हमारा यह तेज प्रशंसनीय होता है। [ग] इसीलिए भक्त को चाहिए कि (आज्यस्य वेतु) = तेज का पान करने का प्रयत्न करे। तेज को अपने में सुरक्षित करे। इस प्रकार वीर्य को शरीर में सुरक्षित करते हुए (होतः) = दानपूर्वक अदन करनेवाले! तू (यज) = उस प्रभु का अपने साथ मेल कर ।
भावार्थ
भावार्थ - प्रभु हमारे शरीर को नीरोग बनानेवाले हैं। हमारे शत्रुओं को जीतनेवाले हैं। हम मधुर मार्गों से चलते हैं और प्रशंसनीय तेजवाले होते हैं तो वे प्रभु हमें सुखी करते हैं। हमें चाहिए कि हम वीर्य को शरीर में सुरक्षित करते हुए दान की वृत्तिवाले बनें और प्रभु से अपना मेल करें।
मराठी (2)
भावार्थ
या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जे राजे न्यायाने राज्य चालवितात व प्रजेचे रक्षण करतात. त्यांचा पराभव न होता ते शत्रूंना जिंकतात.
विषय
राजपुरूष कसे असावेत, याविषयी -
शब्दार्थ
शब्दार्थ - हे (होत:) ग्रहण करणार्या (यजमान) मनुष्य, तुम्ही (होता) सुखदायक आणि (ऊतिभिः) रक्षा विषयक प्रयत्नांनी तसेच (मधुमत्तमैः) अतिमधुर जल आदीद्वारे आणि (पथिभिः) धर्ममय उपायांनी (तनूनपातम्) शरीराचे रक्षण करणार्या (जेतारम्) सदा विजयी (राजाची संगती करा, त्याच्या आश्रयात रहा) कारण तो (अपराजितम्) कधीही शत्रूकडून पराजित होत नाही, (स्वर्विदम्) सदा सुखी असून (देवम्) विद्या आणि विनयाने संपन्न आहे. अशा त्या (इन्द्रम्) परमैश्वर्यकारक राजाची (यक्षत्) संगती करा (नराशेसेन) मनुष्याद्वारे वा प्रजाजनांद्वारे प्रार्थना केल्यानंतर तो राजा (तेजसा) आपल्या तेज व शक्ती (आज्यस्य) प्रस्तूत प्रकरण वा प्रसंगाला (वेतु) जाणतो (व त्याप्रमाणे रक्षणार्थ धावून येतो), त्याप्रमाणे हे, यजमान, तुम्हीही (यज) त्यांची संगती करा. ॥2॥
भावार्थ
भावार्थ - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमा अलंकार आहे. जे राजा स्वतः राज्यासन करताना न्याय मार्गाचा अवलंब करतात आणि प्रजेची रक्षा करतात, ते कधी पराजित होत नाहीत, उलट ते सदा शत्रूवर विजय मिळवतात. ॥2॥
इंग्लिश (3)
Meaning
O sacrificer, just as the pleasure-giving person, with due protections and religious paths, rich in valuable advice like sweet water, befriends the mighty king, the guardian of our bodies, the conqueror, unconquered, full of delight, adorned with knowledge and humility, and understands all knowable topics with his well-praised spiritual and moral power ; so shouldst thou cultivate friendly intercourse with him.
Meaning
Let the man of yajna offer service and oblations to Indra, ruling power of the world, preserver and protector of the forms of life, victorious, unviolated, brilliant and generous, and heavenly, with oblations of defensive actions along the sweetest paths of virtue ; and with his own lustre and valour, celebrated in songs of praise in society, and he would attain the best gifts of life. Man of yajna, carry on the yajna in honour of Indra.
Translation
The sacrificer worships the respledent Lord, the protector of the body (tanunapat) with His protective aids, conqueror of all, and always unconquered, the divine and the Lord, who conducts (us) to the world of light by the sweetest paths with His radiance praised by men. May He enjoy. O sacrificer, offer oblations of purified butter. (1)
Notes
Tanūnapät, तनुं न पातयति य:, protector of the body. Also, the son of himself; the fire is reproduced continually from some other fire. Svarvidam, one who conducts us to the world of light or of bliss. Madhumattamaiḥ pathibhiḥ, along the sweetest paths.
बंगाली (1)
विषय
রাজপুরুষাঃ কীদৃশাঃ স্যুরিত্যাহ ॥
রাজপুরুষ কেমন হইবে, এই বিষয়ে পরবর্ত্তী মন্ত্রে বলা হইয়াছে ॥
पदार्थ
পদার্থঃ–হে (হোতঃ) গ্রহণকারী পুরুষ! আপনি যেমন (হোতা) সুখদাতা (ঊতিভিঃ) রক্ষাদি তথা (মধুমত্তমৈঃ) অতিমিষ্ট জলাদি দ্বারা যুক্ত (পথিভিঃ) ধর্মযুক্ত মার্গ দ্বারা (তনূনপাতম্) শরীরাদির রক্ষক (জেতারম্) জয়শীল (অপরাজিতম্) শত্রু দ্বারা অজেয় (স্বর্বিদম্) সুখকে প্রাপ্ত (দেবম্) বিদ্যা ও বিনয় দ্বারা সুশোভিত (ইন্দ্রম্) পরম ঐশ্বর্য্যকারক রাজার (য়ক্ষৎ) সঙ্গ করিবে (নরাশংসেন) মনুষ্যগণের দ্বারা প্রশংসিত (তেজসা) বুদ্ধিপূর্বক (আজ্যস্য) জানিবার যোগ্য বিষয়কে (বেতু) প্রাপ্ত হউক সেইরূপ (য়জ) সঙ্গ করুন ॥ ২ ॥
भावार्थ
ভাবার্থঃ–এই মন্ত্রে বাচকলুপ্তোপমালঙ্কার আছে । যে রাজা স্বয়ং রাজ্যের ন্যায় মার্গে চলিয়া প্রজাদিগের রক্ষা করিবে, সে পরাজয় প্রাপ্ত না হইয়া শত্রুদিগের বিজয়ী হয় ॥ ২ ॥
मन्त्र (बांग्ला)
হোতা॑ য়ক্ষ॒ৎ তনূ॒নপা॑তমূ॒তিভি॒র্জেতা॑র॒মপ॑রাজিতম্ । ইন্দ্রং॑ দে॒বᳬंস্ব॒র্বিদং॑ প॒থিভি॒র্মধু॑মত্তমৈ॒র্নরা॒শꣳসে॑ন॒ তেজ॑সা॒ বেত্বাজ্য॑স্য॒ হোত॒র্য়জ॑ ॥ ২ ॥
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
হোতেত্যস্য বৃহদুক্থো বামদেব ঋষিঃ । ইন্দ্রো দেবতা । নিচৃদতিজগতী ছন্দঃ ।
নিষাদঃ স্বরঃ ॥
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